हाई ब्लड शुगर (हाइपरग्लाइसेमिया) - Hyperglycemia (High blood sugar) in Hindi

Dr. Srishti GuptaMBBS

June 12, 2021

June 12, 2021

कई बार आवाज़ आने में कुछ क्षण का विलम्ब हो सकता है!
हाई ब्लड शुगर
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हाइपरग्लाइसेमिया क्या है?

हाइपरग्लाइसेमिया एक मेडिकल टर्म है, जिसका उपयोग ग्लूकोज का स्तर ज्यादा होने के लिए किया जाता है। यह तो हम जानते ही हैं कि खून में ग्लूकोज होता है, लेकिन जब इसका स्तर सामान्य से ज्यादा बढ़ जाता है तो इसे हाई ब्लड शुगर यानी हाइपरग्लाइसेमिया नाम से जाना जाता है।

हाइपरग्लाइसेमिया में क्या होता है?

भोजन करने के बाद खून में अस्थायी रूप से या अल्पकालिक ग्लूकोज बढ़ सकता है और यह स्थिति ग्लूकोज मेटाबॉलिज्म (चयापचय) को प्रभावित करने वाली बीमारी (एंडोक्राइन विकार) से जुड़ी हो सकती है। बता दें, एक स्वस्थ वयस्क में ब्लड ग्लूकोज का सामान्य स्तर 100mg/dL से कम होता है जबकि खाली पेट (8 या इससे ज्यादा घंटे तक कुछ न खाना जैसे सुबह उठने पर या नाश्ते से पहले) ब्लड ग्लूकोज का सामान्य स्तर 140 mg/dL से कम होता है।

हाइपरग्लेसेमिया इंसुलिन की कमी और इंसुलिन प्रतिरोध के कारण डायबिटीज मेलिटस (टाइप 1, टाइप 2 और गर्भावस्था डायबिटीज मेलिटस) से पीड़ित मरीजों में आमतौर पर हाइपरग्लाइसेमिया जैसी स्थिति विकसित हो सकती है।

(और पढ़ें -  इन्सुलिन टेस्ट क्या है)

इंसुलिन एक हार्मोन है, जो कि अग्न्याशय में 'बीटा आइसलेट कोशिकाओं' द्वारा स्रावित होता है और यह ग्लूकोज के स्तर का नियमन करता है। टाइप 1 डायबिटीज तब होता है जब इम्यून सिस्टम सेल्स (ऑटोएंटीबॉडी) बीटा आइसलेट कोशिकाओं को नष्ट करने लगते हैं, जिसकी वजह से इंसुलिन की कमी शरीर द्वारा ग्लूकोज के अवशोषण को रोकती है, इससे ग्लूकोज ज्यादा मात्रा में संचारित होने लगता है। जबकि टाइप 2 डायबिटीज में, आमतौर पर खराब जीवनशैली और मोटापे की वजह से इंसुलिन प्रतिरोध (जब इंसुलिन ठीक से प्रतिक्रिया न करे) विकसित होता है। ऐसे में जिन हिस्सों में इंसुलिन का जाना जरूरी होता है, वहां यह पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुंच पाता है और कुछ अंग सही से कार्य नहीं करते हैं।

गर्भकालीन डायबिटीज मेलेटस में ब्लड शुगर का स्तर ज्यादा हो जाता है, यह उन गर्भवती महिलाओं में होता है, जिसमें इंसुलिन प्रतिरोध में वृद्धि हो जाती है। यह अक्सर उनमें होता है, जिन्हें इससे पहले कभी शुगर नहीं हुआ होता है।

आमतौर पर ओरल हाइपोग्लाइसेमिक एजेंट (ओएचए) दवाओं जैसे मेटफॉर्मिन और/या इंसुलिन की मदद से ब्लड शुगर के स्तर को नियंत्रित किया जा सकता है। हालांकि, कुछ परिस्थितियों में जैसे किसी समय की दवाई भूल जाना, ज्यादा मात्रा में भोजन करना या एक्यूट स्ट्रेस के किसी अन्य कारण की वजह से ब्लड शुगर का स्तर अनियंत्रित रूप से बढ़ सकता है। हाई ब्लड शुगर की जटिलताओं में डायबिटीज केटोएसिडोसिस और हाइपरोस्मोलर हाइपरग्लाइसेमिक सिंड्रोम शामिल है।

