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अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के वैज्ञानिकों ने कहा है कि अगर लोग अपनी आवाज धीमी करके बोलें तो इससे नए कोरोना वायरस को फैलने से रोकने में मदद मिल सकती है। उन्होंने बकायदा अध्ययन कर यह बात कही है। इनके मुताबिक, एक सीमा से कम आवाज करके बोलने पर वायरस के फैलने का खतरा कम हो सकता है, विशेषकर अस्पताल और रेस्तरां जैसी जगहों पर। अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के छह वैज्ञानिकों ने कहा है कि अगर लोग अपनी आवाज में छह डेसिबल की कमी लाएं तो इसका असर किसी कमरे के वेंटिलेशन को दोगुना करने के बराबर हो सकता है।

एजेंसी के मुताबिक, वैज्ञानिकों ने अपने शोधपत्र की एडवांस कॉपी में यह जानकारी दी है। इसमें उन्होंने कहा है, 'अध्ययन के परिणाम बताते हैं कि सरकारी स्वास्थ्य अधिकारियों को ऐसी जगहों को 'शांत जोन' घोषित करने के बारे में सोचना चाहिए जहां चार दीवारी में वायरस फैलने की संभावना काफी ज्यादा होती है, जैसे कि अस्पतालों के वेटिंग रूम या खाना खाने से जुड़ी जगहें (रेस्तरां)।'

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इस जानकारी पर विशेषज्ञ विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जुलाई में कोरोना वायरस के एयरोसोल ट्रांसमिशन की संभावना को स्वीकारे जाने सहित अपनी गाइडलाइंस में बदलाव किए जाने की ओर ध्यान आकर्षित करते हैं। गौरतलब है कि एयरोसोल ट्रांसमिशन की बहस के बीच रेस्तरां और फिटनेस क्लास में लोगों के बोलने और गाने पर वायरस के फैलने की संभावना पर बहस होती रही है। शोधपत्र में वैज्ञानिकों का कहना है कि बोलने से भी अतिसूक्ष्म ड्रॉपलेट्स मुंह से निकल कर हवा में फैलते हैं और हवा में वायु कण छोड़ जाते हैं। उनकी मानें तो ये कण इतने बड़े तो होते ही हैं कि वायरस को अपने साथ लेकर हवा में कुछ देर रह सकते हैं। ऐसे में 35 डेसिबल की प्रबलता या ऊंचाई के साथ बोलना हवा में पार्टिकल्स को 50 गुना की दर से बढ़ा सकता है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक, सामान्य रूप से बोलते समय हम 10 डेसिबल की रेंज में बातचीत करते हैं। लेकिन रेस्तरां में एम्बिएंट नॉइस यानी आसपास का शोर 70 डेसिबल तक पहुंच जाता है। इस पर शोधकर्ताओं ने कहा है, '(वायरस ट्रांसमिशन के लिहाज से) एक भीड़भाड़ वाली लेकिन शांत क्लासरूम बिना भीड़भाड़ वाले बार से कम खतरनाक है, जहां लोग बैठें तो एक-दूसरे से दूर हैं, लेकिन तेज संगीत के चलते बातें जोर-जोर से कर रहे हैं।'

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