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बाजार में पहली बार अगले साल से शिगेल्लोसिस या शिगेलोसिस (Shigellosis - पेचिस का एक प्रकार) के इलाज के लिए पहला वैक्सीन उपलब्ध होगा। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) और नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ कॉलरा और एंट्रिक डिजीज (एनआईसीईडी) ने वेलकम ट्रस्ट हिलमेन लेबोरेटरीज प्राइवेट लिमिटेड को इस वैक्सीन की तकनीक को दिया है।

एनआईसीईडी में इस वैक्सीन के प्रमुख आविष्कारक ने कहा कि वह इस पर पिछले 15 सालों से काम कर रहे थे। कई ट्रायल्स के बाद आईसीएमआर ने इसके व्यावसायिक प्रॉडक्शन की अंतिम मंजूरी दी है। उन्होंने कहा, ‘यह खूनी दस्त है, जिसमें मल के साथ खून आता है। इसका असर बड़ी आंत पर पड़ता है।’

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छोटे बच्चों पर सबसे ज्यादा खतरा

शिगेलोसिस एक जीवाणु रोग है, जिसे खूनी डायरिया के नाम से जाना जाता है। यह बिना बुखार या बुखार के साथ आ सकता है। दुनियाभर में 12.5 करोड़ मामलों के साथ यह वैश्विक बीमारी है और 1,60,000 लोगों की मृत्यु का एक बड़ा कारण बनती है। इनमें से एक तिहाई मामले पांच साल से कम उम्र के बच्चों से जुड़े होते हैं। इस पर एनआईसीईडी के डायरेक्टर ने कहा कि भारत में डायरिया के 15 से 18 प्रतिशत मामले पांच साल से कम उम्र के बच्चों से जुड़े होते हैं, जो कि शिगेला के कारण होते हैं।

भारत में इस बीमारी का पता पहली बार 1970 के शुरुआत में चला था और इसकी रोगरोधी दवाओं की किस्मों को 1984 से चिन्हित किया गया था। एनआईसीईडी के वैज्ञानिक ने कहा कि पशुओं पर किए गए इस वैक्सीन के अध्ययन के दौरान संक्रमण के खिलाफ महत्वपूर्ण प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया और प्रभाव दिखा है। उन्होंने कहा, ‘पशुओं पर किए गए अध्ययनों में इस वैक्सीन ने 80 प्रतिशत से ज्यादा सुरक्षा दिखाई। यह निम्न और मध्यम आय वाले देशों के लिए एक आदर्श वैक्सीन है।’

जापान की मदद से बनाया

यह रिसर्च जापान के ओकायामा विश्वविद्यालय और नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ इन्फेक्शियस डिजीज, जापाना के सहयोग से की गई। वैक्सीन के आविष्कारक वैज्ञानिक ने कहा कि भारत में शिगेला कई बार फैला, जिसकी वजह से अलग-अलग समय में कई लोगों की मृत्यु हुईं।

वेल्लोर में 1972-1973, 1997, 2001, पश्चिमी भारत में 1984, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में 1986 और चंडीगढ़ में 2003 के दौरान इससे कई लोगों को अपनी जान गवांनी पड़ी। 1984 में इसका संक्रमण फैलने के बाद पश्चिम बंगाल और शिलीगुड़ी के बागानों में 2002 में इसका संक्रमण फैला था। केरल और महारष्ट्र में 2009 और 2010 में डायरिया फैला था। यह एक मृत वैक्सीन है। डायरिया के मृत बैक्टीरिया को शरीर में डाला जाएगा ताकि शरीर का रोगरोधी तंत्र इसके खिलाफ लड़ने की ताकत विकसित कर पाएगा।

पशुओं पर ट्रायल हुआ पूरा

इसके प्रमुख आविष्कारक ने कहा, 'लेबोरेटरी ट्रायल पूरा किया जा चुका है। इसका प्रयोग चूहे, खरगोश और गिनी पिग्स पर भी किया गया है। इसके मानव प्रयोग के लिए वेलकम ट्रस्ट इसका व्यावसायिक प्रॉडक्शन करेगा। हमें उम्मीद है कि हम यह सब पूरा करने के बाद वैक्सीन को 2020 तक बाजार में उतारेंगे।'

इस पर आईसीएमआर के प्रवक्ता ने कहा, ‘मार्केट के लिए तैयार इस वैक्सीन को यहां तक पहुंचने के लिए कई तरह के कड़े प्री-क्लीनिकल और क्लीनिकल नियमों से होकर गुजरना होगा। शिलेगोसिस से लड़ने के लिए यह वैक्सीन समय की जरूरत भी है और एक बड़ी सफलता भी।’

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