हाई ब्लड शुगर के लक्षण - Hyperglycemia symptoms in Hindi

हाई ब्लड शुगर के लक्षण में निम्नलिखित शामिल हैं :

यदि ब्लड ग्लूकोज लेवल बहुत ज्यादा होगा तो इसकी वजह से मानसिक स्थिति में बदलाव आ सकता है जैसे :

  • उनींदापन और सुस्ती
  • डेलिरियम - मस्तिष्क में होने वाला अचानक से बदलाव, जिसकी वजह से भ्रम होने की समस्या हो सकती है।
  • कोमा
  • दौरे पड़ना
  • हेमिपेरेसिस या शरीर के आधे हिस्से में कमजोरी

(और पढ़ें - टाइप 2 डायबिटीज के लक्षण)

हाई ब्लड शुगर के कारण - Hyperglycemia Causes and risk factors

डायबिटीज मेलिटस व अन्य स्वास्थ्य स्थितियों की वजह से हाइपरग्लाइसेमिया की समस्या हो सकती है। हाइपरग्लेसेमिया के संभावित कारणों में शामिल हैं :

डायबिटीज कीटोएसिडोसिस (डीकेए): डायबिटिक कीटोएसिडोसिस डायबिटीज की एक गंभीर जटिलता है, यह तब होता है जब शरीर कीटोन्स नामक ब्लड एसिड का बहुत ज्यादा उत्पादन करता है। स्थिति तब विकसित होती है जब आपका शरीर पर्याप्त इंसुलिन का उत्पादन नहीं कर पाता है। इंसुलिन सामान्य रूप से ग्लूकोज और वसा के उपयोग व सरंक्षण करने की प्रक्रिया में मदद करता है। इसके अलावा यह शरीर की ऊर्जा को बनाए रखने में महत्वपूर्ण निभाता है।

जब पर्याप्त मात्रा में इंसुलिन नहीं बनता है तो शरीर वसा को ईंधन के रूप में तोड़ना शुरू कर देता है। इस प्रक्रिया के दौरान कीटोन्स नामक रक्त प्रवाह में एसिड का निर्माण होता है, यदि इस स्थिति का इलाज नहीं होता है तो यह स्थिति डायबिटीज कीटोएसिडोसिस का रूप ले लेती है।

यदि आपको डायबिटीज है या होने का खतरा है तो आपको डायबिटीज कीटोएसिडोसिस के संकेतों और लक्षणों को समझने की जरूरत है। यह एक मेडिकल इमर्जेंसी है, जिसका मतलब है कि व्यक्ति को तुरंत अस्पताल में भर्ती व उपचार की आवश्यकता है। ऐसे मामलों में, ब्लड शुगर का स्तर 250mg/dL से अधिक होता है, खून का पीएच अम्लीय (7.3 से कम) होता है और पेशाब में कीटोन निकायों के हल्के से मध्यम स्तर पाए जाते हैं। उपचार का मुख्य आधार इंट्रावीनस फ्ल्यूइड थेरेपी ओर इंसुलिन एडमिनिस्ट्रेशन है।

हाइपरोस्मोलर हाइपरग्लाइसेमिक स्टेट : डायबिटीज मेलेटस की एक और जटिलता में हाइपरोस्मोलर हाइपरग्लाइसेमिक स्टेट (एचएचएस) शामिल है। डायबिटीज कीटोएसिडोसिस से विपरीत, एचएचएस टाइप 2 डायबिटीज मेलेटस रोगियों में अधिक आम है और यह हाई ब्लड ग्लूकोज लेवल (600 मिलीग्राम / डीएल से अधिक) से भी जुड़ा है। हाइपरग्लेसेमिया जब गंभीर रूप ले लेता है तो इसके वजह से रोगियों में निर्जलीकरण और मानसिक स्थिति में बदलाव जैसी समस्या हो सकती है। हालांकि, खून का पीएच अम्लीय नहीं होता है और न ही मूत्र में कीटोन बॉडी बनती है। निर्जलीकरण और मानसिक स्थिति में बदलाव का प्रबंधन करने के लिए इंट्रावीनस फ्ल्यूइड थेरेपी की मदद ली जाती है।

(और पढ़ें - नॉर्मल शुगर लेवल रेंज कितना होना चाहिए)

