• हिं

हॉस्पिटल कैश पॉलिसी जिसे अस्पताल नकद पॉलिसी या हॉस्पिकैश इन्शुरन्स भी कहते हैं। यह तो आप जानते हैं कि अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान इलाज से संबंधित खर्चे अमूमन आपके बजट को प्रभावित करते हैं। इलाज के लिए जितने अच्छे और बड़े अस्पताल में जाएंगे, बिल भी उतना ही ज्यादा आएगा। क्योंकि अस्पताल में डॉक्टर की फीस, मेडिकल बिल, अस्पताल के कमरे का किराया और दवाइयां यह सभी ऐसे खर्चे हैं, जो आपकी बचत को पूरी तरह से खत्म कर सकते हैं। हालांकि, देखा जाए तो इस दौरान दोहरी मार झेलनी पड़ती है, क्योंकि अस्पताल में भर्ती होने के दौरान, आपको अपनी नौकरी से छुट्टी लेने की जरूरत होती है, जिसके लिए आपकी सैलरी कट सकती है या अगर आप व्यवसायी हैं तो बिजनेस कुछ दिनों के घाटे में जा सकता है या कमाई कम हो सकती है। कुल मिलाकर भर्ती होने के दौरान वित्तीय, स्वास्थ्य और मानसिक संबंधी परेशानियां झेलनी पड़ सकती हैं।

  1. हॉस्पिटल कैश पॉलिसी क्या है? - What is Hospital Cash Policy in Hindi
  2. हॉस्पिटल कैश प्लान के फायदे - Benefits of Hospital Cash Plan in Hindi
  3. हॉस्पिटल कैश पॉलिसी के अन्य फायदे - Other Benefits of Hospital Cash Policy in Hindi
  4. हॉस्पिटल कैश पॉलिसी से जुड़ी महत्वपूर्ण शर्तें - Are there any conditions in Hospital Cash Plan in Hindi?
  5. हॉस्पिटल कैश पॉलिसी के तहत आईसीयू में भर्ती होने पर क्या होगा - What happens if someone is in the ICU in Hindi?
  6. हॉस्पिटल कैश पॉलिसी के लिए न्यूनतम आयु कितनी होनी चाहिए? - Minimum Age for Hospital Cash Policy in Hindi
  7. हॉस्पिटल कैश पॉलिसी में एक्सक्लुजन क्या है - Exclusion in Hospital Cash Policy in Hindi
  8. हॉस्पिटल कैश पॉलिसी क्लेम करने का समय - Hospital Cash Policy Claiming Timings
  9. हॉस्पिटल कैश पॉलिसी के तहत क्लेम कैसे करें - How to claim under Hospital Cash Policy in Hindi?
  10. हॉस्पिटल कैश प्लान लेते समय किन बातों का ध्यान रखें? - Caution while taking hospital cash plan in Hindi

हॉस्पिटल कैश पॉलिसी एक ऐसी पॉलिसी है, ​जिसमें पॉलिसीधारक को यदि अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत होती है, तो उसे भर्ती के दौरान, रोजाना नकद के रूप में मदद की जाती है। यह मदद सीधे हेल्थ इन्शुरन्स कंपनी करती है। हॉस्पिटल कैश प्लान में बीमित व्यक्ति को हर दिन के हिसाब से पहले से तय निश्चित रकम दी जाती है, इसमें रीइम्बर्शमेंट जैसा कुछ नहीं होता है। हॉस्पिटल कैश पॉलिसी इलाज के दौरान खर्च में कमी लाती है, क्योंकि इसमें ऐसे कुछ खर्च शामिल हैं जो स्वास्थ्य बीमा या मेडिक्लेम में शामिल नहीं होते हैं। इसके अलावा मेडिक्लेम में आप सम इन्श्योर्ड का चुनाव करते हैं, लेकिन हॉस्पिटल कैश पॉलिसी में आपको चुनना होता है कि आप प्रतिदिन कितना पैसे का कवरेज चाहते हैं।

