पेशाब में पस आना - Pus cells in urine (Pyuria) in Hindi

Dr. Suvansh Raj NirulaMBBS

February 02, 2021

February 02, 2021

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पेशाब में पस आना
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पेशाब में पस आना (प्यूरिया) मूत्र से संबंधित एक ऐसी स्थिति है जो कि सफेद रक्त कोशिकाओं से जुड़ी है। इसमें मूत्र में असामान्य मात्रा में मवाद निकलता है। मवाद पीले रंग का द्रव है जो कि प्रोटीन युक्त सीरम, मृत सफेद रक्त कोशिकाएं, जिन्हें ल्यूकोसाइट्स भी कहा जाता है, से बना होता है। यह अक्सर सूजन वाले स्थान पर इकट्ठा होता है।

जब हमारा शरीर किसी संक्रामक चीज के खिलाफ प्रतिक्रिया करता है तो शरीर की कोशिकीय प्रतिरक्षा में कमी आ जाती है।

साइटोकिन्स के प्रभाव में आकर न्यूट्रोफिल्स (एक तरह की सफेद रक्त कोशिका) इंफेक्शन वाली जगह पर इकट्ठा हो जाते हैं और प्रभावी ढंग से बैक्टीरिया को मारते हैं।

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बाद में, मैक्रोफेज कोशिकाएं मृत या खराब न्यूट्रोफिल डेबरिस को साफ करती हैं। यह न्यूट्रोफिल डेबरिस मवाद बनने का कारण बनती हैं। मैक्रोफेज ऐसी कोशिकाएं हैं, जो बैक्टीरिया और अन्य हानिकारक जीवों का पता लगाती हैं व उन्हें हटाती हैं।

नैदानिक रूप से, मूत्र के नमूने के प्रत्येक घन मिलीमीटर में 10 या इससे ज्यादा सफेद रक्त कोशिकाएं होने का मतलब व्यक्ति पेशाब में पस आने से ग्रस्त है।

पेशाब में पस आने की समस्या बैक्टीरियल इंफेक्शन की वजह से होती है। हालांकि, यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन, खासकर लोअर ट्रैक्ट इंफेक्शन पेशाब में पस आने का सबसे आम कारण है।

पेशाब में पस आने का एक रूप स्टेराइल प्यूरिया है, जिसमें लगातार मूत्र के नमूने में सफेद रक्त कोशिकाएं दिखाई देती हैं। यह इतने सूक्ष्म होते हैं कि इन्हें केवल माइक्रोस्कोप के जरिये देखा जा सकता है। स्टेराइल प्यूरिया गैर-संक्रामक और संक्रामक रोग दोनों के कारण हो सकता है। यह आनुवंशिक रूप से जेनिटोयूरिनरी टीबी, किडनी स्टोन, ट्यूमर, सेप्सिस, सिस्टेमिक ल्यूपस एरिथेमेटोसस (एसएलई), हाल ही में कराई गई एंटीबायोटिक थेरेपी और यहां तक कि कुछ दवाओं के लंबे समय से उपयोग की वजह से भी हो सकता है।

पेशाब में पस आने में आमतौर पर पेशाब के रंग, गंध और चिपचिपाहट में बदलाव होता है। इसमें लक्षणों में बार-बार पेशाब आना, पेशाब में जलन होना, पेशाब करने की तेज इच्छा या बुखार शामिल हैं। अन्य लक्षण इसके अंतर्निहित रोग के आधार पर अलग-अलग हो सकते हैं। सेंसिटिविटी टेस्टिंग के बाद एंटीबायोटिक दवाओं से बैक्टीरियल यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन के संक्रमण का इलाज किया जाता है। हालांकि, ऐसे में खूब सारा तरल पदार्थ पीना फायदेमंद होता है। पेशाब में पस आने का निदान रोगी द्वारा बताए गए संकेतों और लक्षणों पर निर्भर करता है।

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पेशाब में पस आने के कारण और प्रकार - pus cells in urine types and causes in Hindi