कॉर्टिकोस्टेरॉइड इंड्यूस्ड हाइपरग्लेसेमिया : कॉर्टिकोस्टेरॉइड्स या स्टेरॉयड, उपयोगी और असरदार दवाएं हैं, जो गंभीर सूजन को रोकती हैं। उन्हें अक्सर एलर्जी या ऑटोइम्यून बीमारियों को ठीक करने के लिए, थोड़े समय के लिए निर्धारित किया जाता है। हालांकि, कॉर्टिकोस्टेरॉइड्स का ग्लूकोज मेटाबॉलिज्म पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है जिस कारण हाइपरग्लेसेमिया होता है।

प्रीमैच्योर नवजात शिशु में हाइपरग्लेसेमिया : नवजात शिशुओं में ब्लड ग्लूकोज बढ़ना या नियोनेटल हाइपरग्लाइसेमिया, 'लो बर्थ वेट' शिशुओं (1500 ग्राम से कम वजन वाले) या समय से पहले जन्मे बच्चे (28 सप्ताह से पहले पैदा हुए) में आम है। नवजात शिशुओं का शरीर ग्लूकोज के टूटने और ग्लूकोज संश्लेषण की दर को संतुलित करके ग्लूकोज के स्तर को बनाए रखता है; हालांकि, समय से ज्यादा पहले जन्मे बच्चों में यह तंत्र पूरी तरह से विकसित नहीं होता है, जिस कारण उन्हें हाइपोग्लाइसीमिया (ब्लड ग्लूकोज का स्तर कम होना) या हाइपरग्लाइसेमिया (ब्लड ग्लूकोज का स्तर ज्यादा होना) हो सकता है। हालांकि, ऐसे बच्चों में हाइपोग्लाइसीमिया अधिक आम है, लेकिन उनमें हाइपरग्लाइसेमिया भी हो सकता है। नवजात शिशु के लिए सामान्य ब्लड ग्लूकोज का स्तर 70 मिलीग्राम/डीएल से 150 मिलीग्राम/डीएल के बीच माना जाता है। हाइपरग्लेसेमिया से ग्रस्त नवजात शिशु में कोई लक्षण और संकेत नहीं हो सकते हैं। कभी-कभी, हाई ब्लड ग्लूकोज वाले बच्चों को सामान्य से ज्यादा बार पेशाब लग सकती है, जिस कारण उनमें पानी की कमी हो सकती है।

(और पढ़ें - टाइप 1 डायबिटीज के लक्षण)

हाई ब्लड शुगर का निदान - Hyperglycemia diagnosis in Hindi

हाई ब्लड शुगर का निदान या तो लक्षणों पर संदेह होने पर या संयोगवश ब्लड टेस्ट कराने से होता है। जब कोई मरीज हाइपरग्लेसेमिया के लक्षणों को अस्पताल में बताता है, तो डॉक्टर सबसे पहले व्यक्ति की मेडिकल हिस्ट्री चेक करते हैं। इसके बाद पहले से मौजूद मेडिकल कंडीशन (जैसे डायबिटीज मेलिटस), हाल ही हुई कोई बीमारी, चोट, सर्जरी या गर्भावस्था के बारे में पूछ सकते हैं। इसके अलावा रोगी द्वारा ली जाने वाली दवाओं की भी जानकारी पता की जाती है। निर्जलीकरण के लक्षण और संभावित अंतर्निहित कारणों का पता लगाने के उद्देश्य से क्लिनिकल फिजिकल एग्जामिनेशन कराने का सुझाव दिया जाता है। इस दौरान रोगी की मानसिक स्थिति पर भी ध्यान दिया जाता है और न्यूरोलॉजिकल परीक्षण भी किए जा सकते हैं। खून और पेशाब की जांच से भी निदान में मदद मिल सकती है।

(और पढ़ें - बच्चों में निर्जलीकरण के लक्षण)

हाई ब्लड शुगर के लिए टेस्ट - High blood glucose test in Hindi

रोगी का चिकित्सकीय मूल्यांकन करने के बाद प्रयोगशाला में जांच कराने के लिए सुझाव दिया जा सकता है। निदान और बेस्ट ट्रीटमेट निर्धारित करने के लिए रोगी में नियमित रूप से निम्नलिखित जांच की जाती है :

  • ब्लड टेस्ट
  • यूरिन टेस्ट
  • रेडियोलॉजिकल इमेजिंग टेस्ट

(और पढ़ें - ब्लड शुगर कम होने पर क्या करें)