उदाहरण के लिए मान लेते हैं कि आपने हॉस्पिटल कैश पॉलिसी ली है, जिसमें आपको अस्पताल में भर्ती होने पर 1000 रुपये प्रतिदिन दिया जाता है। अब चाहे आपको अस्पताल में भर्ती होने पर प्रतिदिन 1000 रुपये खर्च करने हों या 2000 रुपये खर्च करने हों, इस प्लान के हिसाब से आपको पहले से तय राशि ही दी जाएगी। कुल मिलाकर यह कह सकते हैं कि य​ह रेगुलर हेल्थ पॉलिसी से अलग है और यह आपके स्वास्थ्य बीमा को एक कदम बेहतर बनाता है। इसलिए ऐसा सुझाव दिया जाता है कि यदि किसी व्यक्ति ने व्यक्तिगत स्वास्थ्य बीमा या समूह बीमा (ग्रुप इन्शुरन्स) लिया है, तो उसे साथ में हॉस्पिटल कैश पॉलिसी को भी जोड़ना चाहिए। इससे बीमित व्यक्ति के ऊपर से वित्तीय बोझ कम होता है।

(और पढ़ें - भारत में सबसे अच्छी कैशलेस मेडिक्लेम पॉलिसी)

जैसा कि ऊपर बताया गया है कि हॉस्पिटल कैश पॉलिसी में अस्पताल में एडमिट होने पर बीमित व्यक्ति को प्रतिदिन के हिसाब से निश्चित राशि दी जाती है। इस राशि का उपयोग टेस्ट या ऑपरेशन के लिए लगने वाले सामान को खरीदने में किया जा सकता है, अमूमन ऐसे खर्च मेडिक्लेम पॉलिसी में शामिल नहीं होते हैं। खैर, यह पैसे बीमित व्यक्ति के हैं और वह जैसे चाहे इनका इस्तेमाल कर सकता है।

(और पढ़ें - सबसे अच्छा हेल्थ इन्शुरन्स कौन सा है)

छोटे मोटे बिलों के झंझट से मुक्ति

हॉस्पिटल कैश प्लान के तहत मिलने वाली राशि का इलाज पर होने वाले खर्च से कोई लेना-देना नहीं है। अस्पताल में भर्ती के दौरान अक्सर नर्स या डॉक्टर को इलाज से संबंधित कुछ चीजों की जरूरत होती है। भले वह चीजें छोटी-मोटी क्यों न हों, लेकिन धीरे-धीरे करके यह बड़ी राशि का रूप ले लेती हैं। ऐसे में हॉस्पिटल कैश प्लान में रोजाना मिलने वाला कैश आपको इन खर्चों से निपटने में मदद करता है।

टैक्स में बचत

हॉस्पिटल कैश प्लान मेडिकल खर्चों के बोझ को कम करने के अलावा आयकर अधिनियम 1961 की धारा 80डी के तहत टैक्स में भी छूट देता है।

हॉस्पिटल कैश डेली अलाउंस पॉलिसी को जीवनभर के लिए रिन्यू किया जा सकता है।

अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान, बीमा कंपनी की ओर से बीमित व्यक्ति को कम से कम 500 रुपये दिए जाने से शुरुआत होती है, जबकि अधिकतम आपके द्वारा दिए जाने वाले प्रीमियम पर निर्भर करता है। वैसे औसतन दैनिक नकद राशि की बात करें, तो लोग 500 से 3000 रुपये के बीच की राशि का चुनाव करते हैं।

यदि कोई बीमाधारक आईसीयू में भर्ती होता है तो उसे हॉस्पिटल कैश इन्शुरन्स के तहत ज्यादा लाभ मिलता है। अधिकांश कंपनियां रोजाना आधार पर मिलने वाली राशि को दोगुना कर देती हैं। हालांकि, पॉलिसी के आधार पर यह कई गुना अधिक भी हो सकता है।

किसी भी अन्य हेल्थ इन्शुरन्स प्लान की ही तरह हॉस्पिटल कैश पॉलिसी में भी वेटिंग पीरियड होता है। हालांकि, इसमें वेटिंग पीरियड कम रखा जाता है। इस पॉलिसी के साथ एक अन्य शर्त यह है कि आपको कम से कम 24 घंटे के लिए अस्पताल में भर्ती होना होगा, तभी आपको हॉस्पीकैश का लाभ मिल सकता है। यानी डे-केयर प्रोसीजर के लिए आपको इस पॉलिसी के तहत किसी तरह का कोई कैश अलाउंस नहीं दिया जाता है। इसके अलावा हॉस्पिटल कैश पॉलिसी में अस्पताल में भर्ती होने के दिनों की अधिकतम सीमा भी निर्धारित होती है। यह अधिकतम सीमा आमतौर पर 30, 60 या 90 दिन की होती है। यानी आपकी पॉलिसी में जितने दिन का उल्लेख किया गया है, उतने ही दिन के लिए आपको हॉस्पिटल कैश अलाउंस दिया जाएगा। भले ही आप उससे ज्यादा दिन भर्ती रहें।

