बहेड़ा भारत में सबसे आम आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों में से एक है। कब्ज और दस्त से लेकर बुखार और अपच तक विभिन्न स्वास्थ्य स्थितियों के उपचार और प्रबंधन के लिए इस जड़ी बूटी का सदियों से उपयोग किया जा रहा है।

बहेड़ा ऐसे सक्रिय जैविक यौगिकों से भरपूर है, जो इसे रोगाणुरोधी, एंटीऑक्सीडेंट और प्रतिरक्षाविज्ञानी गुण प्रदान करते हैं। दिलचस्प बात यह है कि इस जड़ी-बूटी का संस्कृत नाम विभीतकी है जिसे अंग्रेजी में फीयरलेस और हिंदी में 'निर्भय' कहते हैं, जिसका अर्थ है कि यह बीमारी का भय दूर करता है।

क्या आपको पता है?

प्रसिद्ध आयुर्वेदिक जड़ी बूटी त्रिफला के तीन प्रमुख अवयवों में से एक बहेड़ा है, जबकि अन्य दो में आंवला और हरड़ शामिल हैं। आयुर्वेदिक विशेषज्ञों का कहना है कि त्रिफला में पांच (छह में से) स्वाद हैं जो कि त्रिदोष जैसे वात, पित्त और कफ को संतुलित करने में सहायक हैं। यह वजन घटाने, पेट दर्द के प्रबंधन, कब्ज और सूजन और ब्लड शुगर के स्तर को बनाए रखने में सहायक माना जाता है। त्रिफला में जीवाणुरोधी और एंटीऑक्सीडेंट गुण भी होते हैं।

इस लेख में बहेड़ा जड़ी-बूटी के स्वास्थ्य लाभ और दुष्प्रभावों, इसे पहचानने और इसका उपयोग करने के तरीके और सही खुराक सहित विशेषज्ञों द्वारा सुझाए गए सभी तरीकों के बारे में बताया गया है।

बहेड़ा के बारे में कुछ सामान्य जानकारी :

  • वानस्पतिक नाम : टर्मिनलिया बेलिरिका (Terminalia bellirica)
  • परिवार : कॉम्ब्रेटेकिया (Combretaceae)
  • पौधे के इस्तेमाल किए जाने वाले हिस्से : पूरा पौधा
  • अंग्रेजी नाम : बेलरिक मायरोबलन (Beleric Myrobalan)
  • संस्कृत नाम : अक्सा (Aksa), बिभीतकी (Bibhitaki), विभिता (Vibhita), अक्साका (Aksaka), विभिताकी (Vibhitaki)
  • भौगोलिक वितरण : बहेड़ा भारत, श्रीलंका, भूटान, बांग्लादेश, पाकिस्तान और नेपाल सहित पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में पाया जाता है। यह चीन, इंडोनेशिया, मलेशिया, कंबोडिया और वियतनाम में भी होता है। यदि भारतीय राज्यों की बात करें तो यह पंजाब, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में भी पाया जाता है।
  1. बहेड़ा की पहचान कैसे करें - How to identify baheda in Hindi
  2. बहेड़ा के फायदे - Health benefits of baheda in Hindi
  3. बहेड़ा की खुराक और उपयोग कैसे करें - Baheda dosage and how to use in Hindi
  4. बहेड़ा के नुकसान - Baheda side effects in Hindi

बहेड़ा एक बारहमासी पर्णपाती (इसके पत्ते हर पतझड़ में गिरते हैं) पेड़ है, जो कि 1000-2000 मीटर की ऊंचाई पर भी बढ़ता हुआ पाया जाता है। यह करीबन 30-50 मीटर की ऊंचाई तक बढ़ता है और कम से कम 20 मीटर ऊंचाई तक इसकी शाखाएं नहीं होती हैं। पौधे के ऊपरी हिस्से की शाखाएं गोलाकार होती हैं। इस पौधे की छाल क्रैक (चिटकी या फटी हुई) दिखाई देती हैं। यह बाहर की तरफ भूरी-नीली और अंदर से पीले रंग की होती हैं।

