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भारत में 1 जुलाई को हर साल नैशनल डॉक्टर्स डे मनाया जाता है ताकि देशभर के डॉक्टरों के काम और उनकी सेवा के प्रति आभार व्यक्त किया जा सके। डॉ बिधान चंद्र रॉय की 1 जुलाई को जन्मतिथि होती है और इसीलिए साल 1991 से 1 जुलाई को नैशनल डॉक्टर्स डे घोषित किया गया। डॉ बिधान चंद्र रॉय स्वंतत्रता सेनानी होने के साथ ही आजाद भारत के राज्य पश्चिम बंगाल के दूसरे मुख्यमंत्री भी थे और हमारे देश के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के डॉक्टर भी।  

एक तरफ जहां डॉक्टर्स साल-दर-साल राष्ट्र की सुरक्षा और विकास में अपना अहम योगदान देने की कोशिश करते हैं वहीं, यह साल 2020 कई लोगों के लिए विशेष रूप से उन डॉक्टर्स के लिए भीषण रहा है, जो कोविड-19 से लड़ने के लिए सबसे आगे की पंक्ति में खड़े हैं। मैं नई दिल्ली के एक प्रमुख अस्पताल में फेफड़ों का विशेषज्ञ हूं जहां पर कोविड-19 के मामले मार्च महीने से ही बड़ी तेजी से ही बढ़ रहे हैं। साल 2020 के ये 6 महीने कैसे रहे इस बारे में मैं आपको अपने अनुभव के बारे में बता रहा हूं।

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  1. कोविड-19 की तैयारी करना
  2. कोविड-19 और सबसे आगे खड़े कार्यकर्ता
  3. कोविड-19 का सामना करने से जुड़ी रणनीति
  4. कोविड-19 महामारी के समय एक डॉक्टर से ही जानें डॉक्टर होने का अनुभव के डॉक्टर

चिकित्सा के क्षेत्र में मुझे 20 साल से ज्यादा का वक्त हो चुका है और कोविड-19 महामारी जैसे संकट का गवाह मैं आज तक नहीं बना हूं। मेरे कहने का मतलब ये है कि जब आप इस बीमारी को देखते हैं तो यह पता चलता है कि नवंबर 2019 में चीन के वुहान शहर में इस बीमारी की पहली बार पहचान हुई थी। जनवरी 2020 आते-आते दुनियाभर को इसके बारे में पता चलने लगा। उस समय तक भी दुनियाभर के लोग ज्यादा चिंतित नहीं थे क्योंकि उन्हें लगा था कि चीन इसे रोकने में कामयाब हो जाएगा। 2 महीने और बीते मार्च का महीने आते-आते विश्व स्वास्थ्य संगठन WHO ने इस बीमारी को महामारी घोषित कर दिया। तब तक यूरोप और अमेरिका में भी केस बढ़ने लगे और भारत में भी बीमारी के कई मामले सामने आए।

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मार्च 2020 में जब भारत में महज 500 केस थे तभी हमारी सरकार ने कुछ जरूरी अग्रसक्रिय (प्रोऐक्टिव) कदम उठाए। हमारी सरकार ने दुनियाभर में कोविड-19 के मामलों पर नजर रखी हुई थी और उन्हें पता था कि कोविड-19 आखिरकार भारत तक अपनी पहुंच बना ही लेगा। इसे देखते हुए सरकार ने देशभर में लॉकडाउन की घोषणा कर दी ताकि भारत में कोविड-19 के मामलों को तेजी से बढ़ने से रोका जा सके और साथ ही साथ लॉकडाउन के दौरान भारत अपनी स्वास्थ्य से जुड़ी आधारभूत सुविधाओं को भी मजबूत कर पाए।

