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कोलन इन्फेक्शन (बृहदान्त्र संक्रमण) - Colon infection in Hindi

Dr. Rajalakshmi VK (AIIMS)MBBS

January 07, 2021

January 13, 2021

कई बार आवाज़ आने में कुछ क्षण का विलम्ब हो सकता है!
कोलन इन्फेक्शन
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चिकित्सकीय रूप से, कोलन इन्फेक्शन को संक्रामक कोलाइटिस (इंफेक्शियस कोलाइटिस) के रूप में जाना जाता है। हालांकि यह अल्सरेटिव कोलाइटिस से अलग है, जिसमें बृहदान्त्र और/या मलाशय में सूजन आ जाती है। अल्सरेटिव कोलाइटिस में, स्थिति आमतौर पर क्रोनिक (आजीवन प्रभावित करने वाली) होती है और यह गैर-संक्रामक होती है।

आमतौर पर इंफेक्शियस कोलाइटिस की समस्या तब आती है जब व्यक्ति सही तरीके से पका हुआ खाना न खाए, दूषित भोजन या दूषित पानी पिए। इसके सामान्य कारणों में ई कोलाई संक्रमणसिगिल्लोसिसक्लोस्ट्रीडियम डिफिसाइल इन्फेक्शन और साल्मोनेला इन्फेक्शन शामिल है। एंटीबायोटिक दवाओं का बहुत अधिक उपयोग करने की वजह से भी आंत संबंधित परेशानियां हो सकती हैं।

बड़ी आंत में इन्फेक्शन के लक्षण में पेट दर्द से लेकर जोड़ों में दर्दबुखारथकानदस्त (कभी-कभी दस्त में खून आना) और अवसाद शामिल है। वास्तव में यह लक्षण अंतर्निहित समस्या और संक्रमण की गंभीरता पर निर्भर करते हैं।

कोलन इन्फेक्शन के निदान के लिए आमतौर पर इमेजिंग टेस्ट (एक्स रेअल्ट्रासाउंड, अल्ट्रासोनोग्राफी, एमआरआई), ब्लड टेस्ट, लक्षणों का विश्लेषण करना व लैब टेस्ट की मदद ली जाती है। कोलन इन्फेक्शन का उपचार इसके अंतर्निहित कारणों पर निर्भर करता है। जरूरत पड़ने पर सर्जरी की जा सकती है।

कोलन क्या होता है?

कोलन बड़ी आंत का सबसे बड़ा भाग है, इसलिए इसे बड़ी आंत भी कहा जाता है। यह पाचन तंत्र का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो कि किसी ट्यूब की तरह दिखता है।​ इसका एक सिरा छोटी आंत और दूसरा मलाशय से जुड़ा होता है। कोलन आंशिक रूप से पचे हुए भोजन से पानी और कुछ पोषक तत्वों और इलेक्ट्रोलाइट्स को हटाने का काम करता है।

(और पढ़ें - पोषण की कमी के कारण)

कोलन इन्फेक्शन क्या है? - What is Colon infection in Hindi

कोलन इन्फेक्शन यानी बृहदान्त्र संक्रमण काफी आम समस्या है, जिसका मुख्य लक्षण बृहदान्त्र के अंदरूनी परत में सूजन आना है। कोलन इन्फेक्शन के कारणों में वायरल इंफेक्शन या बैक्टीरियल इन्फेक्शन (जिसमें यौन संचारित रोग शामिल हैं) और एंटीबायोटिक दवाओं का अत्यधिक उपयोग करना शामिल है।

कोलन इन्फेक्शन और अल्सरेटिव कोलाइटिस के बीच अंतर - Difference between Colon Infection and Ulcerative Colitis in Hindi

कोलन इन्फेक्शन और अल्सरेटिव कोलाइटिस दोनों में कोलन या बड़ी आंत में सूजन आ जाती है। हालांकि, इनमें भिन्नताएं भी हैं:

  • कोलन इन्फेक्शन किसी को भी हो सकता है जबकि अल्सरेटिव कोलाइटिस तब होता है जब परिवार के किसी सदस्य को यह बीमारी पहले हो चुकी हो। कभी-कभी यह किसी ऑटोइम्यून विकार से भी जुड़ा हो सकता है।
  • अल्सरेटिव और इंफेक्शियस कोलाइटिस के बीच एक और महत्वपूर्ण अंतर यह है कि अल्सरेटिव कोलाइटिस में लगातार सूजन की समस्या बनी रहती है जबकि इंफेक्शियस कोलाइटिस में बृहदान्त्र यानी कोलन की अंदरूनी परत के कुछ हिस्से में सूजन होती है।
  • इंफेक्शियस कोलाइटिस रोगाणु की वजह से होता है। इसके उपचार में एंटीबायोटिक या एंटीवायरल कोर्स शामिल है। हालांकि हल्के मामलों में, रोगी का शरीर अपने आप संक्रमण से लड़ने में सक्षम हो सकता है। जबकि अल्सरेटिव कोलाइटिस के लिए आजीवन उपचार की जरूरत होती है जिसमें आहार से जुड़ी सख्ती भी शामिल है। (और पढ़ें - संतुलित आहार चार्ट)

कोलन इन्फेक्शन के लक्षण - Colon infection Symptoms in Hindi

बड़ी आंत या कोलन में इन्फेक्शन के लक्षण पेट में सूजन (गेस्ट्राइटिस) और फ्लू से मिलते जुलते हो सकते हैं। हालांकि कुछ मामलों में यह लक्षण अधिक गंभीर हो सकते हैं जैसे:

अंतर्निहित स्थितियों की वजह से कई बार कोलाइटिस हो सकता है और इनके लक्षण अलग-अलग हो सकते हैं।

कोलन इन्फेक्शन का कारण - Colon infection Causes in Hindi

कोलन, बड़ी आंत में जठरांत्र पथ (जीआई) के आखिर में होता है। यह पानी का शोषण करके बचे हुए अपशिष्ट को मल के रूप में इकठ्ठा करता है और बाद में यह मल गुदा मार्ग के जरिए बाहर आ जाता है। चूंकि कोलन का हिस्सा काफी विस्तृत होता है इसलिए इसमें संक्रमण की आशंका बनी रहती है। 

निम्नलिखित रोगजनक संक्रामक कोलाइटिस का कारण बन सकते हैं:

  • बैक्टीरिया
    ये आमतौर पर बृहदान्त्र या बड़ी आंत के संक्रमण से जुड़े बैक्टीरिया होते हैं:
    • साल्मोनेला - साल्मोनेला एक प्रकार का बैक्टीरिया है जो स्वाभाविक रूप से आंत में मौजूद होता है। यह अधपका मीट या बिना पाश्चरिकृत किया हुआ दूध का सेवन करने से शरीर में प्रवेश करता है और बैक्टीरियल इन्फेक्शन का कारण बनता है। उपचार के लिए फ्लूइड रिप्लेसमेंट लेने और आराम करना फायदेमंद होता है। कुछ मामलों में, संक्रमण गंभीर हो सकता है और पूरे शरीर में चकत्ते आ सकते हैं। ऐसे में अस्पताल में भर्ती होने की आवश्यकता हो सकती है।
    • ई. कोलाई - दूषित भोजन करने या खाने से पहले अच्छे से हाथ ना धुलने पर ई. कोलाई संक्रमण हो सकता है। गंभीर मामलों में, इस संक्रमण की वजह से किडनी की बीमारी, निर्जलीकरण, पेशाब कम आने जैसी समस्या हो सकती है। हल्के मामलों में संक्रमण आमतौर पर पांच से 10 दिनों तक रहता है जिसे घरेलू देखभाल से ठीक किया जा सकता है। हालांकि, यदि दस्त गंभीर हो जाए तो तरल पदार्थों की कमी को पूरा करने के लिए ड्रिप की आवश्यकता हो सकती है।
    • क्लोस्ट्रीडियम डिफिसाइल - सी. डिफिसाइल बड़ी आंत में स्वाभाविक रूप से मौजूद होता है, यह संक्रमण का कारण बन सकता है लेकिन यदि इसे गुड बैक्टीरिया संतुलित करता है तो यह संक्रमण को कम कर सकता है। जब इससे संक्रमित व्यक्ति अपने हाथ अच्छे से नहीं धोता है तो यह बैक्टीरिया मल में पारित हो जाते हैं और भोजन, सतहों और वस्तुओं में फैल जाते हैं। 
      जो अधिक उम्र के हैं और एंटीबायोटिक दवाएं लेते हैं उनमें भी कई बार क्लॉस्ट्रिडियम डिफिसाइल कोलाइटिस हो जाता है। पेट में ऐंठन होना इसका एक सामान्य लक्षण है और कुछ मामलों में मल से खून भी आ सकता है। इसके उपचार में विशिष्ट एंटीबायोटिक ली जा सकती हैं जोकि काफी प्रभावी होती हैं। संक्रमण आमतौर पर 10 दिनों में ठीक हो जाता है। गंभीर मामलों में किडनी इन्फेक्शन, छोटी आंत या बृहदान्त्र की दीवार में एक छेद होना शामिल है।
    • शिगेला - भारतीय उपमहाद्वीप में बच्चों में सिगिल्लोसिस एक आम संक्रमण है। शिगेला बैक्टीरिया के लक्षणों में बुखार, दस्त, सुस्ती, भूख न लगना, उल्टी और लगातार मल त्याग करने की इच्छा महसूस करना आदि शामिल है। बड़े होते होते लक्षण हल्के होने लगते हैं।
    • कैम्पिलोबैक्टर - कैम्पिलोबैक्टर जेजुनी  'एक्यूट इंफेक्शियस टाइप कोलाइटिस या एक्यूट सेल्फ-लिमिटेड कोलाइटिस का कारण बनता है।
    • येरसिनिया एंटरोकोलिटिका
    • माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस
       