इसकी शाखाएं आमतौर पर सीधी होती हैं और पत्तियां अंडाकार होती हैं, जो शाखाओं पर अल्टरनेटली रूप से विकसित होती हैं। यहां अल्टरनेटली का मतलब है कि पत्तियां आमने-सामने की जगह आगे-पीछे निकलती हैं। बहेड़ा के पेड़ के नए पत्ते लाल-तांबे (reddish-copper) के रंग के होते हैं, जो कि बाद में तोते के जैसे गहरे हरे रंग में बदल जाते हैं।

बहेड़ा में हरे-सफेद फूल होते हैं, जो कि अक्टूबर और नवंबर के महीने में पेड़ पर गुच्छों के रूप में दिखाई देते हैं, साथ में नए पत्ते (इस पेड़ के पत्ते नवंबर माह में) निकलते हैं। इन फूलों से शहद जैसी तेज महक आती है। इस पौधे के फल आकार में अंडाकार, रंग में पीले और हल्के पीले रंग के रेशों से कवर होते हैं। इस पेड़ की पत्तियां पांच-पांच पत्तियों के समूह में होती हैं और इसके फल नवंबर-दिसंबर में दिखाई देते हैं।

(और पढ़ें - बच्चों को शहद खिलाने के फायदे)

जैसा कि ऊपर बताया गया है कि बहेड़ा त्रिफला के तीन प्रमुख अवयवों में से एक है और इस जड़ी बूटी का उपयोग विभिन्न स्वास्थ्य स्थितियों के प्रबंधन के लिए किया जाता है। आयुर्वेद के अनुसार बहेड़ा के फायदे अनेकों हैं, बहेड़ा का शरीर पर गर्म प्रभाव पड़ता है, यह खून को डिटॉक्सीफाई (विषाक्त पदार्थों को हटाना) करने में मदद करता है। यह खांसी और सर्दी से राहत देता है और आंखों के स्वास्थ्य और बालों के विकास के लिए अच्छा है।

वैज्ञानिक इस पौधे के विभिन्न फाइटोकंस्टीट्यूएंट्स (ऐसे रासायनिक यौगिक, जो पौधों में स्वाभाविक रूप से मौजूद होते हैं) और स्वास्थ्य पर इसके जड़ी बूटी के प्रभावों का अध्ययन कर रहे हैं। उनके अनुसार, बहेड़ा के कई औषधीय प्रभाव हैं, जिनमें एंटी-हाइपरटेंसिव, एंटी बैक्टीरियल और एंटीपायरेटिक गुण शामिल हैं।

आइए बहेड़ा के कुछ विज्ञान द्वारा समर्थित और पारंपरिक उपयोगों और स्वास्थ्य के लोए बहेड़ा के फायदे पर एक नजर डालते हैं।

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बहेड़ा के उपयोग दस्त रोकने में - Baheda for diarrhea in Hindi

बहेड़ा को लंबे समय से एंटामोइबा हिस्टोलिटिका और ई कोलाई की वजह से होने वाले दस्त और पेचिश के उपचार या प्रबंधन में प्रभावी माना जाता है। बहेड़ा फल का उपयोग पारंपरिक रूप से चाइनीज मेडिसिन में दस्त के इलाज के लिए किया जाता है।

भारत में किए गए एक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पाया था कि डायरिया के रोगियों को बहेड़ा फल के बायोएक्टिव अंश (मेथनॉल में निकाले गए) से बनी गोलियां दिए जाने पर उनमें दो सप्ताह के अंदर सुधार हुआ। (और पढ़ें - पेचिश के घरेलू उपाय)

एक पशु अध्ययन (चूहे पर किया गया) में पता चला कि बहेड़ा के फलों के गूदे का एथनॉलिक और जलीय अर्क दस्त के उपचार में प्रभावी पाया गया है। अध्ययन के अनुसार, इस अर्क में एंटी-डायरियल प्रभाव इसलिए हैं क्योंकि इसमें फ्लेवोनोइड्स, टैनिन और अल्कलॉइड्स मौजूद हैं। ये ऐसे यौगिक हैं जो 'इंटेस्टाइनल ट्रांसिट टाइम' (आंतों से गुजरने के लिए भोजन द्वारा लिया गया समय) में सुधार कर सकते हैं और आंतों की एक्टिविटी में कमी ला सकते हैं। बता दें, आंतों की एक्टिविटी बढ़ने से दस्त की समस्या हो सकती है। इसी तरह के परिणाम चीन में किए गए एक अन्य अध्ययन में प्राप्त हुए थे, जहां फल के जलीय अर्क में एंटी-डायरियल प्रभाव पाए गए थे।