हाई ब्लड शुगर का प्रबंधन - Management of Hyperglycemia in Hindi

हाइपरग्लेसेमिया का प्रबंधन इसके अंतर्निहित बीमारी पर निर्भर करता है।

फ्लूइड थेरेपी : रक्त परासरण और निर्जलीकरण को ठीक करने के लिए इंट्रावीनस फ्लूइड थेरेपी दी जाती है। आमतौर पर शुरुआती कुछ घंटों के लिए नॉर्मल सेलाइन के उपयोग से फ्लूइड थेरेपी शुरू की जाती है, जिसके बाद ब्लड ग्लूकोज के स्तर की जांच की जाती है। एक बार जब ब्लड ग्लूकोज का स्तर कम हो जाता है, तो नॉर्मल सेलाइन की जगह 'इंट्रावीनस डेक्सट्रोज सॉल्यूशन' का इस्तेमाल किया जाता है, ता​कि फ्लूइड ओवरलोड के खतरे को रोका जा सके।

इंसुलिन : निर्जलीकरण को ठीक करने के बाद ब्लड ग्लूकोज के स्तर को नियंत्रित करने के लिए इंसुलिन थेरेपी के रूप में दूसरा जरूरी कदम लिया जाता है। पहले इंट्रावीनस इंसुलिन दिया जाता है, इसके बाद बोलस नामक इंसुलिन दिया जाता है। एक बार जब रोगी की स्थिति स्थिर हो जाती है और वह भोजन करना फिर से शुरू कर देता है, तो त्वचा के अंदर इंसुलिन इंजेक्शन देना शुरू कर दिया जाता है।

इलेक्ट्रोलाइट करेक्शन : इंसुलिन थेरेपी के कारण सीरम पोटेशियम का स्तर गिर सकता है, कभी-कभी यह खतरनाक रूप ले सकता है। पोटेशियम के स्तर के आधार पर, केसीएल नामक इंजेक्शन के साथ पोटेशियम सप्लीमेंट शुरू किया जाता है। एसिडोसिस के कारण सोडियम बाइकार्बोनेट भी कम हो सकता है ऐसे में इसे बदलने की आवश्यकता हो सकती है।

एंटीबायोटिक्स : यदि हाइपरग्लाइसेमिया का प्रारंभिक कारण कोई संक्रमण था, तो उचित एंटीबायोटिक दी जानी चाहिए।

एंटीकोआगुलेंट : एक्सट्रीम हाइपरग्लाइसेमिया के बाद थ्रोम्बोसिस और मायोकार्डियल इन्फार्क्शन का खतरा बढ़ जाता है और कभी-कभी इसकी रोकथाम के लिए एंटीकोआगुलेंट निर्धारित किया जा सकता है।

(और पढ़ें - एंटीबायोटिक दवा लेने से पहले ज़रूर रखें इन बातों का ध्यान)

हाई ब्लड शुगर की रोकथाम - Prevention of Hyperglycemia in Hindi

हाइपरग्लेसेमिया बीमारी, चोट या कुछ दवाओं की वजह से होता है। इसकी रोकथाम के लिए बहुत कुछ नहीं किया जा सकता है, लेकिन आपात स्थिति से बचने के लिए निम्न चीजें की जा सकती हैं :

  • इंसुलिन या ओरल हाइपोग्लाइसेमिक एजेंट (OHA) की खुराक समय पर लें
  • घर पर ग्लूकोमीटर से नियमित रूप से ब्लड ग्लूकोज की जांच करें
  • व्यायाम करें और वजन नियंत्रित रखें
  • पोषक तत्वों से भरा स्वस्थ आहार लें
  • भोजन में बहुत अधिक कैलोरी का सेवन न करें
  • कार्बोहाइड्रेट खाएं
  • ज्यादा तनाव न लें
  • नियमित रूप से डॉक्टर के पास जाएं

(और पढ़ें - वजन कम करने के उपाय)

हाई ब्लड शुगर से जुड़ी जटिलताएं - Complications related to High Blood Sugar in Hindi

हाई ब्लड शुगर (हाइपरग्लेसेमिया) से जुड़ी जटिलताओं में निम्नलिखित शामिल हैं :

(और पढ़ें - हार्ट अटैक का प्राथमिक उपचार)



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