आमतौर पर पेशाब में पस आने पर मूत्र पथ या यूरिनरी ट्रैक्ट में सूजन देखी जा सकती है या कुछ मामलों में पूरे शरीर में सूजन की समस्या हो जाती है। यह संक्रमण फैलाने वाले कारक या एजेंट शरीर की कोशिकीय प्रतिरक्षा प्रणाली तक पहुंच जाते हैं।

यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन : जैसा कि ऊपर बताया गया है कि यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन पेशाब में पस आने का सबसे आम कारण है। यह मूत्राशय और मूत्रमार्ग सहित निचले मूत्र पथ को ज्यादा प्रभावित करता है। जबकि सूक्ष्मजीव कई बार किडनी और यूरेटर्स से मिलकर ऊपरी मूत्र पथ को प्रभावित कर सकते हैं और गंभीर संक्रमण का कारण बन सकते हैं, जिसे पायलोनेफ्राइटिस कहा जाता है। बता दें, यूरेटर्स को हिंदी में मूत्रवाहिनी कहते हैं, यह ऐसी नलिकाएं हैं जो किडनी से मूत्राशय यानी यूरिनरी ब्लैडर तक मूत्र को ले जाती हैं।

हालांकि, आमतौर पर यह स्थिति बैक्टीरिया और कवक की वजह से होती है, कभी-कभी इसका कारण वायरस भी हो सकता है। मूत्र पथ के संक्रमण का सबसे आम स्रोत ई. कोलाई है। यह एक तरह का बैक्टीरिया है जो आमतौर पर इंसानों की आंतों में मौजूद होता है। यह मल में दिखाई देता है और उचित स्वच्छता न होने की वजह से यह मूत्रमार्ग के जरिए मूत्रपथ में पहुंच सकता है।

स्टेराइल प्यूरिया : इसमें मूत्र में सफेद रक्त कोशिकाएं बैक्टीरिया के साथ या इसके बिना दिखाई दे सकती हैं। हालांकि, यूरिन कल्चर टेस्ट के जरिए संक्रमण के कारणों का पता चल सकता है। यदि किसी अन्य तरह का संक्रमण है तो ऐसे में मूत्र में ल्यूकोसाइट्स दिखाई दे सकते हैं। पूरे शरीर में सूजन की वजह से अत्यधिक ल्यूकोसाइट्स मूत्र के जरिये बाहर निकल सकते हैं। यह कई कारणों से हो सकता है जैसे हाल ही में एंटीबायोटिक थेरेपी लेना या लंबे समय से कुछ दवाओं का सेवन करने के कारण। स्टेराइल प्यूरिया के सभी कारण निम्नलिखित हैं :

  • असंक्रामक -
    • किडनी स्टोन
    • पोस्टमेनोपॉज़ल एट्रोफिक वैजिनाइटिस (योनि की परतों का पतला, सूखना और उनमें सूजन होना)
    • बैलेनाइटिस (लिंग के आगे वाले हिस्से में सूजन)
    • प्रोस्टेटाइटिस (प्रोस्टेट ग्रंथि में सूजन व छूने पर दर्द)
    • सेप्सिस
    • सिस्टेमिक ल्यूपस एरिथीमेटोसस (यह एक ऑटोइम्यून डिजीज है)
    • किडनी रोग
    • ब्लेडर पेन सिंड्रोम (मूत्राशय वाले हिस्से में दर्द और दबाव)
    • कावासाकी डिजीज (रक्त वाहिकाओं की सूजन)
       
  • क्रोनिक ड्रग ट्रीटमेंट -
    • एस्पिरिन
    • डायरेटिक (मूत्रवर्धक - Diuretics)
    • ओलसालजीन (Olsalazine)
    • साइक्लोफॉस्फामाइड (Cyclophosphamide)
    • इंडिनवीर (Indinavir)
    • डेक्सामेथासोन जैसे ग्लूकोकार्टोइकोइड्स
    • नाइट्रोफ्यूरंटोइन (Nitrofurantoin)
    • नाॅन-स्टेरायडल एंटी इंफ्लेमेटरी ड्रग्स, जैसे आइबुप्रोफेन (NSAID)
    • प्रोटॉन पंप इनहिबिटर जैसे ओमेप्रेजोल (Omeprazole)
       
