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66 वर्षीय पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली को 9 अगस्त 2019 की सुबह सांस लेने में आ रही दिक्कत की वजह से दिल्ली में स्थित आल इंडिया मेडिकल इंस्टिट्यूट के कार्डियो-न्यूरो सेंटर में भर्ती कराया गया था। इसके बाद उन्हें आईसीयू में शिफ्ट कर दिया है और अब कार्डियोलॉजिस्ट, एंडोक्रिनोलॉजिस्ट और नेफ्रोलॉजिस्ट की एक टीम उनकी देखभाल कर रही है।

प्रेस विज्ञप्‍ति में डॉक्टरों ने बताया है कि अब वह 'हेमोडायनामिकली स्टेबल हैं'। इसका मतलब है कि उनके हार्ट रेट और ब्लड सर्कुलेशन में आ रही दिक्कत को दूर किया जा चुका है। कनाडा के द लंदन हेल्थ साइंसेज सेंटर ने 'हेमोडायनामिकली स्टेबल' को परिभाषित करते हुए कहा है कि इसमें व्यक्ति की स्थिति स्थिर होती है।

अरुण जेटली कई स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों से पीड़ित हैं, जिनमें मधुमेह और उच्च रक्तचाप भी शामिल हैं। ज्ञात हो, अधिक वजन घटाने के लिए उन्होंने सितंबर 2014 में बेरिएट्रिक सर्जरी करवाई थी। उन्होंने मई 2018 में एक किडनी ट्रांसप्लांट यानी गुर्दे का प्रत्यारोपण भी कराया था। लगभग 40 फीसदी डायबिटीज मरीजों को प्रभावित करने वाली सामान्य स्थितियों में डायबिटिक नेफ्रोपैथी या किडनी डैमेज शामिल हैं। 

इस साल की शुरुआत में, जेटली ने नरम ऊत्तक सरकोमा का इलाज करवाया था। ये एक प्रकार का कैंसर है जो वसा, मांसपेशियों और रक्त वाहिकाओं के नरम ऊतकों को प्रभावित करता है। नेचर रिव्यू में प्रकाशित 'कैंसर इन किडनी ट्रांसप्लांट रेसिपिअंट' नामक लेख के अनुसार किडनी ट्रांसप्लांट करवाने वाले रोगियों में स्वस्थ गुर्दे वालों की तुलना में कैंसर विकसित होने की संभावना दोगुनी हो जाती है।

अमेरिकन कैंसर सोसायटी के अनुसार, कैंसर के उपचार का असर घाव को ठीक करने और उससे होने वाले नुकसान की भरपाई करने की शरीर की क्षमता को प्रभावित करता है। वो बात अलग है कि हर किसी को कैंसर के उपचार के सभी दुष्प्रभाव नहीं झेलने पड़ते हैं और इसके साइड इफेक्ट्स की गंभीरता दवाओं और उपचार के इस्तेमाल के तौर-तरीकों पर निर्भर करती है। 

विशेषज्ञों का कहना है कि पहले के मुकाबले अब लोगों को एक साथ कई बीमारियां घेरने लगी हैं। वे इसे "मल्टीमॉर्बिडिटी" कहते हैं। अजीब बात है कि मेडिकल साइंस और चिकित्सा के क्षेत्र में अत्यधिक तकनीकी विकास होने के बावजूद भी इन्हें ही मल्टीमॉर्बिडिटी के लिए जिम्मेदार माना गया है।

मल्टीमॉर्बिडिटी से ग्रस्त व्यक्ति का इलाज करना वास्तव में मुश्किल होता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इन रोगियों को विभिन्न स्थितियों के लिए कई उपचार लेने पड़ते हैं और अलग-अलग बीमारियों के लिए ली जाने वाली दवाएं एक-दूसरे के प्रभाव पर असर डाल सकती हैं और इनके दुष्प्रभावों का जोखिम बढ़ सकता है।

myUpchar.com से जुड़ी डॉ. शहनाज कहती हैं कि “चूंकि मल्टीमॉर्बिडिटी में शरीर की विभिन्न प्रणालियां शामिल होती हैं इसलिए एक साथ कई बीमारियों का इलाज करना वास्तव में मुश्किल हो जाता है, खासतौर पर हृदय, गुर्दे, फेफड़े और मस्तिष्क जैसे महत्वपूर्ण अंगों के शामिल होने पर यह दिक्कत ज्यादा आती है। डॉक्टर आगे बताती हैं कि “आमतौर पर रोग की स्थिति की गंभीरता के अनुसार उपचार किया जाता है।"

जर्नल ऑफ फैमिली मेडिसिन एंड प्राइमरी केयर में प्रकाशित एक अध्ययन में भोपाल स्थित एम्स के डॉ. रजनीश जोशी ने बताया है कि भारत में लगभग दो-तिहाई गंभीर बीमारियों से ग्रस्त व्यक्ति अनेक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे हैं - इनमें से अधिकांश लोग हाई बीपी या डायबिटीज जैसी वैस्कुलर डिजीज से ग्रस्त हैं।

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