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जरवेल एंड लैंग-नील्सन सिंड्रोम के अन्य नाम

  • ऑटोसोमल रिसेसिव लॉन्ग क्यूटी सिंड्रोम (LQTS)
  • कार्डियोऔडिटरी सिंड्रोम
  • जेरवेल और लैंग-नील्सन के कार्डियोऔडिटरी सिंड्रोम
  • सर्डोकार्डियक सिंड्रोम

जरवेल एंड लैंग-नील्सन सिंड्रोम (जेएलएनएस) एक दुर्लभ आनुवंशिक विकार है, जिसमें शिशु को बहरापन और हृदय संबंधी विकृति होती है जिसमें हृदय की विद्युत गतिविधियां प्रभावित रहती हैं। हृदय की गंभीरता के लक्षण जेएलएनएस के साथ हर व्यक्ति में अलग-अलग पाए जाते हैं। कुछ व्यक्तियों में इसके कोई लक्षण नजर नहीं आते, जबकि अन्य लोगों में दिल की आसामान्य धकड़न बढ़ने जैसी स्थिति पैदा हो सकती है। अचानक से दिल की धड़कन बढ़ने के कारण कुछ मामलों में बार-बार बेहोश होना, हृदय काम करना बंद कर देना और यहां तक कि मरीज की अचानक मृत्यु हो जाना आदि जटिलताएं भी विकसित हो सकती हैं। शारीरिक व्यायाम, उत्तेजना, डर और तनाव आदि स्थितियों में इस रोग के लक्षण शुरु हो सकते हैं। ऊपरोक्त गतिविधियों के दौरान बेहोश होना भी जेएलएनएस का एक सामन्य संकेत होता है। जेएलएनएस के लक्षणों का अक्सर बचपन में ही पता लग जाता है और एक ऑटोसोमल रिसेसिव जेनेटिक डिसॉर्डर के रूप में विकसित होता है। जिन बच्चों का इलाज न किया जाए उनमें से आधे से ज्यादा मामलों में 15 वर्ष से पहले ही बच्चे की मृत्यु हो जाती है।

जरवेल एंड लैंग-नील्सन सिंड्रोम के लक्षण

जरवेल एंड लैंग-नील्सन सिंड्रोम के लक्षण अक्सर बचपन में ही दिखने लगते हैं। बच्चे में बहरेपन का जन्म के कुछ समय बाद ही पता लग जाता है। जेएलएनएस में श्रवण तंत्रिकाएं (ऑडीटरी नर्व्स) मस्तिष्क में आवाज से जुड़ी संवेदनाएं नहीं भेज पाती है और इस कारण से दोनों कानों में बहरापन हो जाता है। जरवेल एंड लैंग-नील्सन सिंड्रोम से मरीजों में अक्सर आयरन का कम स्तर और गैस्ट्रिन का स्तर देखा जाता है और संभावित रूप से जिसके कारण आयरन की कमी (एनीमिया) हो जाती है।

जेएलएनएस से जुड़ी हृदय स्थितियों के लक्षणों में मुख्य रूप से कम या पूरी तरह से होश न रहना और हृदय की धड़कनें तेज होना (टीडीपीएस) आदि शामिल है। जेएलएनएस के लक्षण अक्सर बिना किसी प्रकार की चेतावनी के और अचानक से हो जाते हैं। अधिक परिश्रम, उत्साह या अधिक तनाव जेएलएनएस के लक्षणों को फिर से विकसित कर सकता है। हालांकि कुछ मामलों में ये बिना किसी विशिष्ट कारण के भी विकसित हो जाते हैं।

जरवेल एंड लैंग-नील्सन सिंड्रोम के कारण 

जेएलएनएस के ज्यादातर मामलों का मुख्य कारण एक ही जीन के 2 अलग-अलग जीन (KCNQ1 या KCNE2) के म्यूटेशन की वजह होती है। इनमें से ज्यादातर म्यूटेशन प्रोटीन की कमी या उसमें किसी तरह का बदलाव कर देते हैं। इसके परिणामस्वरूप प्रोटीन असामान्य रूप से कार्य करने लगता है। जेएलएनएस के 90% से भी अधिक मामले KCNQ1 जीन की म्यूटेशन के कारण होते हैं। इन दो जीन में म्यूटेशन के कारण आयन चैनल्स की प्रक्रिया में असमानता आती है, यह सुनने की क्षमता और हृदय का सही ढंग से कार्य करने की स्थिति को भी प्रभावित करती हैं।

जेएलएनएस का मुख्य कारण माता-पिता के जीन की वजह से हुई म्यूटेशन होता है। इस प्रक्रिया में पिता से एक जीन और माता से एक जीन की कॉपी प्राप्त होती है।

जरवेल एंड लैंग-नील्सन सिंड्रोम का इलाज

जरवेल एंड लैंग-नील्सन सिंड्रोम के इलाज में डॉक्टर मरीज के बहरेपन, हृदय रोग व बेहोशी आदि लक्षणों को कम करने की कोशिश करते हैं। जेएलएनएस से ग्रस्त व्यक्ति के बहरेपन का इलाज एक छोटे यंत्र से किया जा सकता है, इस यंत्र को कॉकलीयर इम्प्लांट (Cochlear implant) कहा जाता है। यह यंत्र कान के अंदर मौजूद फाइबर तंत्रिकाओं को उत्तेजित करके सुनने की क्षमता को बेहतर बनाता है।

जेएलएनएस से ग्रस्त व्यक्ति के हृदय संबंधी असमानताओं के इलाज में बीटा-एड्रीनर्जिक एजेंट (बीटा ब्लॉकर) के साथ ड्रग थेरेपी का इस्तेमाल किया जा सकता है। बीटा ब्लॉकर में प्रोप्रानोलोल और एटेनोलोल शामिल हैं, जो हृदय में विद्युत संवेदनाओं से हृदय के कार्य-प्रभाव को कम करने में मदद करती हैं। बीटा ब्लॉकर से इलाज असफल होने के बाद, सर्जरी का विकल्प अपनाया जाता है, जिसमें हृदय की ओर जाने वाली कुछ विशेष तंत्रिकाओं को निकाल दिया जाता है।

  1. जरवेल एंड लैंग-नील्सन सिंड्रोम के डॉक्टर
Dr. K. K. Handa

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कान, नाक और गले सम्बन्धी विकारों का विज्ञान

Dr. Aru Chhabra Handa

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कान, नाक और गले सम्बन्धी विकारों का विज्ञान

Dr. Yogesh Parmar

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