लॉकडाउन के दौरान हेल्थकेयर सुविधाओं ने पीपीई किट्स, वेंटिलेटर्स, ऑक्सीजन सिलेंडर्स आदि को इकट्ठा करना शुरू कर दिया और साथ ही में समर्पित कोविड अस्पतालों का निर्माण किया गया और नॉन-कोविड अस्पतालों में भी बड़ी संख्या में बेड्स अलग रखे गए। हम तैयार थे, हमें पता था कि बीमारी से यह युद्ध बस शुरू ही होने वाला है। और ऐसा ही हुआ। लॉकडाउन के दौरान भी मामले बढ़ने शुरू हो गए और जब चरणबद्ध तरीके से लॉकडाउन में कमी की गई, छूट दी गई जो कि करना ही था, कोविड-19 के मामलों में बहुत तेजी से बढ़ोतरी होने लगी। शुरुआत में यह किसी सदमे या दहशत की तरह था। मरीजों की संख्या बस रोजाना बढ़ती ही रही। अगर कोविड-19 संक्रमित व्यक्ति सोशल डिस्टेंसिंग या दो गज की दूरी का ध्यान न रखे तो एक संक्रमित व्यक्ति में 30 दिन के अंदर 550 लोगों में यह इंफेक्शन फैलाने की क्षमता होती है। तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि आने वाले महीनों में संक्रमित लोगों की संख्या किस तरह से बढ़ने वाली थी।

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शुरुआत में हम 2 वॉर्ड्स में काम कर रहे थे- एक आईसीयू और एक आइसोलेशन वॉर्ड। लेकिन अब हमारे अस्पताल में आईसीयू और आइसोलेशन वॉर्ड दोनों की संख्या दोगुनी हो गई है। मैं पल्मोनोलॉजी के अपने डिपार्टमेंट के डॉक्टरों की एक टीम के साथ काम करता हूं और हमें क्रिटिकल केयर डिपार्टमेंट और दूसरे विशेषज्ञों की टीम द्वारा कुशलतापूर्वक समर्थन मिलता है जो इस संकट की घड़ी में एक दूसरी की मदद करने में जुटे हैं। मुझे लगता है कि मुझे इस महामारी के वास्तविक अहमियत का अंदाजा तब लगा जब मैंने बड़ी संख्या में उन कार्यकर्ताओं को संक्रमित होते देखा जो कोविड-19 के खिलाफ जंग में सबसे आगे की पंक्ति में खड़े थे। फिर चाहे वे मेडिकल स्टाफ हों, कानून व्यवस्था बनाए रखने वाले अधिकारी-कर्मचारी हों, पुलिसवाले हों, सरकारी कर्मचारी हों, वे लोग जो टेस्टिंग में लगे हों। ये सभी लोग जरूरी ऐहतियात बरतने की बात कह रहे थे लेकिन फिर भी वे संक्रमित हो गए। 

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मुझे याद है कि हमारे अस्पताल में कोविड-19 इंफेक्शन से पीड़ित कई पुलिसवाले भी भर्ती हुई थे जिन्हें अपनी ड्यूटी करने के दौरान यह इंफेक्शन हो गया था और आईसीयू में कई दिन गुजारने, इलाज करवाने और फिर रिकवर होने के बाद अस्पताल से छुट्टी मिल गई थी। इसी तरह से कई हेल्थकेयर कार्यकर्ता भी थे जिनका कोविड-19 इंफेक्शन का इलाज हमारे अस्पताल में चल रहा था। ये सभी लोग सच्चे योद्धा हैं। यह अनुभव वास्तव में मेरे साथ रह गया कि यह वायरस कितनी तेजी से फैल रहा है। 

कई बार मैं ये सोचता हूं कि किस तरह जनवरी महीने में मैंने कोविड-19 के बारे में कई लेक्चर दिए थे और अब के समय मुझे कोविड-19 के 100 बिस्तरों और मरीजों का ध्यान रखना है। कई बार मैं बस सचमुच एक पल के लिए रुककर ये सोचने लगता हूं और इन सारी चीजों को अपने अंदर समाहित करने की कोशिश करता हूं कि आखिर ये सब क्या हो रहा है। हालांकि इन सारी चीजों को छोड़ देना या इनका परित्याग करने का कोई विकल्प नहीं है।

