पॉलिसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम या पीसीओएस एक हार्मोनल बीमारी है जो महिला के शरीर में पुरुष हार्मोन की अधिकता के कारण होती है। इसमें महिला के शरीर में मौजूद अंडाशय ठीक तरीके से काम नहीं कर पाता। पीसीओएस का वैश्विक प्रसार 6 से 20 प्रतिशत के बीच है जबकि राष्ट्रीय स्वास्थ्य पोर्टल के अनुसार भारत में पीसीओएस का प्रसार 9.13 प्रतिशत से 22.5 प्रतिशत के बीच है। इतना ही नहीं पीसीओएस महिलाओं में बांझपन यानी इन्फर्टिलिटी का सबसे सामान्य कारण भी है। हर साल सितंबर महीने को पीसीओएस जागरुकता माह के रूप में मनाया जाता है। ऐसे में हम आपको बता रहे हैं कि कैसे, पीसीओएस विकार का सिर्फ महिला पर ही नहीं बल्कि उसके होने वाले बच्चे पर भी बुरा असर पड़ता है।

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पीसीओएस से पीड़ित महिलाओं को गर्भवती होने में कठिनाई
पीसीओएस के बारे में हुए कई अध्ययनों से पता चला है कि पीसीओएस से पीड़ित महिलाओं को गर्भवती होने में अधिक कठिनाई होती है और साथ ही ऐसी महिलाओं में गर्भपात की घटनाएं भी अधिक होती हैं। इसके अलावा स्वास्थ्य संबंधी अन्य समस्याएं जैसे- हर्सुटिज़्म या अतिरोमता, मुंहासे, मोटापा और डायबिटीज भी पीसीओएस के कारण हो सकता है। ह्यूमन रिप्रोडक्शन नाम की पत्रिका में प्रकाशित एक नई स्टडी अपने तरह की पहली स्टडी है जिससे यह पता चला है कि पीसीओएस से पीड़ित महिलाओं से पैदा होने वाले बच्चों में मनोरोग और तंत्रिका विकास (न्यूरोडेवलपमेंटल) संबंधी कई तरह की बीमारियां होने का खतरा अधिक होता है। 

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मोटापा, डायबिटीज के कारण बीमारियों का खतरा अधिक
स्वीडन, चीन और फिनलैंड में शोधकर्ताओं द्वारा किए गए इस अध्ययन में पाया गया कि इस तरह का बढ़ा हुआ जोखिम न केवल पीसीओएस से पीड़ित माताओं से पैदा होने वाले शिशुओं के लिए मौजूद था बल्कि इन बीमारियों का खतरा तब और अधिक बढ़ जाता है जब होने वाली मां को मोटापा, गर्भावस्था के दौरान डायबिटीज, सिजेरियन डिलीवरी जैसी जटिलताएं होती हैं।

मातृ पीसीओएस और संतान में मनोरोग संबंधी विकार
यह अपने  तरह की अब तक की सबसे बड़ी स्टडी थी जिसमें 1996 से 2014 के बीच फिनलैंड में पैदा हुए 10 लाख से अधिक बच्चों को शामिल किया गया था। पीसीओएस से पीड़ित महिलाओं से पैदा हुए 24 हजार 682 बच्चों और पीसीओएस के बिना वाली महिलाओं से पैदा हुए 10 लाख 73 हजार 71 बच्चों का डेटा एकत्र किया गया था। 31 दिसंबर 2018 तक सभी बच्चों को फॉलो किया गया, यानि साधारण शब्दों में समझें तो यह स्टडी तब तक चली जब तक ये बच्चे 22 साल के हो गए।

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बच्चों में होने वाली तंत्रिका संबंधी बीमारियां और मनोरोग में पीसीओएस की स्वतंत्र भूमिका का परीक्षण करने के लिए सभी डेटा पर स्तरीकृत विश्लेषण किए गए थे। साथ ही गर्भवती महिला को मोटापे की समस्या, प्रसवकालीन समस्याएं, सिजेरियन डिलिवरी, गर्भकालीन मधुमेह, प्रजनन संबंधी उपचार के उपयोग आदि के साथ भी पीसीओएस के संयुक्त प्रभाव का विश्लेषण किया गया था। गर्भवती महिला की आयु, धूम्रपान की आदत, मनोरोग संबंधी विकार, गर्भावस्था के दौरान दवाओं का उपयोग और इन्फ्लेमेटरी बीमारियों जैसे कारकों के लिए भी विश्लेषण को समायोजित किया गया था।

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मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों की प्रधानता
फॉलो-अप अवधि के दौरान, शोधकर्ताओं ने कथित तौर पर पाया कि स्टडी में शामिल कुल 10 लाख 97 हजार 753 बच्चों में से 9.8 प्रतिशत बच्चों में तंत्रिका विकास संबंधी बीमारी या मनोरोग की समस्या डायग्नोज हुई। पीसीओएस से पीड़ित मांओं से जन्म लेने वाले बच्चों में मनोचिकित्सा विकार डायग्नोज होने का जोखिम लगभग 1.3 गुना अधिक था। इन बच्चों में, निम्नलिखित विकारों का प्रचलन अधिक था:

  • नींद से जुड़ी बीमारी - 1.5 गुना अधिक प्रसार
  • एडीएचडी, आचरण और टिक बीमारी - 1.4 गुना अधिक प्रसार
  • बौद्धिक अक्षमता और ऑटिज्म स्पेक्ट्रम विकार - 1.4 गुना अधिक प्रसार
  • विकास से जुड़े विकार और भोजन से जुड़े विकार - लगभग 1.4 गुना अधिक प्रसार
  • घबराहट से जुड़ी बीमारी - 1.3 गुना अधिक प्रसार
  • मूड से जुड़ी बीमारी - 1.3 गुना अधिक प्रसार
  • अन्य व्यवहार और भावनात्मक विकार - 1.5 गुना अधिक प्रसार

पीसीओएस से पीड़ित मांओं में गंभीर मोटापे की समस्या उनसे जन्म लेने वाले बच्चों में मनोरोग संबंधी विकार और प्रसवकालीन जटिलताओं के लिए एक बड़ा योगदान कारक माना गया- विशेष रूप से गर्भावस्था के दौरान होने वाला मधुमेह और सिजेरियन डिलीवरी- जिसने इस प्रचलन के जोखिम को 1.7 गुना बढ़ा दिया।

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महिलाओं को भी उचित परामर्श देने की जरूरत
इन निष्कर्षों से पता चलता है कि दुनियाभर में स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने वाले डॉक्टरों को यह समझना होगा कि पीसीओएस से ग्रस्त मांओं से पैदा होने वाले बच्चों को मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का अधिक खतरा होता है, और उन्हें लंबे समय तक मनोवैज्ञानिक सहायता और मानसिक स्वास्थ्य फॉलो-अप की आवश्यकता होती है। साथ ही यह पीसीओएस वाली महिलाओं के लिए उचित परामर्श की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है ताकि वे इसमें शामिल जोखिमों से अवगत हों और अपनी संतान के मानसिक स्वास्थ्य की बेहतर निगरानी के लिए जरूरी संसाधन अपना सकें।

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