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भारत में जब कोरोना वायरस दिल्ली, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात जैसे राज्यों में तेजी से फैल रहा था, तब बिहार में इसके संक्रमण से जुड़े बहुत कम मामले सामने आए थे। वहीं, यहां कोरोना वायरस से किसी व्यक्ति के मरने की पहली खबर भी काफी देर से आई थी। लेकिन लॉकडाउन के दौरान जब इन राज्यों में रह रहे बिहार के प्रवासी मजदूरों ने अपने-अपने घरों को लौटना शुरू किया तो धीरे-धीरे राज्य में कोविड-19 के मामले बढ़ने लगे। आज बिहार में इस बीमारी के मरीजों की संख्या 2,000 के नजदीक पहुंच गई है और 11 लोगों के मारे जाने की पुष्टि हो चुकी है।

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मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, बिहार में कोरोना वायरस के जितने मामले हैं, उनमें से आधे पिछले एक हफ्ते में ही सामने आए हैं। गुरुवार को राज्य सरकार ने 380 नए केसों की पुष्टि की है। यह संख्या बिहार में एक दिन में सामने आए कोरोना वायरस के मरीजों की सबसे बड़ी संख्या है। जानकारों के मुताबिक, भारत में कोरोना वायरस संकट से सबसे ज्यादा त्रस्त होने वाले राज्यों में अगला नाम बिहार का हो सकता है।

इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया है कि इस महीने की शुरुआत में बिहार में कोरोना मरीजों की संख्या 450 से भी कम थी। लेकिन चार मई से लॉकडाउन 3.0 के तहत नियमों में ढील मिलना शुरू हुई। इसके बाद प्रवासी मजदूर बड़ी संख्या में बिहार लौटने लगे। अखबार ने बताया है कि तब से राज्य में कोरोना वायरस के जितने नए केस आए हैं, उनमें से ज्यादातर बिहार लौट रहे प्रवासी लोगों से जुड़े हैं। आज स्थिति यह है कि राज्य के कुल कोरोना मरीजों में भी आधे से ज्यादा मरीज प्रवासी मजदूर या कामगार ही हैं।

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बीती 20 अप्रैल को जब बिहार में कोरोना वायरस के सौ मरीज हुए थे, तो उस समय राज्य में कोविड-19 के ग्रोथ रेट में कमी दर्ज की गई थी। जाहिर है ऐसा कम केसलोड की वजह से हुआ था। बाद में मई के पहले हफ्ते में प्रवासी कामगारों ने बिहार आना शुरू किया। उस समय राज्य में कोविड-19 का ग्रोथ रेट 3.75 प्रतिशत था और डबलिंग टाइम 19 दिन था। लेकिन जैसे-जैसे प्रवासी बड़ी संख्या में पहुंचने लगे ये आंकड़े बढ़ने लगे। अब बिहार में हर हफ्ते के हिसाब से कोविड-19 का ग्रोथ रेट 10.32 प्रतिशत है और मरीजों की संख्या दोगुनी होनी की दर यानी डबलिंग रेट सात हो गया है, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर कोरोना के मामले 13.45 दिनों में दोगुने हो रहे हैं।

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