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असम में जापानी इन्सेफेलाइटिस (जेई) से 235 लोग बीमार पड़ चुके हैं, जिनमें से 34 की मौत हो गई है। यानी इस बीमारी ने पूर्वोत्तर राज्य में 14 प्रतिशत की मृत्यु दर से लोगों की जान ली है। यह कोरोना वायरस से होने वाली बीमारी कोविड-19 की राष्ट्रीय औसत मृत्यु दर (2.18 प्रतिशत) से कई गुना ज्यादा है। वहीं, असम में कोविड-19 की मृत्यु दर (0.25 प्रतिशत) से तुलना करें तो यह अंतर और ज्यादा (55 गुना) बढ़ जाता है। 

बीते बुधवार को असम की स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण आयुक्त तथा सचिव मोनलिसा गोस्वामी ने टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार को बताया कि राज्य में जापानी इन्सेफेलाइटिस की मौजूदा मृत्यु दर पिछली साल के मुकाबले कम है, जब इस बीमारी ने 23 प्रतिशत की दर से लोगों की जान ली थी। मोनालिसा ने कहा, 'इस साल 29 जुलाई तक 34 लोग (जेई से) मारे गए हैं। पिछले साल यह संख्या 126 थी। हालात बीते कुछ सालों की तुलना में काफी बेहतर हैं, जबकि इस समय मानसून अपने चरम पर है जिसके चलते बीमारी के फैलने के लिए एक अनुकूल माहौल बना हुआ है।' यहां यह भी बता दें कि इस साल जेई के 235 मरीजों के मुकाबले पिछले साल 556 मरीज सामने आए थे।

(और पढ़ें - जापानी इंसेफेलाइटिस से बचाव)

क्या है जापानी इंसेफेलाइटिस?
जापानी इंसेफेलाइटिस एक वायरल संक्रमण है। यह बीमारी मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी को प्रभावित करती है। मेडिकल विशेषज्ञों के मुताबिक, जेई फ्लेविवायरस नाम के मच्छर के काटने से फैलती है। इसके प्रभाव में पीड़ित को बुखार, सिरदर्द, भ्रम आदि स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं। कुछ मामलों में मरीज की मौत भी हो सकती है। बताया जाता है कि जापानी इंसेफेलाइटिस का संक्रमण सबसे ज्यादा बच्चों को प्रभावित करता है। गर्मी के सीजन में यह बीमारी अधिक सक्रियता के साथ फैलती है।

हालांकि यह बीमारी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में ट्रांसमिट नहीं होती। जापानी इंसेफेलाइटिस की वजह बनने वाला फ्लेविवायरस डेंगू, पीला बुखार और वेस्ट नाइल वायरस से संबंधित है। भारत में इस बीमारी का पहला मामला 1955 में सामने आया था। देश के कई हिस्सों में इसका प्रकोप देखा जाता है। लेकिन असम, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड जैसे राज्यों में यह बीमारी विशेष रूप से ज्यादा फैलती है।

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