जर्नल ऑफ एथनोफार्माकोलॉजी में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, भुने (ग्रिल्ड) हुए बहेड़ा फल में बेहतर एंटी-डायरियल प्रभाव होता है।

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बहेड़ा के औषधीय गुण लड़े रोगाणुओं से - Antimicrobial effects of baheda plant in Hindi

कई अध्ययन ने इस बात की ओर इशारा किया है कि बहेड़ा पौधों में रोगाणुरोधी प्रभाव हैं।

जीवाणुरोधी: एक शोध अध्ययन के अनुसार, बहेड़ा पौधे के पत्ती का इथेनॉल अर्क स्टैफिलोकोकस ऑरियस (जिसकी वजह से फोड़े जैसे स्किन इंफेक्शन होता है), सेराटिया मार्सेसेंस (जिसकी वजह से श्वसन, पित्त और मूत्र पथ का संक्रमण होता है) और क्लेबसिएला निमोनिया (जिसकी वजह से निमोनिया होता है) सहित कई मानव रोगजनक बैक्टीरिया के उपचार में प्रभावी है।

(और पढ़ें - निमोनिया होने पर क्या करें)

एक विट्रो (चिकित्सा अध्ययन या एक्सपेरिमेंट, जो लैब में एक टेस्ट ट्यूब की मदद से किया जाता है) स्टडी से पता चला है कि टी. बेलेरिका जिसे बहेड़ा नाम से भी जाना जाता है, यह सामान्य रोगजनक बैक्टीरिया के खिलाफ जीवाणुरोधी गतिविधि करने में सक्षम है।

बहेड़ा पौधे का फल अर्क रोगाणुरोधी दवाओं के लिए एक बेहतरीन स्रोत हो सकता है।

श्रीलंका में किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि बहेड़ा के फल का अर्क उन रोगाणुरोधी दवाओं के लिए एक अच्छा स्रोत हो सकता है, जिसका इस्तेमाल एमआरएसए (मेथिसिलिन रेजिस्टेंट स्टैफिलोकोकस ऑरियस) और एमडीआर स्यूडोमोनस एरुगिनोसा (जिसकी वजह से हॉस्पिटल या अन्य ऐसी जगह पर संक्रमण हो जाता है) सहित 'मल्टीपल ड्रग रेजिस्टेंट बैक्टीरिया' के खिलाफ किया जाता है। (और पढ़ें - पेट में इन्फेक्शन का इलाज)

ड्रग रेजिस्टेंट दुनियाभर के स्वास्थ्य चिकित्सकों और शोधकर्ताओं द्वारा सामना की जाने वाली एक बड़ी समस्या है, जिसमें रोगजनक सूक्ष्मजीव समय के साथ किसी दवा की प्रभावशीलता को कम कर देता है। बता दें, ऐसा कई बार एंटीबायोटिक का सामान्य से ज्यादा प्रयोग करने से भी हो सकता है।

एंटिफंगल: पांच अलग-अलग टर्मिनेलिया पौधे पर किए गए एक लैब टैस्ट से पता चला है कि बहेड़ा पौधा एस्परगिलस (जिसकी वजह से एस्परजिलोसिस होता है) सहित सामान्य फंगल रोगजनकों के खिलाफ एंटीफंगल एक्टिविटी कर सकता है। अध्ययन के अनुसार, बहेड़ा का अर्क फंगीसाइड कार्बेन्डाजिम (fungicide Carbendazim यानी कवक को खत्म करने वाला पदार्थ) की तुलना में अधिक गुणकारी है।

पहले हुई एक स्टडी से पता चला है कि बहेड़ा में एंटीफंगल एक्टिविटी इसलिए मौजदू है ​क्योंकि इसमें लिगान (lignans जो कि एक रासायनिक यौगिक है) और एनोलिगनन (anolignan) सहित कुछ जैव यौगिक शामिल हैं।

विट्रो स्डी में पता चला है कि बहेड़ा का इथेनोलिक अर्क रोगजनक कवक क्रिप्टोकोकस (जिसकी व​जह से मेनिन्जाइटिस यानी दिमागी बुखार होता है) के खिलाफ एंटीफंगल एक्टिविटी करने में सक्षम है।

(और पढ़ें - फंगल इन्फेक्शन में क्या ना खाएं)