  • एसिम्पटोमैटिक प्यूरिया - इसमें गर्भावस्था जैसी कुछ स्थितियों में मूत्र में ल्यूकोसाइट की उपस्थिति स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है, लेकिन यह चिंता का कारण नहीं है।

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पेशाब में पस आने के जोखिम - Pyuria risk factors in Hindi

प्यूरिया के जोखिम कारक ज्यादातर यूटीआई के जोखिम कारकों के समान हैं। इनमें से कुछ निम्नलिखित हैं :

  • ज्यादा उम्र : बुजुर्ग लोग यूटीआई के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं।
  • महिला होना : महिलाओं में पुरुषों की तुलना में मूत्रमार्ग की लंबाई कम होती है, जिस वजह से उनके मूत्र पथ में बैक्टीरिया आसानी से पहुंच जाते हैं।
  • सर्जिकल उपचार के बाद : लंबे समय तक निष्क्रीय रहने व बिस्तर पर आराम करने के कारण व्यक्तिगत स्वच्छता पर्याप्त मात्रा में बनी नहीं रह पाती है। इसके अलावा कैथीटेराइजेशन की वजह से भी रोगी में यूटीआई के प्रति खतरा बढ़ जाता है। कैथीटेराइजेशन एक प्रक्रिया है, जिसका उपयोग मूत्राशय को खाली करने के लिए किया जाता है। यह प्रक्रिया एक लचीली नली के माध्यम से की जाती है, जिसे कैथेटर कहा जाता है।
  • गुर्दे की पथरी : पथरी या स्टोन बैक्टीरिया के विकास और संक्रमण के लिए निडास (वह स्थान जहां बैक्टीरिया पनपते व बढ़ते हैं) का काम कर सकती है।
  • यूरिनरी ट्रैक्ट आब्सट्रक्शन या ब्लाॅकेज : बढ़ा हुआ प्रोस्टेट, किडनी स्टोन और कैंसर के कुछ प्रकार बैक्टीरिया को फैलाने और संक्रमण का कारण बनने वाली स्थितियों को ट्रिगर कर सकते हैं।
  • कैथीटेराइजेशन : लंबे समय तक कैथेटर का उपयोग करने से भी बैक्टीरिया विकसित हो सकते हैं। खासकर उनमें जिन्हें हाॅस्पिटल या किसी अन्य हेल्थ केयर सेंटर में भर्ती होने की जरूरत पड़ती है।
  • डायबिटीज मेलाइटस : ब्लड शुगर के स्तर में वृद्धि होने से रोगी कई तरह के संक्रमणों के प्रति अतिसंवेदनशील हो जाता है। बता दें, डायबिटीज से ग्रस्त उन लोगों में यूटीआई की समस्या बहुत आम है जो लोग डायबिटीज को नियंत्रण में नहीं रखते हैं। इस स्थिति में उनके मूत्र में ग्लूकोज आ जाता है और ऐसे में बैक्टीरिया बढ़ने का जोखिम रहता है। (और पढ़ें - नॉर्मल शुगर लेवल रेंज कितना होना चाहिए)
  • गर्भावस्था : गर्भावस्था के दौरान मूत्र में सफेद रक्त कोशिका की संख्या में वृद्धि होना सामान्य बात है और यह किसी खतरे का संकेत नहीं है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हेल्दी प्रेग्नेंसी को बनाए रखने के लिए शरीर जरूरत के अनुसार खुद को ढालता है।
  • जन्म से मूत्र संबंधी संरचनाओं का असामान्य होना : पॉलीसिस्टिक किडनी जैसी जन्मजात स्थितियां प्यूरिया के जोखिम को बढ़ा सकती हैं।
  • प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर होना : जब प्रतिरक्षा प्रणाली उचित रूप से कार्य नहीं करती है, तो ऐसे में कई तरह के संक्रमण का जोखिम हो सकता है।

