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मोटीवेशन यानी अभिप्रेरणा को जीवन के तमाम सकारात्मक पहलुओं के लिए एक महत्वपूर्ण गुण माना जाता है। शिक्षा, रोजगार से लेकर खेलकूद और स्वास्थ्य के मामले में बेहतर करने के लिए व्यक्ति को प्रेरित यानी मोटिवेटिड रहना जरूरी है। लेकिन यह गुण होना और इसका बने रहना मुश्किल होता है। ज्यादातर लोग जीवन में कुछ हासिल करने के प्रति उदासीन दिखते हैं। आजकल बड़ी-बड़ी कंपनियां अपने कर्मचारियों को प्रेरित रखने के लिए मोटिवेशनल स्पीकर्स को बुलाती हैं। सोशल मीडिया के जरिये भी प्रेरित करने वाली कहानियां सामने आती रहती हैं। फिर भी आबादी का एक बड़ा हिस्सा मन-मस्तिष्क से उत्तेजित नहीं रहता।

ऐसे में लोगों के मोटिवेट रहने या नहीं रहने की वजह क्या है। यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबर्ग के डॉक्टर गेडी लक्सेस और स्विट्जरलैंड की एक यूनिवर्सिटी ईपीएफल के प्रोफेसर कार्मेन सैंडी ने इस सवाल का जवाब जानने की कोशिश की है। इन विज्ञानियों ने पहले से प्रचलित दो बातों पर गौर करते हुए काम किया। पहली, लोग अपनी-अपनी क्षमता के मद्देनजर प्रेरित व्यवहार के प्रति असहमति जताते हैं, जो उदासीनता जैसे आम न्यूरोडीजेनरेटिव और मनोवैज्ञानिक विकारों की वजह बनता है। दूसरी, मोटिवेशन के लिए मस्तिष्क के 'न्यूक्लस एकम्बंस' नामक हिस्से को टार्गेट करना।

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दिमाग के निचले हिस्से में स्थित न्यूक्लस एकम्बंस कई शोधों का विषय बना रहा है। विमुखता, बलवृद्धि और अभिप्रेरणा जैसे व्यवहारों में यह बड़े फैक्टर की भूमिका निभाता है। मोटिवेशन को टेस्ट करने और इसके परिमाण निर्धारित करने के लिए ईपीएफएल की टीम ने 'मॉनेटरी इंसेंटिव फोर्स टास्क' को डिजाइन किया। इस आइडिया को तैयार करने का मकसद यह था कि लोगों को कोई टास्क करने को दिया जाए, जिसमें उनके प्रयास को मापा जा सके और उसके बदले उन्हें कुछ इनाम दिया जाए। यानी 'ज्यादा काम ज्यादा पैसा' वाली नीति अपनाई गई। 

अध्ययन में शामिल 43 पुरुषों के न्यूक्लस एकम्बंस में मेटाबोलाइट्स को मांपने के लिए उनकी 'प्रोटोन मैग्नेटिक रेजोनैंस स्पेक्ट्रोस्कोपी' (1एच-एमआरएस) नामक तकनीक से स्कैनिंग की गई। यह तकनीक ब्रेन में विशेष रूप से न्यूरोकेमिकल्स (जैसे न्यूरोट्रांसमीटर्स और मेटाबोलाइट्स) की बहुलता का मापन कर सकती है। इस विशेषता के कारण तंत्रिका तंत्र से जुड़े डिसऑर्डर्स की पुष्टि के लिए 1एच-एमआरएस तकनीत का इस्तेमाल किया जाता है।  

बहरहाल, अध्ययन के दौरान हरेक प्रतिभागी को ऐसी डिवाइस को भींचने को कहा गया, जो दबाव को मांपने का काम करती है। प्रक्रिया को क्रमानुगत ट्रायल के तहत 120 बार दोहराया गया। ऐसा करने की वजह यह थी कि हरेक प्रयास में अलग-अलग अंक आने पर प्रतिभागी अपनी ऊर्जा लगाने को लेकर निर्णय लेने के लिए प्रेरित होंगे। शोधकर्ताओं ने बकायदा प्रतिभागियों को अलग-अलग समूहों में बांटकर और कभी आइसोलेट करके भी उनके प्रदर्शन में प्रतियोगिता की भावना को मापने का प्रयास किया। टास्क को लेकर उनके व्यवहार का डेटा इकट्ठा होने के बाद वैज्ञानिकों ने कंप्यूटर आधारित मॉडल का इस्तेमाल करते हुए उपयोगिता, प्रयास और प्रदर्शन से जुड़े अन्य कार्यों को मापना शुरू किया। इससे उन्हें यह जानने में मदद मिली कि क्या दिमाग के विशेष न्यूरोट्रांसमीटर लेवल ने प्रतिभागियों को विशेष रूप से मोटिवेट किया था।

विश्लेषण से पता चला कि टास्क के दौरान प्रतिभागियों का मोटिवेशन दो न्यूरोट्रांसमीटर - ग्लूटामाइन और ग्लूटामेट - पर निर्भर रहा। शोध की मानें तो प्रतिभागियों के लंबे समय तक टास्क करने का ग्लूटामाइन और ग्लूटामेट की सही आनुपातिक मात्रा से संबंध है। आम भाषा इसे 'स्टेमिना' कहा जाता है। कार्मेन सैंडी का कहना है कि यह जानकारी मोटिवेशन से जुड़े न्यूरोसाइंस के लिए नए रास्ते खोल सकती है।

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