टाइफाइड में बहेड़ा के लाभ - Baheda for typhoid in Hindi

टाइफाइड एक संक्रमण है जो साल्मोनेला टाइफी (Salmonella typhi) बैक्टीरिया के कारण होता है। यह संक्रमण दूषित भोजन और पानी से फैलता है। इसके लक्षणों में तेज बुखार, बदन दर्द, खांसी, कब्ज और सिरदर्द शामिल है।

टाइफाइड का इलाज आमतौर पर एंटीबायोटिक दवाओं से किया जाता है, लेकिन इसके उपचार में एंटीबायोटिक रेजिस्टेंट एक आम समस्या बन गई है। (और पढ़ें - टाइफाइड में क्या खाना चाहिए)

कई अध्ययनों से संकेत मिला है कि बहेड़ा टाइफाइड बुखार के खिलाफ उपचार में प्रभावी हो सकता है। चूहों पर किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि बहेड़ा का सेवन चूहों में एस टाइफिम्यूरियम (टाइफाइड जैसा संक्रमण) के कारण होने वाले ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करता है और इसलिए इसका उपयोग मनुष्यों में टाइफाइड बुखार के लिए दवा के विकास के लिए किया जा सकता है।

ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस एक ऐसी स्थिति है जो शरीर में अतिरिक्त मुक्त कणों के संचय के कारण विकसित होती है। हमारा शरीर सामान्य चयापचय के उत्पादों के रूप में मुक्त कण बनाता है, जो कि लगातार एंटीऑक्सीडेंट (शरीर में उत्पादित एक अन्य प्रकार के अणु) द्वारा बेअसर हो जाते हैं। हालांकि, तनाव और बीमारियों या संक्रमण की वजह से मुक्त कणों की संख्या बढ़ जाती है, जिससे चयापचय और किसी अंग के कार्यों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। (और पढ़ें - टाइफाइड होने पर क्या करें)

इंडियन जर्नल ऑफ एक्सपेरिमेंटल बायोलॉजी में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, बहेड़ा अर्क का प्रभाव सैल्मोनेला इंफेक्शन के खिलाफ सुरक्षात्मक है, जिसका अर्थ है कि यह बीमारी को रोक सकता है।

श्रीलंका में किए गए एक अध्ययन के अनुसार, बहेड़ा फल के जलीय और मेथनॉल अर्क दोनों एस. टाइफी के खिलाफ जीवाणुरोधी के तौर पर कार्य कर सकते हैं।

(और पढ़ें - टाइफाइड के घरेलू उपाय बताइए)

बहेड़ा का प्रयोग करें लिवर स्वास्थ्य के लिए - Baheda benefits for liver in Hindi

टी. बेलेरिका का उपयोग पारंपरिक रूप से हेपेटाइटिस के उपचार में किया जाता है। शोध अध्ययनों से पता चला है कि इस जड़ी बूटी में हेपेटोप्रोटेक्टिव गुण मौजूद हैं, जिसका अर्थ है कि यह लिवर टॉक्सिसिटी (किसी हानिकारक पदार्थ के संपर्क में आने पर लिवर में सूजन होना) को रोकता है। बता दें, लिवर शरीर से विषाक्त यौगिकों को खत्म करने का काम करता है। हेपटोटोक्सिसिटी एक ऐसी स्थिति है, जिसमें लिवर किसी बीमारी की वजह से अपना कार्य करने में असमर्थ हो जाता है। (और पढ़ें - हेपेटाइटिस बी का इलाज)

भारत के केरल राज्य में किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि बहेड़ा फल का इस्तेमाल चूहों में लिवर टॉक्सिसिटी का प्रबंधन करने में मदद करता है। इसी तरह के परिणाम दो अन्य अध्ययनों में भी प्राप्त हुए थे, जिनमें से एक अध्ययन से यह पता चला कि हेपटोटोक्सिसिटी पर बहेड़ा अर्क की खुराक का सकारात्मक प्रभाव पड़ा था। (और पढ़ें - हैपेटाइटिस डी के उपचार)

वर्ल्ड जर्नल ऑफ हेपाटोलॉजी में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, एलहैजिक एसिड (ellagic acid) जो कि बहेड़ा पौधे का एक फाइटोकॉन्स्टिट्यूएंट है, यह लिवर को हुए नुकसान के उपचार में अधिक प्रभावी है।