भारत इस वक्त कोविड-19 महामारी के बीच में खड़ा है। ये मामले किसी समय अपने शिखर पर होंगे तो कभी मामलों में कमी भी देखने को मिलेगी। हालांकि अभी के समय हम सभी को सिर्फ अपना रास्ता बनाना है। देशभर में फिलहाल अनलॉक की प्रक्रिया जारी है और मामलों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, कंटेनमेंट जोन्स की संख्या बढ़ रही है। ऐसे में अस्पतालों को अपनी मौजूदा सुविधाओं को और ज्यादा बढ़ाने की जरूरत होगी। हर दूसरे दिन सरकार की तरफ से बीमारी के इलाज से जुड़े विकल्प और दवाइयों के मद्देनजर नए-नए दिशा निर्देश आ रहे हैं जो इस बात को दिखाता है कि सरकार भी अपनी तरफ से पूरी मेहनत कर रही है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, आईसीएमआर और ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (डीसीजीआई) की तरफ से दी जा रही स्वीकृति की दर में आयी तेजी भी कोविड-19 के असर और उसकी जटिलता का एक तरह से सूचक है।

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हमारे देश में टेस्टिंग की रफ्तार भी काफी बढ़ी है और सरकार पूरी कोशिश कर रही है कि कोविड-19 के मामलों की पहचान करने में तेजी लायी जाए, इसके बाद संक्रमितों को आइसोलेट किया जाए और उनकी कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग की जाए। इस बीच मैं यह भी बताना चाहूंगा कि मौजूदा समय में जो नकारात्मक घटनाएं हो रही हैं उनके बीच कुछ सकारात्मक भी है- चीन और इटली जैसे देश जहां हमारे से पहले यह संक्रमण आया, उनकी तरह हमारे यहां भी मामलों में कमी देखने को मिलेगी। सिर्फ कुछ ही समय की बात है और हमें फिलहाल ही इस मुश्किल की घड़ी में दृढ़ संकल्प के साथ डटे रहना है।

इसके अतिरिक्त हमारे देश में कोविड-19 से होने वाली मृत्यु दर भी काफी कम है। वैसे लोग जो बहुत ज्यादा बुजुर्ग हैं या जिन्हें पहले से कोई बीमारी है उनकी ही मौत का खतरा अधिक है। वैसे तो अब तक कोविड-19 का कोई स्पष्ट इलाज या वैक्सीन खोजा नहीं जा सका है, वैसे मरीज जिनमें कोविड-19 के हल्के या मध्यम श्रेणी के लक्षण दिखते हैं वे 1 महीने के समय में रिकवर हो जाते हैं। 

मैंने अप्रैल 2020 में कोविड के मरीजों के साथ काम करना शुरू किया था और 11 मई 2020 को हमारे अस्पताल को आंशिक रूप से कोविड-19 अस्पताल घोषित किया गया था। शुरुआत में हमारे यहां सिर्फ 50 कोविड-19 बेड्स थे। 2 महीने बाद चीजें बहुत बढ़ गई हैं। कुछ समय के लिए हमें कठिनाई को सहना होगा लेकिन इस समय हमें रुकना नहीं है, हमें चलते रहना चाहिए। हम इन सबसे निश्चित रूप से बाहर आ जाएंगे और चीजें पहले की तरह बेहतर हो जाएंगी। आपको सिर्फ विश्वास रखने की जरूरत है।

(डॉ विकास मौर्य, फोर्टिस अस्पताल शालीमार बाग में डिपार्टमेंट ऑफ पल्मोनोलॉजी और स्लीप डिसऑर्डर के डायरेक्टर और हेड हैं)

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