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हैरानी की बात है कि इन दिनों वयस्कों की तरह छोटे-छोटे बच्चे भी किसी न किसी बात पर चिंता से घिरे रहते हैं। कई बार उनकी चिंता इतनी बढ़ जाती है कि वे अवसाद में आ जाते हैं। अंततः उन्हें सामान्य स्थिति में लाने के लिए मनोचिकित्सक के पास ले जाया जाता है और तरह-तरह की दवाईयों की मदद ली जाती है। हालांकि ऐसी स्थिति सबके साथ नहीं है। लेकिन किसी न किसी वजह से बच्चे चिंता में जरूर रहते हैं। ऐसे में पैरेंट्स की जिम्मेदारी बनती है कि उनकी चिंताओं को समझें और सुलझाने की कोशिश करें। अगर आप नहीं समझ पा रहे हैं कि किस तरह अपने चिंतित बच्चे की मदद करें तो यहां बताए गए तरीकों को आजमाएं।

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सहज होने दें
अगर आप नोटिस कर रहे हैं कि आपका बच्चा पिछले कुछ दिनों से चिंता में है। वह किसी से ज्याद बोल नहीं रहा। लोगों को मिलने से भी बच रहा है। ऐसे में सबसे पहले आप स्थितियों को सहज करें। इसके लिए उसके साथ उसका पसंदीदा गेम खेलें, उसे गोद में लें, उसके साथ गाने सुनें। बच्चे को जो-जो चीजें पसंद है, वह सब करें। इस तरह बच्चे का मन भटकेगा। वह सहज होने की कोशिश करेगा। इस तरह वह चिंतामुक्त हो सकेगा।

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सामना करना सिखाएं
बेशक कुछ देर के लिए आपने उसका मन भटका दिया है और सहज कर दिया है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उसकी चिंता खत्म हो गई है। बच्चे को सहज करने के बाद यह जानने की कोशिश करें कि वह चिंता में क्यों है? उसे क्या बात परेशान कर रही है? कोई ऐसी बात तो नहीं जिससे वह डर रहा है? इन सब बातों को जानकर उसे उसके डर से सामना करना सिखाएं। कहने का मतलब है कि उसे कहें कि अपनी चिंता की तह तक जाए और समस्या को सुलझाए। बच्चे को यह समझाएं कि समस्या से भागना चिंता का समाधान नहीं होता। इसके इतर समस्या को सुलझाने से चिंता जड़ से खत्म होती है।

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खुद सुलझाने दें समस्या
जिस तरह आप बच्चे को समस्या का सामना करना सिखा रही हैं, उसी तरह उसे कहें कि समस्या का समाधान भी वह खुद ही खोजे। हां, इसके लिए आप उसकी मदद करें। उसके डर या चिंता से संबंधित विषय पर बात करें। उसे सलाह दें ताकि बच्चा सही राह पकड़ सके। लेकिन समस्या सुलझाने के लिए उसे खुद कहें। आप इस बात का ध्यान रखें कि उसकी चिंताओं पर आप जितना बात करेंगे, उतना वह डरेगा तथा उसके लिए परेशानी राई का पहाड़ बन जाएगी। इसके बजाय आप उसके सुझाव को सुनें। वह क्या करना चाहता है, इस पर बात करें। समाधान के लिए उससे प्रति प्रश्न करें। इस तरह उसे समाधान खोजने में मदद मिलेगी। इस तरह उसका आत्मविश्वास भी बढ़ेगा और भविष्य में किसी बात को लेकर चिंता नहीं करेगा या फिर खुद उसका समाधान खोजने में सक्षम होगा।

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सकारात्मक रहने को कहें
चिंता एक ऐसी मनोचिकित्सक बीमारी है जो आसानी से ठीक हो सकती है। एक अध्ययन से इस बात की पुष्टि हुई है कि टाॅक थेरेपी और दवाईयों की मदद से 80 फीसदी बच्चे चिंता से उबर जाते हें। हालांकि कई बच्चों में चिंता को किसी बीमारी की तरह नहीं समझा जाता है और बिना किसी उपचार के छोड़ दिया जाता है। पैरेंट्स सोचते हैं कि बच्चे खुद ब खुद अपनी समस्याओं से निकल जाएंगे। चिंतित होना बच्चों के लिए सामान्य है। लेकिन इस तरह सोचना सही नहीं है। अपने बच्चे को उसकी समस्या का सही और गलत, दोनों पहलू से अवगत कराएं। साथ ही सकारात्मक रहने को कहें। उसे अपनी समस्या से सीखने को कहें।

बच्चों की चिंता को हल्के में लेना सही नहीं है। पैरेंट्स को उनकी चिंता को समझना चाहिए। साथ ही समस्या से उबरने में उनकी मदद करनी चाहिए। तभी बच्चे चिंता मुक्त होकर सामान्य रह सकेंगे और भविष्य में समस्याओं से बेहतर तरीके से निपट सकेंगे।

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