(और पढ़ें - लिवर में सूजन का आयुर्वेदिक उपचार)

बहेड़ा का गुण है डायबिटीज में फायदेमंद - Baheda benefits in diabetes in Hindi

विवो अध्ययन (जानवरों के मॉडल पर किए गए) में सुझाव दिया गया कि बहेड़ा फल का अर्क इंसुलिन के स्तर में सुधार करने के अलावा हाइपरग्लाइसेमिया (खून में शुगर या ग्लूकोज का स्तर बढ़ना) को रोकने में मदद कर सकता है। इस अध्ययन से यह भी पता चला है कि यह वजन घटाने, डायबिटिक न्यूरोपैथी और डिस्लिपिडेमिया सहित डायबिटीज की जटिलताओं को रोकने में प्रभावी है। इसके अलावा यह अग्न्याशय (इंसुलिन का उत्पादन करने वाला अंग) के स्वास्थ्य में सुधार करता है।

(और पढ़ें - इन्सुलिन टेस्ट क्या है)

इंटरनेशनल जर्नल ऑफ एक्सपेरिमेंटल बायोलॉजी में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, टी. बेलेरिका फल में एंटीडायबिटिक गुण होते हैं, जो सीधे इस फल की एंटीऑक्सीडेंट एक्टिविटी से संबंधित है।

जॉर्डन (मध्य पूर्व में देश) में किए गए एक अध्ययन के अनुसार, बहेड़ा फल का अर्क बेसल इंसुलिन के स्तर को बढ़ाता है और शरीर में ग्लूकोज होने पर इंसुलिन को रिलीज करता है। (और पढ़ें - डायबिटीज का आयुर्वेदिक इलाज)

भारत में किए गए एक अध्ययन में, शोधकर्ताओं के एक समूह ने उल्लेख किया है कि बहेड़ा फल के एथिल एसीटेट (रसायनिक यौगिक) और जलीय अर्क अल्फा-एमिलेज की एक्टिविटी को दबाता है, यह एक एंजाइम है, जो ग्लूकोज जैसे सिंपल शुगर में स्टार्च को तोड़ता है।

चूंकि, बहेड़ा फल का हाइपोग्लाइसेमिक प्रभावों पर नैदानिक परीक्षण नहीं हुआ है, ऐसे में अच्छा होगा कि मधुमेह रोगी किसी भी रूप में इस फल का सेवन करने से पहले अपने डॉक्टर से परामर्श करें।

(और पढ़ें - डायबिटीज में परहेज क्या है)

बहेड़ा का पौधा मलेरिया में है उपयोगी - Baheda benefits in malaria in Hindi

मलेरिया एक जानलेवा संक्रामक रोग है, जो कि किसी वायरस या बैक्टीरिया की वजह से नहीं होता है, बल्कि यह प्लाज्मोडियम परजीवी की वजह से होता है। यह एनोफिलीज नामक मच्छरों के काटने से फैलता है और इसके लक्षणों में बुखार, सिरदर्द और ठंड लगना शामिल है।

विट्रो और विवो स्टडी में आंवला, हरड़ और बहेड़ा पर किए गए अध्ययन से पता चला है कि बहेड़ा एंटीप्लाज्मोडियम एक्टिविटी से संपन्न है, हालांकि यह तीनों पौधे मलेरिया परजीवी के खिलाफ प्रभावी पाए गए हैं। (और पढ़ें - मलेरिया में क्या खाना चाहिए)

एक अन्य अध्ययन जो मिस्र में किया गया था, उसमें पाया गया कि टी. बेलेरिका का इस्तेमाल एंटीमलेरियल दवाओं में किया जा सकता है हालांकि, इस विषय पर अभी और अध्ययन की जरूरत है ताकि प्लास्मोडियम के खिलाफ बहेड़ा पौधे के असर की पुष्टि हो सके।

(और पढ़ें - मलेरिया की होम्योपैथिक दवा)

बहेड़ा का पेड़ में है इम्यूनोमॉड्यूलेटरी प्रभाव - Immunomodulatory effects of baheda plant in Hindi

शोध से पता चला है कि बहेड़ा पौधों में इम्यूनोमॉड्यूलेटरी प्रभाव हो सकता है। इम्युनोमोडुलेटर वे यौगिक होते हैं जो प्रतिरक्षा प्रणाली के काम को नियंत्रित या विनियमित करने और सामान्य करने में मदद करते हैं।