यह तो सभी जानते हैं कि आईसीयू में भर्ती होने पर खर्च भी ज्यादा ही होता है। इसीलिए ज्यादातर हेल्थ इन्शुरन्स कंपनियां आईसीयू में भर्ती रहने पर हॉस्पिटल कैश की लिमिट को डबल कर देती हैं। यानी यदि कोई व्यक्ति जिसे अस्पताल में भर्ती होने पर प्रतिदिन 1000 रुपये हॉस्पिटल अलाउंस मिल रहा था, उसी व्यक्ति को आईसीयू में भर्ती होने पर 2000 रुपये अलाउंस मिल सकता है।

(और पढ़ें - सीनियर सिटिजन हेल्थ इन्शुरन्स क्या है?)

हॉस्पिटल कैश पॉलिसी के लिए न्यूनतम आयु :

  • वयस्क की न्यूनतम आयु 18 से 65 वर्ष के बीच होनी चाहिए
  • आश्रित (जो बीमित व्यक्ति पर निर्भर होते हैं) बच्चों की न्यूनतम आयु 3 महीने या 91 दिन होना चाहिए

ध्यान रहे, यह केवल एक साल के लिए वैध रहती है, इसके बाद आपको रेगुलर हेल्थ इन्शुरन्स की तरह इसे भी रिन्यू कराना होता है।

यह पॉलिसी किसी व्यक्ति और/या परिवार को जारी की जा सकती है, परिवार में पति या पत्नी और आश्रित बच्चे शामिल हैं।

(और पढ़ें - myUpchar बीमा प्लस हेल्थ इन्शुरन्स के फायदे)

हॉस्पिटल कैश पॉलिसी को हेल्थ इन्शुरन्स के साथ या अलग से भी लिया जा सकता है। लेकिन ध्यान रहे, जिस तारीख से पॉलिसी को जोड़ा जाता है, उसी दिन से हॉस्पिटल कैश पॉलिसी का लाभ नहीं उठाया जा सकता है। वास्तव में कंपनी कुछ वेटिंग पीरियड देती है, आमतौर पर यह वेटिंग पीरियड 30 दिनों का होता है।

  • यदि बीमित व्यक्ति में पॉलिसी लेने से पहले से बीमारियां (प्री-एग्जिस्टिंग डिजीज) मौजूद हैं, तो ऐसे में हॉस्पिटल कैश पॉलिसी फायदेमंद नहीं होगी।
  • दांतों के इलाज में लगने वाले खर्च के लिए दैनिक भत्ता नहीं मिलता है। हालांकि, यह बीमा कंपनी के नियम व शर्तों पर निर्भर करता है।
  • गर्भावस्था या बच्चे की डिलीवरी से जुड़े खर्चे या उपचार को हॉस्पिटल कैश पॉलिसी में कवर नहीं किया जाता है।
  • प्राकृतिक आपदाओं की वजह से होने वाले नुकसान को हॉस्पिटल कैश पॉलिसी में कवर नहीं किया जाता है।
  • नसे की हालत में गाड़ी चलाने की वजह से चोट लगने पर बीमा कंपनी जिम्मेदार नहीं होती है।
  • खुद से लगी चोट, आत्महत्या या खुदकुशी का प्रयास करना भी हॉस्पिटल कैश पॉलिसी में कवर नहीं किया जाता है।

(और पढ़ें - हेल्थ इन्शुरन्स में क्या-क्या कवर होता है?)