(और पढ़ें - रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के उपाय)

पेशाब में पस आने के लक्षण और संकेत - Pus cells in urine signs and symptoms in Hindi

प्यूरिया के संकेत और लक्षण अंतर्निहित कारणों के आधार पर अन्य बीमारियों के संकेतों और लक्षणों से मिलते जुलते हो सकते हैं :

निचले मूत्र पथ के संक्रमण के संकेत और लक्षण -

ऊपरी मूत्र पथ के संक्रमण के संकेत और लक्षण -

यूटीआई के अलावा अन्य जो भी कारण हैं उन्हें नीचे बताया गया है :

हमेशा इस बात का ध्यान रखना जरूरी है कि संभावित कई अंतर्निहित बीमारियां प्यूरिया का कारण बन सकती हैं और उनके लक्षण अलग-अलग हो सकते हैं।

पेशाब में पस आने का निदान - Pus cells in urine diagnosis in Hindi

प्यूरिया का निदान करने के लिए डाॅक्टर सबसे पहले रोगी की मेडिकल हिस्ट्री (चिकित्सक द्वारा पिछली बीमारियों व उनके इलाज से जुड़े प्रश्न पूछना) चेक करेंगे। इसके अलावा डाॅक्टर पहले से मौजूद मेडिकल कंडीशन और उनसे संबंधित ली जा रही दवाइयों के बारे में जानना चाहेंगे। इसके बाद शारीरिक परीक्षण किया जाएगा ताकि अन्य संभावित स्थितियों का भी निदान किया जा सके। हालांकि, कुछ मामलों में पेशाब के रंग, पारदर्शिता या स्पष्टता, गंध और चिपचिपाहट में अंतर दिख सकता है, इसलिए ठोस निदान केवल लैब टेस्ट के बाद ही किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, अन्य ब्लड टेस्ट और रेडियोलॉजिकल इमेजिंग तकनीक के जरिए संभावित बीमारियों और अंतर्निहित कारण का भी पता लगाया जा सकता है।

गर्भावस्था के मामले में, पहले एंटीनेटल टेस्ट (गर्भावस्था के दौरान बढ़ते भ्रूण में स्वास्थ्य समस्याओं का पता लगाना) में यूरिन माइक्रोस्कोपी टेस्ट किया जाता है, चाहे प्यूरिया के लक्षण मौजूद हों या नहीं।

(और पढ़ें - यूरिन टेस्ट क्या है)

पेशाब में पस आने का इलाज - Pus cells in urine treatment in Hindi

पेशाब में पस आने का उपचार इसके अंतर्निहित कारणों पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए, जेनिटोयूरिनरी ट्यूबरकुलोसिस, एसएलई और कावासाकी रोग के लिए विशिष्ट उपचार की आवश्यकता होती है। कुछ मामलों में, डॉक्टर पहले से मौजूद बीमारियों के लिए दवाओं का सेवन कम या बंद करने के लिए कह सकते हैं।

यूटीआई के इलाज के लिए पहले यूरिन कल्चर और सेंसिटिविटी टेस्ट किया जाता है, इसके बाद उचित एंटीबायोटिक दवाओं के जरिये स्थिति का उपचार किया जाता है। इसके अलावा ढेर सारा पानी पीने के लिए भी कहा जाता है, ताकि शरीर से रोगाणुओं को मूत्र के जरिये बाहर किया जा सके। यदि यूटीआई का मूल कारण फंगल इंफेक्शन है तो ऐसे में एंटिफंगल दवाएं लिखी जा सकती हैं।

(और पढ़ें - यूरिन इन्फेक्शन के घरेलू उपाय)