थाईलैंड में विट्रो अध्ययन में पाया गया कि बहेड़ा फल का एसीटोन अर्क बी और टी सेल के प्रसार को बढ़ावा देता है। बता दें, ये दोनों कोशिकाएं अनुकूली प्रतिरक्षा प्रणाली का एक हिस्सा हैं जो कि तब विकसित होता है, जब हम संक्रामक जीवों के संपर्क में आते हैं। यह किसी भी बाहरी हानिकारक पदार्थ के संपर्क में आने से होने वाली सूजन और लालिमा को कम करने में भी प्रभावी पाया गया है। (और पढ़ें - बच्चों की इम्युनिटी पावर कैसे बढ़ाएं)

विशेषज्ञों का मानना है कि बहेड़ा के पौधे में इम्यूनोमॉड्यूलेटरी प्रभाव इसलिए हैं क्योंकि इसमें गैलिक एसिड होता है। गैलिक एसिड मैक्रोफेज (प्रतिरक्षा प्रणाली की कोशिकाओं का एक प्रकार) के फागोसिटिक एक्शन (इंगल्फिंग रोगजनकों) को बढ़ाने में मदद करता है।

चूहों पर किए गए एक अन्य अध्ययन में पता चला है कि बहेड़ा विशिष्ट (विशिष्ट रोगजनकों के खिलाफ) और गैर-विशिष्ट प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया में सुधार करता है।

बहेड़ा का मेथेनॉलिक अर्क सेलुलर और ह्यूमरल इम्यून रिस्पॉन्स को उत्तेजित करने में प्रभावी है। हालांकि, ह्यूमरल प्रतिरक्षा प्रणाली पर बहेड़ा पौधों की प्रभावशीलता और दुष्प्रभावों (यदि कोई हो) की पुष्टि करने के लिए अब भी अधिक अध्ययन की आवश्यकता है।

(और पढ़ें - इम्यूनिटी कमजोर होने के कारण क्या हैं)

बहेड़ा चूर्ण हृदय प्रणाली के लिए है उपयोगी - Baheda benefits for the cardiovascular system in Hindi

हृदय प्रणाली के लिए बहेड़ा के पौधों के कई लाभ हैं। पारंपरिक रूप से हाई बीपी के उपचार के लिए बहेड़ा के पौधों का उपयोग किया जा रहा है। जर्नल ऑफ फूड एंड ड्रग एनालिसिस में प्रकाशित एक अध्ययन से पता चला है कि टी. बेलेरिका लो बीपी में मदद करता है और इसलिए इसका उपयोग हाई बीपी के प्रबंधन के लिए भी किया जा सकता है। (और पढ़ें - हाई बीपी के घरेलू उपचार)

दूसरा, जानवरों पर किए गए अध्ययन से पता चला है कि बहेड़ा के पौधों में मौजूद प्रोटीन और फाइटोएस्ट्रोल एंजियोजेनेसिस (नई रक्त वाहिकाओं का बनना) में प्रभावी हो सकता है और इसीलिए यह हृदय रोगों के उपचार में प्रयोग किया जा सकता है।

अनुसंधान से पता चला है कि टी. बेलेरिका फल में एंटीथ्रॉम्बोटिक और थ्रोम्बोलाइटिक एक्टिविटी होती है, यानी यह शरीर में खून के थक्के बनने से रोकता है और मौजूदा खून के थक्कों को तोड़ता है। थ्रोम्बस (वाहिका में बनने वाला खून का थक्का) की वजह से स्ट्रोक और दिल के दौरे जैसी गंभीर स्थितियां विकसित हो सकती हैं।

(और पढ़ें - हार्ट अटैक आने पर क्या करना चाहिए)

बहेड़ा का पाउडर पेट को रखे अच्छा - Baheda powder benefits for stomach in Hindi

बहेड़ा का पारंपरिक रूप से गैस्ट्रिक अल्सर, पेट के कैंसर और गैस्ट्राइटिस के प्रबंधन के लिए उपयोग किया जा रहा है। विवो (पशु आधारित) अध्ययन में यह बात सामने आई है कि यह पौधा एंटीसेलेरोजेनिक एक्टिविटी को बढ़ावा दे सकता है। भारत के एक शहर बंगलौर में किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि बहेड़ा फल का हाइड्रोक्लोरिक अर्क पेट में एसिडिटी को कम करने में मदद करता है, जो पेप्टिक अल्सर के जोखिम कारकों में से एक है और इसलिए इसका उपयोग अल्सर के लिए एक प्राकृतिक उपचार के रूप में किया जा सकता है। (और पढ़ें - पेट के छाले में क्या खाना चाहिए)