हॉस्पिटल कैश पॉलिसी क्लेम करने का समय निम्नलिखित है।

आप या नॉमनी जो आपकी ओर से क्लेम कर रहे हैं, उन्हें टीपीए या बीमा कंपनी को हॉस्पिटलाइजेशन के बारे में निम्न स्थिति में जानकारी देनी चाहिए-

  • यदि आप प्लान करके हॉस्पिटल में भर्ती होने जा रहे हैं तो भर्ती होने के 48 घंटे पहले से बीमा कंपनी को सूचित करें।
  • यदि आपको अचानक से हॉस्पिटल में भर्ती होने की जरूरत है तो भर्ती होने के 24 घंटे के अंदर अपनी बीमा कंपनी को जानकारी दें।

ध्यान रहे, टीपीए यानी थर्ड पार्टी एडमिनिस्टर होता है। सभी बीमा कंपनियां टीपीए से टाई अप नहीं करती हैं। ऐसे में आपको सीधे बीमा कंपनी से संपर्क करने की जरूरत भी हो सकती है।

क्लेम इस पॉलिसी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है, क्योंकि इसी प्रक्रिया के जरिए आपको कैश बैनिफिट मिलता है। ऐसा नहीं है कि आपके अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान बीमा कंपनी से कोई व्यक्ति आकर आपको रोजाना कैश देकर जाएगा, क्योंकि इसका नाम हॉस्पिटल कैश पॉलिसी है। यह भी नहीं है कि आपको अस्पताल से डिस्चार्ज होते समय यह कैश थमा दिया जाएगा। बल्कि इसके लिए आपको एक प्रोसेस से गुजरना होगा। अस्पताल से छुट्टी होने के बाद आपको अस्पताल में भर्ती होने के पूरे दस्तावेजों के साथ ही, डिस्चार्ज समरी के साथ इन्शुरन्स कंपनी में क्लेम करना होगा। आप जितने दिन अस्पताल में भर्ती रहे थे, उसका पुख्ता प्रमाण इन्शुरन्स कंपनी में जमा करवाने पर ही हॉस्पिटल कैश आपके दिए गए बैंक अकाउंट में ट्रांस्फर किया जाएगा।

(और पढ़ें - क्रिटिकल इलनेस इन्शुरन्स में कौन-कौन सी बीमारियां कवर होती हैं?)

अस्पताल में भर्ती होने के दौरान हमें कितनी राशि की जरूरत पड़ेगी, इस बारे में सटीक नहीं कहा जा सकता है। लेकिन हमें अपनी स्वास्थ्य स्थिति और एक्सपर्ट से बात करने के बाद अंदाजा लगाना चाहिए कि वास्तव में कितने रुपये पर्याप्त होंगे। यह सच है कि दैनिक भत्ता ज्यादा रहेगा तो प्रीमियम भी ज्यादा होगा, जबकि इसके विपरीत दैनिक भत्ता कम होने पर प्रीमियम भी कम होगा। चूंकि ज्यादा प्रीमियम आपके जेब को प्रभावित कर सकता है ऐसे में कम प्रीमियम वाले हॉस्पिटल कैश प्लान को रेगुलर हेल्थ प्लान में जोड़ा जा सकता है। इससे फायदा यह होगा कि यदि अस्पताल के बिल छोटे-मोटे हैं तो आप कैश प्लान के तहत उनसे निपट लेंगे, लेकिन यदि दैनिक भत्ते से ज्यादा बिल बना, तो आपकी जेब पर सिर्फ अतिरिक्त बिल का बोझ आएगा। इससे आपको क्लेम नहीं करना पड़ेगा और नो क्लेम बोनस का फायदा भी उठा सकते हैं।

रेगुलर हेल्थ प्लान में हॉस्पिटल कैश प्लान को जोड़ते समय सावधानी

  • पॉलिसी से जुड़ी उन शर्तों का पता कर लें, जो क्लेम के दौरान कोई दिक्कत पैदा न करें।
  • पॉलिसी लेते समय ही पता कर लें कि क्लेम के लिए कौन-कौन से दस्तावेजों की जरूरत होगी।
  • फ्री लुक पीरियड विकल्प के बारे में पता करें। इसमें पॉलिसी पसंद न आने पर एक निश्चित समय के अंदर पॉलिसी को रद्द कर सकते हैं। हालांकि, यह तभी हो सकता है जब आपने कोई क्लेम ना किया हो।

(और पढ़ें - myUpchar बीमा प्लस में आपको क्या-क्या कवर मिलता है)

और पढ़ें ...
cross
डॉक्टर से अपना सवाल पूछें और 10 मिनट में जवाब पाएँ