पेशाब में पस आने की रोकथाम - Pyuria prevention in Hindi

यूटीआई की वजह से होने वाले प्यूरिया को रोका जा सकता है, इसके लिए हमें निम्न सावधानियों को बरतने की जरूरत है :

  • अच्छे से सफाई करना : टाॅयलेट इस्तेमाल करने के बाद अच्छे से सफाई करना चाहिए, इससे मल के बैक्टीरिया को मूत्रमार्ग में जाने से रोका जा सकता है।
  • ढेर सारा पानी पीना : खूब पानी या तरल पदार्थ लेने से बैक्टीरिया को बाहर निकालने में मदद मिल सकती है। माना जाता है कि रोज छह से आठ गिलास पानी पीना चाहिए।
  • लंबे समय तक पेशाब न रोकें : पेशाब को रोकना बैक्टीरिया के विकास और संक्रमण को बढ़ावा दे सकता है।
  • सेक्स से पहले और बाद में पेशाब करना : मूत्र मार्ग से बैक्टीरिया शरीर के अंदर जा सकते हैं इसलिए महिलाओं को सेक्स से पहले और बाद में पेशाब करना चाहिए और जननांग वाले हिस्से को भी अच्छे से साफ किया जाना चाहिए। (और पढ़ें - एसटीडी का इलाज)
  • सेंट वाले प्रोडक्ट का न करें इस्तेमाल : बाजार में उपलब्ध खुशबूदार सैनिटरी पैड (नैपकिन) व अन्य चीजों का उपयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह योनि के पीएच में बदलाव व असंतुलन पैदा कर सकते हैं। इससे बैक्टीरिया और यीस्ट संक्रमण का खतरा रहता है।
  • गर्भनिरोधक के चुनाव में बरतें सावधानी : गैर-चिकनाई वाले कंडोम और शुक्राणुनाशक जेली जैसे गर्भनिरोधक तरीके बैक्टीरिया के विकास का कारण बन सकते हैं। यदि आप किसी साइड इफेक्ट को नोटिस करते हैं, तो वैकल्पिक तरीकों के बारे में डॉक्टर से परामर्श करें।
  • प्रोबायोटिक्स : दही व कुछ फर्मेंटेड फूड का सेवन करने से आंत और योनि में प्रोटेक्टिव बैक्टीरिया के विकास का खतरा रहता है।
  • रजोनिवृत्ति के लिए हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी (एचआरटी) : रजोनिवृत्ति यानी मेनोपाॅज भी यूटीआई का एक कारण है। यह वैजाइनल एट्रोफी को प्रेरित करता है, लेकिन एस्ट्रोजन के स्तर को विनियमित करके इस स्थिति को रोका जा सकता है। बता दें, वैजाइनल एट्रोफी योनि की दीवारों का सूखना, पतला होना व उनमें सूजन आना। (और पढ़ें - सूजन कम करने के घरेलू उपाय)
  • कैथेटर रिप्लेसमेंट : जो मरीज कैथेटर का प्रयोग कर रहे हैं, माइक्रोबियल इंफेक्शन को रोकने के लिए नियमित रूप से उसे बदलते रहना चाहिए।

पेशाब में पस आने की जटिलताएं - Pyuria complications in Hindi

यदि इस स्थिति को अनुपचारित छोड़ दिया जाए या इसका सही इलाज न किया जाए, तो यह किडनी को नुकसान पहुंचा सकता है और ऐसे में संक्रमण रक्तप्रवाह में फैल सकता है। इससे होने वाली जटिलताओं में शामिल हैं :

  • सेप्टिसीमिया (एक तरह का ब्लड पोइजन)
  • सेप्सिस
  • सेप्टिक शाॅक
  • मल्टीपल ऑर्गन डिस्फंक्शन सिंड्रोम
  • एक्यूट किडनी इंजरी
  • क्रोनिक किडनी डिजीज
  • किडनी फेलियर

(और पढ़ें - किडनी फेल होने की होम्योपैथिक दवा)



संदर्भ

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पेशाब में पस आना के डॉक्टर

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