  • वायरस
  • परजीवी
    • एंटामोइबा हिस्टोलिटिका - यह प्रोटोजोआ एकल कोशिका वाले जीव हैं, जो बृहदान्त्र के म्यूकोसल परत में प्रवेश कर सकता है और सूजन का कारण बनता है।
       
  • यौन संचारित संक्रमण (एसटीडी) 
    मलाशय में संक्रमण बृहदान्त्र को भी प्रभावित कर सकता है। कुछ एसटीडी बृहदान्त्र संक्रमण का कारण बनने के लिए जाने जाते हैं, वे हैं:
  • आइस्केमिक कोलाइटिस
    आइस्केमिक कोलाइटिस तब होता है जब बड़ी आंत में रक्त का प्रवाह बंद या बाधित हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप बृहदान्त्र में सूजन आ जाती है। धमनियां संकीर्ण होने की वजह से ऐसा होता है लेकिन कुछ संक्रमणों से जटिलताएं भी हो सकती हैं उदाहरण के लिए, सेप्टिक शॉक और हेमोरेजिक शॉक की वजह से आइस्केमिक कोलाइटिस हो सकता है। इसके संकेतों में पेट में तेज दर्द होना, मल का रंग चमकदार लाल होना और दस्त शामिल है।

    ज्यादातर मामलों में, घर पर देखभाल करना पर्याप्त होता है और बीमारी बिना किसी जटिलता के ठीक हो जाती है। गंभीर मामलों में, एंटीबायोटिक्स और / या सर्जरी की आवश्यकता हो सकती है। गंभीर मामलों में गैंग्रीन भी हो सकता है।

  • अन्य प्रकार के कोलाइटिस
    • एलर्जिक कोलाइटिस - यह आमतौर पर शिशुओं को अधिक प्रभावित करता है। यह दूध से होने वाली एलर्जी से ट्रिगर होता है और इसकी वजह से गैस्ट्रिक (जठर-संबंधी) समस्याएं हो सकती हैं। इबुप्रोफेन जैसे दर्द निवारक या एंटीबायोटिक दवाओं का व्यापक उपयोग भी एलर्जिक कोलाइटिस का जिम्मेदार हो सकता है।
    • माइक्रोस्कोपिक कोलाइटिस - इसकी वजह से बड़ी आंत (बृहदान्त्र) में सूजन आ जाती है और व्यक्ति को लगातार पानी जैसे दस्त आने लगते हैं। इसमें जिन ऊतकों में सूजन आती है उन्हें माइक्रोस्कोप की मदद से ही पहचाना जा सकता है। यह सूजन दो प्रकार की होती है; कोलेजनस कोलाइटिस जिसमें बृहदान्त्र में कोलेजन प्रोटीन की परत मोटी हो जाती है, बता दें, कोलेजन शरीर में सबसे अधिक मात्रा में पाए जाने वाला प्रोटीन है। दूसरा है - लिम्फोसाइटिक कोलाइटिस, जिसमें बृहदान्त्र में सफेद रक्त कोशिकाओं में पर्याप्त मात्रा में वृद्धि होती है। इसके लक्षणों में मूत्र असंयमिता, निर्जलीकरण और पानी जैसे दस्त शामिल हैं। कुछ बैक्टीरिया और वायरस भी इस बीमारी का कारण बन सकते हैं, लेकिन ऑटोइम्यून रोग जैसे कि रुमेटाइड गठिया, सीलिएक डिजीज और सोरायसिस इसके सामान्य अंतर्निहित कारणों में से एक है। धूम्रपान और कुछ एनएसएआईडी जैसी दवाओं की नियमित खपत से भी जोखिम बढ़ सकता है। (और पढ़ें: धूम्रपान नहीं छोड़ेंगे तो होंगे ये 10 नुकसान)