एक अन्य पशु-आधारित अध्ययन में पाया गया कि बहेड़ा फल का मेथनॉल अर्क गैस्ट्रिक म्यूकोसा (पेट की अंदरूनी परत) को होने वाले नुकसान के खिलाफ एक सुरक्षात्मक प्रभाव प्रदान करता है, इसलिए यह गैस्ट्रिक अल्सर को रोकने में मदद करता है।

एथनोफार्माकोलॉजी के जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, टी. बेलेरिका गैस्ट्रिक कॉन्ट्रैक्शन को कम करता है और दस्त से राहत देता है।

(और पढ़ें - एसिडिटी का होम्योपैथिक इलाज क्या है)

बहेड़ा के अन्य स्वास्थ्य लाभ - Other health benefits of baheda plant in Hindi

यहां बहेड़ा पौधे के कुछ अन्य स्वास्थ्य लाभ बताए जा रहे हैं, जिनके बारे में आपको पता होना चाहिए :

  • खरगोशों पर किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि टी. चेबुला (हरड़) और टी. बेलेरिका (बहेड़ा) से बना अर्क कोलेजन और ग्लाइकोसामिनोग्लाइकेन के उत्पादन को उत्तेजित करके और फाइब्रोब्लास्ट फंक्शन में सुधार करके घाव भरने में तेजी लाता है। कोलेजन एक प्रोटीन है जो त्वचा को मजबूती और लोच प्रदान करता है। फाइब्रोब्लास्ट ऐसी कोशिकाएं हैं जो कोलेजन का उत्पादन करती हैं और किसी चोट के बाद त्वचा की चिकित्सा को बढ़ावा देती हैं। ग्लाइकोसामिनोग्लाइकेन्स एक प्रकार की शुगर है जो कोलेजन और ऐसे प्रोटीन को बनाए रखता व उन्हें सपोर्ट करता है, जो त्वचा की संरचना को बनाए रखने में मदद करते हैं।
  • बहेड़ा पौधे में ब्रोन्कोडायलेटरी गुण होने का संकेत मिला है और इसलिए यह अस्थमा के लक्षणों के प्रबंधन में भी प्रभावी है। टी. बेलेरिका अर्क के इस्तेमाल से फेफड़ों के कैंसर, लिवर कैंसर, स्तन कैंसर और ल्यूकेमिया सहित कई प्रकार के कैंसर पर निरोधात्मक प्रभाव पड़ता है। (और पढ़ें - कैंसर से बचने के लिए क्या खाना चाहिए)
  • एक पशु अध्ययन के अनुसार, बहेड़ा पौधों में एंटीसाइकोटिक गुण होते हैं। हालांकि, इस फंक्शन को बेहतर ढंग से समझने के लिए अब भी अधिक अध्ययन की आवश्यकता है। एंटीसाइकोटिक ऐसी दवाएं हैं जो मतिभ्रम, व्यामोह (paranoia) और भ्रम जैसी स्थितियों के प्रबंधन के लिए उपयोग की जाती हैं।
  • त्रिफला और इसके सभी घटकों के बीच एक तुलनात्मक अध्ययन में पाया गया कि बहेड़ा के पौधे अल्जाइमर के प्रबंधन में भी प्रभावी हो सकते हैं, क्योंकि यह एंटीकोलिनेस्टरेज पर निरोधात्मक प्रभाव डालते हैं। (और पढ़ें - अल्जाइमर में क्या खाना चाहिए)
  • एसिटाइलकोलिनेस्टरेज एक एंजाइम है, जो एसिटाइलकोलाइन को तोड़ता है और मस्तिष्क तक पहुंचने वाले संकेतों में हस्तक्षेप करता है। बता दें, एसिटाइलकोलाइन एक जरूरी न्यूरोट्रांसमीटर है, जो मस्तिष्क और शरीर के सामान्य कार्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  • बहेड़ा का पौधा बालों के विकास और वजन घटाने के लिए प्रभावी माना जाता है। हालांकि, इस प्रभाव को साबित करने के लिए कोई अध्ययन नहीं हैं। (और पढ़ें - वजन घटाने के लिए डाइट चार्ट)
  • बहेड़ा फल पारंपरिक रूप से आंखों के रोगों, खांसी, बिच्छू के डंककुष्ठ और बवासीर के इलाज के लिए भी उपयोग किया जाता है।
  • बहेड़ा के बीज का तेल गठिया में प्रभावी माना जाता है।
  • शोध अध्ययन से पता चला है कि बहेड़ा गुर्दे की पथरी के उपचार में असरदार है और यह किडनी के समग्र कार्यों में सुधार कर सकता है।

