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रोजमर्रा से जुड़ी हमारी लाइफ स्टाइल में खान-पान का सीधा असर हमारी सेहत पर पड़ता है। आज आमतौर पर हम फास्ट फूड पर निर्भर होने लगे हैं। जिसके कारण अधिकांश लोग बीमारियों के जाल में फंस रह हैं और सबसे ज्यादा खतरा हार्ट डिजीज यानी दिल की बीमारियों का है। अगर भारतीयों की बात की जाए तो वर्तमान में हमारे देश के अंदर करीब 5.45 करोड़ लोग हृदय रोग से ग्रसित हैं। यही कारण भी है कि आज हमें हृदय रोगों की जल्द पहचान कर उनके उपचार के लिए नए रास्ते तलाशने की जरूरत है।

नोबेल पुरस्कार विजेता और अमेरिकी डॉक्टर फरीद मुराद, भारतीयों में हृदय रोग के बढ़ते जोखिम और कारणों के बारे में शोध करने में जुटे हैं। जिसके तहत डॉक्टर मुराद हैदराबाद के अपोलो अस्पताल में पहुंचे और यहां उन्होंने दिल से जुड़ी बीमारियों का पता लगाने के तरीकों और सटीक उपचार के लिए सुझाव साझा किए।

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डॉ. मुराद को साल 1998 में एक खोज के लिए चिकित्सा में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। अपनी रिसर्च में उन्होंने बताया था कि कैसे नाइट्रिक ऑक्साइड, रक्त वाहिकाओं को आराम देकर ब्लड सर्कुलेशन में सुधार करती है। इस खोज ने हृदय विज्ञान के क्षेत्र को बदल दिया और हृदय रोग के जोखिम को कम करने के लिए सटीक रास्ता निकला।

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भारत में रिसर्च के विकल्प क्या हैं?
दिल की बीमारियों का जल्द पता लगाने और सटीक इलाज के लिए नए रास्ते तलाशना महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारतीयों की आनुवंशिक संरचना थोड़ी अलग है। इसलिए ज्यादातर दुबले-पतले लोगों में भी हाई कोलेस्ट्रॉल  होता है। इससे पता चलता है कि यहां एक व्यापक स्पेक्ट्रम है, जिसके कारण बहुत सारे काम की आवश्यकता होती है।

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भारत में किस उम्र के लोग ज्यादा पीड़ित हैं?
अगर बात हृदय रोगों की आती है तो ये आमतौर पर उम्र बढ़ने के साथ संबंधित हो सकता है, लेकिन भारत में हार्ट डिजीज युवाओं में सामान्य बीमारी है। डॉक्टर बताते हैं कि हमें हृदय रोग से जुड़ी ज्यादातर समस्याएं 30 साल की उम्र के युवाओं में देखने को मिली हैं, जो कि बेहद चिंताजनक है।  

क्या चिकित्सा प्रणाली में बदलाव की जरूरत है?
सैकड़ों वर्षों से वैकल्पिक चिकित्सा, प्राकृतिक एक्सट्रैक्ट्स चिकित्सा प्रणाली का हिस्सा रही है और हम जानते हैं कि वो सुरक्षित हैं लेकिन, सुरक्षा पहलुओं के लिहाज से हमें नए रसायनों पर अध्ययन करना होगा। जिसके लिए सरकार को अनुमति देनी होगी। हालांकि, हम सीख रहे हैं कि नेचुरल एक्सट्रैक्ट्स (प्राकृतिक जड़ी बुटियां) में महत्वपूर्ण अणु होते हैं, जिनका इस्तेमाल मरीजों पर किया जा सकता है।

भारत और पश्चिमी देशों की समस्याओं के बीच क्या अंतर?
पश्चिमी देश और भारत के बीच समस्याओं की तुलना की जाए तो यहां बहुत अंतर हो सकता है। जैसे- खाने-पीने की आदतें, धूप, प्रदूषण और वायु प्रदूषण। कुछ देशों में फैक्ट्री और गाड़ियों से निकलने वाला डीजल का धुआं हैं, तो कुछ देश उर्वरकों का उपयोग नहीं करते, जबकि कुछ देश खेती के लिए उर्वरकों का इस्तेमाल करते हैं।

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खाने की कौन सी आदत हमें बीमार बना रही है?
फास्ट फूड, जो बड़ी आसानी से हमें बीमार बना रहे हैं, क्योंकि ये किशोरों में बहुत प्रचलित हैं और वो इसका विरोध नहीं करते। समस्या यह है कि लोग नुकसान के एहसास के बिना फास्ट फूड के आदी हो रहे हैं। वो अधिक फास्ट फूड खा रहे हैं, लेकिन ऊर्जा ना के बराबर खर्च की जा रही है। पहले के वर्षों की तुलना में अब हर व्यक्ति जरूरत और काम के हिसाब से बहुत अधिक बैठता है। यही कारण है कि जीवनशैली में ये बदलाव दिल की समस्याओं को जोड़ रहे हैं।

क्या है डॉक्टर की राय?
myUpchar से जुड़ी डॉक्टर शहनाज जफर के मुताबिक क्योंकि, फास्ट फूट में नमक की मात्रा अधिक होती है। इससे हाई बीपी का खतरा होता है और हाई ब्लड प्रेशर से हृदय रोग का जोखिम भी बढ़ जाता है। चूंकि आजकल युवाओं में फास्ट फूड का चलन अधिक हुआ है। इसलिए उनमें हृदय रोग का खतरा बढ़ने लगा है।

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