आमतौर पर यह बीमारी अपने आप ही ठीक हो जाती है, लेकिन कभी-कभी दवाइयां जैसे कि स्टेरॉयड, एंटिडायरियल दवा (दस्त को रोकने वाली) और सूजन को ठीक करने वाली दवाओं की आवश्यकता हो सकती है। 

कोलन इन्फेक्शन से बचाव - Colon infection Prevention in Hindi

कोलन इन्फेक्शन को एक्यूट इन्फेक्शियस टाइप कोलाइटिस या एक्यूट सेल्फ लिमिटेड कोलाइटिस (एएसएलसी) के रूप में भी जाना जाता है। यदि व्यक्तिगत स्वच्छता और साफ़ व शुद्ध भोजन खाया जाए तो इसे बड़े पैमाने पर रोका जा सकता है। इन्फेक्शियस कोलाइटिस के मामले में निम्नलिखित कदम उठाए जा सकते हैं:

  • खाना खाने या पकाने से पहले अच्छी तरह से हाथ धोएं
  • पकाने से पहले उस चीज को अच्छे से धोना
  • साफ पानी और पाश्चरीकृत या उबला दूध पीना
  • कच्चा मीट न खाना और उसे अन्य खाद्य पदार्थों से अलग रखना
  • खाना पकाने और खाने वाले बर्तन साफ ​​रखना
  • खाने से पहले मांस और अंडे को अच्छी तरह पकाया जाना सुनिश्चित करना
  • यदि आप बीमार हैं तो खाना नहीं बनाना
  • कुछ लोगों को कुछ फूड प्रोडक्ट की वजह से एलर्जी हो सकती है, जिससे उन्हें कोलाइटिस हो सकता है। लक्षणों को बिगड़ने से रोकने के लिए ऐसे खाद्य पदार्थों का सेवन ना करना सबसे अच्छा उपाय है। कैफीन, कच्चे फल व सब्जियां और शराब का सेवन आमतौर पर उन लोगों को नहीं करना चाहिए जो बृहदान्त्र संक्रमण से पीड़ित हैं।
  • धूम्रपान की आदत छोड़ने से भी कोलन इंफेक्शन का खतरा कम हो जाता है।
  • एक बार में अधिक मात्रा में खाने की बजाय बार बार छोटे छोटे हिस्सों में खाना खाएं, इससे कोलन को भोजन को संसाधित करने का समय मिल सकेगा।
  • इसमें अंतर्निहित परिस्थितियों से निपटना महत्वपूर्ण होता है, हालांकि इन्फेक्शियस कोलाइटिस के अधिकांश मामले 10-14 दिनों के अंदर स्पष्ट हो जाते हैं। ऐसे में निदान होते ही ट्रीटमेंट में देरी नहीं करनी चाहिए। इसके लिए नियमित व्यायाम और संतुलित भोजन सबसे अच्छा निवारक कदम है।
  • इसके अलावा सुरक्षित सेक्स करें, जिसमें सेफ एनल सेक्स शामिल है।
 

कोलन इन्फेक्शन का निदान - Colon infection Diagnosis in Hindi

यदि गैस्ट्रिक संबंधित समस्या लगातार बनी रहती है या अचानक से गंभीर लक्षण दिखने लगे, तो ऐसे में डॉक्टर के पास जाना उचित होगा। चूंकि लक्षण ज्यादातर मामलों में सामान्य ही होते हैं लिहाजा बीमारी के निदान के लिए इन डायग्नोस्टिक तरीकों की जरूरत पड़ती है: 