(और पढ़ें - गठिया की आयुर्वेदिक दवा क्या है)

किसी भी जड़ी बूटी की सही खुराक व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य स्थिति और अन्य कारकों के आधार पर अलग-अलग हो सकती है। इसलिए किसी भी रूप में बहेड़ा लेने से पहले डॉक्टर से परामर्श करें।

इंडियन जर्नल ऑफ नेचुरल प्रोडक्ट्स एंड रिसोर्सेज में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, स्वास्थ्य समस्याओं के लिए बहेड़ा की खुराक का निम्नलिखित मात्रा में इस्तेमाल किया जा सकता है :

  • अपच, अस्थमा और खांसी : बहेड़ा का फल, पिप्पली और मुलेठी की जड़ को बराबर मात्रा में लेकर पाउडर तैयार करें। उपयोग से पहले बहेड़ा से बीज जरूर निकाल लें। इस पाउडर की 2 चम्मच मात्रा को लगभग आधा लीटर पानी में तब तक उबालें, जब तक कि कुल मात्रा लगभग 300 मिली तक कम न हो जाए। अब करीबन 100 मिलीलीटर की मात्रा में इसे दिन में दो बार लें।
  • घाव : बहेड़ा फल के छिलके से कम मात्रा में पेस्ट तैयार करें और इसे त्वचा पर चकत्ते या मामूली घावों पर लगाएं। आप त्वचा की जलन को कम करने में मदद करने के लिए बहेड़ा पाउडर, शहद और गर्म पानी से बना लेप भी लगा सकते हैं।
  • गले की खराश : बहेड़ा के फल के टूटे हुए छिलकों को चूसने से गले की खराश और खांसी दोनों से राहत मिलती है।
  • दांतों की समस्या : लगभग 50-75 मिली पानी में बहेड़ा के फलों के छिलके को उबालकर काढ़ा बनाकर पीने से मुंह से दुर्गंध, अल्सर और अन्य सामान्य मौखिक समस्याएं कम होती हैं। (और पढ़ें - गले में छाले का इलाज)

बहेड़ा फल के दुष्प्रभाव निम्नलिखित हैं :

  • गर्भावस्था के दौरान बहेड़ा का किसी भी प्रकार से इस्तेमाल असुरक्षित माना जाता है।
  • स्तनपान के दौरान बहेड़ा का सेवन या इस्तेमाल करना कितना सुरक्षित है, इस बात को लेकर कोई सबूत नहीं हैं। यदि आप शिशु को अपना दूध पिलाती हैं, तो ऐसे में बहेड़ा के प्रयोग के बारे में डॉक्टर से परामर्श करें।
  • यदि आप किसी क्रोनिक स्थिति से जूझ रहे हैं तो इसके इस्तेमाल से पहले अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
  • बहेड़ा कुछ दवाओं के असर में हस्तक्षेप कर सकता है। यदि आप कोई भी प्रेस्क्राइब्ड या नॉन-प्रेस्क्राइब्ड दवाएं ले रहे हैं, तो इस जड़ी बूटी का उपयोग तब तक न करें जब तक कि आपका डॉक्टर इसके प्रयोग करने की सलाह न दें।
  • एक पशु अध्ययन से पता चला कि बहेड़ा में प्रजनन-रोधी प्रभाव हैं।

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संदर्भ

  1. Kumari Swati, Jeedigunta Mythili Krishna, Joshi Arun B, Agarwal. A pharmacognostic, phytochemical and pharmacological review of Terminalia bellerica. Journal of Pharmacognosy and Phytochemistry. 2017; 6(5): 368-376.
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