  • शुरुआत में, डॉक्टर मेडिकल हिस्ट्री चेक कर सकते हैं, जिसमें वे हाल ही की गई यात्रा और बाहर किए गए भोजन के बारे में पूछ सकते हैं। वे आपसे किसी ऐसी घटना या फ़ूड प्रोडक्ट के बारे में भी पूछ सकते हैं जिनके वजह से यह समस्या ट्रिगर हुई हो।
  • डॉक्टर फिजिकल टेस्ट कर सकते हैं, जिसमें वे बृहदान्त्र वाले हिस्से में सूजन की जांच कर सकते हैं। इससे कारणों के बारे में भी जानकारी मिल सकेगी। इसके अलावा डॉक्टर पाचन, दर्द, स्टेथोस्कोप की मदद से ध्वनि सुनना आदि जांच कर सकते हैं।
  • स्थिति के अनुसार लैब टेस्ट, ब्लड टेस्ट, ब्लड कल्चर टेस्ट, स्टूल टेस्ट, इमेजिंग टेस्ट (एक्स-रे, एमआरआई, अल्ट्रासाउंड), बायोप्सी, एंडोस्कोपी या कोलोनोस्कोपी कुछ डायग्नोस्टिक विकल्पों की भी मदद ली जा सकती है। सफेद रक्त कोशिका के स्तर को जानने के लिए ब्लड टेस्ट किया जा सकता है, जो किसी प्रकार के संक्रमण या एनीमिया का पता लगा सकता है। इसके अलावा प्रोटीन और एल्बुमिन का लो लेवल भी गंभीर संक्रमण की ओर इशारा करता है। आंत में संक्रमण के प्रसार का विश्लेषण करने के लिए मल की जांच भी की जा सकती है। 
  • आंतरिक पथ के कामकाज को जांचने के लिए एंडोस्कोपी या कोलोनोस्कोपी भी की जा सकती है। इसका उपयोग विकास या रुकावटों को देखने के लिए भी किया जा सकता है।

कोलन इन्फेक्शन का इलाज - Colon infection Treatment in Hindi

कोलन इन्फेक्शन के अधिकांश मामलों में उपचार का उद्देश्य शरीर में तरल पदार्थ के स्तर को बनाए रखना और लक्षणों को कम करना है।

कोलन इन्फेक्शन का उपचार इसके अंतर्निहित स्थितियों पर निर्भर करता है। संक्रामक कोलाइटिस के लिए एंटीबायोटिक दवाएं (यदि संक्रमण बैक्टीरिया की वजह से हुआ है) दी जाती हैं या स्थिति के अनुसार एंटीवायरल दवाइयां भी दी जा सकती हैं। इनमें से कुछ दवाइयां ड्रिप के जरिए नसों में चढ़ाई जाती हैं। कुछ संक्रमण जैसे साल्मोनेला के लिए आमतौर पर एंटीबायोटिक दवाओं की आवश्यकता नहीं होती है और धीरे-धीरे यह अपने आप ठीक हो जाती है। दूसरी ओर क्लोस्ट्रीडियम डिफिसाइल में जीवाणुरोधी दवा की आवश्यकता होती है।

गैस्ट्रिक संक्रमण की वजह से गंभीर रूप से दस्त और मतली की समस्या होती है, जिससे निर्जलीकरण हो सकता है। अधिक गंभीर संक्रमण वाले लोगों को यह सुनिश्चित करने के लिए अस्पताल में भर्ती होने की आवश्यकता हो सकती है कि उनका वाइटल लेवल (शरीर का तापमान, पल्स रेट, श्वसन दर, ब्लड प्रेशर) सही है या नहीं। कुछ लोगों को ओआरएस भी दिया जा सकता है।

(और पढ़ें - शरीर का तापमान कितना होना चाहिए)

ओआरएस इलेक्ट्रोलाइट्स (लवण) और कार्बोहाइड्रेट (चीनी के रूप में) का मिश्रण होता है, जो पानी में घुल जाता है।

कुछ मामलों में एंटी-डायरिया (दस्त को रोकने वाली दवा) और एंटी-इमैटिक (उल्टी और जी मिचलाने को रोकने वाली यानी वमनरोधी दवाएं) की जरूरत भी हो सकती है। जबकि कुछ मामलों में विशेष रूप से ऐसे मामले जिनमें ऊतक खराब हो जाते हैं, उनमें संक्रमण के प्रसार को रोकने के लिए प्रभावित ऊतक को हटाने के लिए सर्जरी की आवश्यकता हो सकती है।

मोटे तौर पर, बृहदान्त्र संक्रमण समय के साथ ठीक हो जाता है और दर्द को कम करने और वाइटल लेवल को मेंटेन रखने के लिए लक्षणों का प्रबंधन किया जा सकता है।



संदर्भ

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