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वैसे तो जीवन के सभी चरणों के दौरान अपनी सेहत का ध्यान रखना जरूरी होता है लेकिन जब कोई महिला अपने गर्भ के अंदर एक और जीवन का निर्माण कर रही हो तो उस दौरान उसके लिए अपनी सेहत के बारे में सोचना और भी ज्यादा आवश्यक हो जाता है। गर्भावस्था के दौरान, अपने इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाए रखना जरूरी होता है ताकि वह गर्भवती महिला या उसके अजन्मे बच्चे को नुकसान पहुंचाने वाले किसी भी रोगाणु या सूक्ष्मजीव से लड़ सके। प्रेगनेंसी के दौरान गर्भवती महिला को पोषक तत्वों का भी अधिक से अधिक सेवन करना चाहिए क्योंकि यह उसके बच्चे के विकास के लिए बेहद आवश्यक होता है। लेकिन विटामिन और खनिजों से भरपूर इन पोषक तत्वों को सटीक मात्रा में ही लेना चाहिए क्योंकि इनका अत्यधिक या अपर्याप्त इस्तेमाल अजन्मे बच्चे को नुकसान पहुंचा सकता है।

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गर्भ में पल रहे बच्चे की सेहत के लिए जरूरी है फोलिक एसिड
गर्भावस्था के दौरान जिन महत्वपूर्ण पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है उनमें से फोलिक एसिड सबसे अधिक प्रिस्क्राइब किया जाने वाला विटामिन है। फोलिक एसिड विटामिन बी 9 (फोलेट) का सिंथेटिक रूप है और गर्भ में पल रहे बच्चे की सेहत को बनाए रखने के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। अध्ययनों से पता चला है कि गर्भावस्था के दौरान फोलिक एसिड का सेवन नवजात शिशु में न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट जैसे- स्पाइना बिफिडा (रीढ़ की हड्डी का अनुचित गठन) के जोखिम को कम करता है और साथ ही नवजात शिशु में ऑटिज्म और अन्य मानसिक विकारों को भी होने से रोकता है।

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रोजाना 400-800 माइक्रोग्राम फोलिक एसिड की जरूरत
गर्भावस्था के दौरान, फोलिक एसिड की अनुशंसित खुराक रोजाना 400-800 माइक्रोग्राम के बीच होती है। वैसी महिलाएं जो पहले कभी न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट वाले बच्चे को जन्म दे चुकी हैं या जिन्हें मिर्गी की समस्या है उन महिलाओं को डॉक्टर, गर्भावस्था के दौरान फोलिक एसिड की अधिक मात्रा प्रिस्क्राइब करते हैं। 

अधिक फोलिक एसिड लेने से भ्रूण के मस्तिष्क विकास में आ सकती है बाधा
हालांकि, 30 सितंबर 2020 को सेरेब्रल कॉर्टेक्स नाम के जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, गर्भावस्था के दौरान फोलिक एसिड का बहुत अधिक सेवन करने से अजन्मे बच्चे के मस्तिष्क को नुकसान पहुंच सकता है। वैज्ञानिकों ने चूहों के एक समूह पर यह अध्ययन। चूहों को तीन समूहों में विभाजित किया गया था- पहले समूह को सामान्य मात्रा में फोलिक एसिड दिया गया, दूसरे समूह को सामान्य मात्रा से 10 गुना अधिक फोलिक एसिड दिया गया और तीसरे समूह को फोलिक एसिड दिया ही नहीं गया।

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अध्ययन के परिणामों से पता चला कि जिन चूहों को सबसे अधिक मात्रा में फोलिक एसिड दिया गया था उनके बच्चों के मस्तिष्क में असामान्य परिवर्तन नजर आया। यह परिवर्तन उन बच्चों के मस्तिष्क में होने वाले परिवर्तन से मिलता जुलता था जिन चूहों को फोलिक एसिड बिलकुल नहीं दिया गया था। ऐसे में वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला कि प्रेगनेंसी के दौरान बहुत अधिक मात्रा में फोलिक एसिड का सेवन करना भ्रूण के मस्तिष्क के विकास के लिए हानिकारक हो सकता है। डॉक्टरों को किसी भी जटिलता से बचने के लिए गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को दी जाने वाली फोलिक एसिड की मात्रा का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन करना चाहिए।

प्रेगनेंसी से जुड़ी एक बड़ी जटिलता है प्री-एक्लेम्प्सिया
गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं को लेकर की गई एक दूसरी स्टडी की मानें तो विटामिन डी, किस तरह से नवजात शिशु को हाइपरटेंशन यानी उच्च रक्तचाप की समस्या से बचा सकता है। दरअसल, प्री-एक्लेम्प्सिया गर्भावस्था से जुड़ी एक जटिलता है जहां महिलाओं में उच्च रक्तचाप होता है, जिसके कारण स्ट्रोक और ऑर्गन फेलियर होने का खतरा बना रहता है। प्री-एक्लेम्प्सिया गर्भवती महिलाओं में मृत्यु के प्रमुख कारणों में से एक है और इसके परिणामस्वरूप गर्भ में ही बच्चे की मौत या समय से पहले डिलिवरी (प्रीमैच्योर बर्थ) का भी खतरा हो सकता है।

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प्री-एक्लेम्प्टिक मांओं के बच्चों में हाई बीपी होने का खतरा अधिक
साथ ही कई मामलों में यह भी देखने में आया है कि प्री-एक्लेम्प्सिया से पीड़ित मांओं से जन्म लेने वाले बच्चों को जीवन के बाद के सालों में आगे चलकर उच्च रक्तचाप विकसित होने का खतरा अधिक होता है। हालांकि, 5 अक्टूबर 2020 को JAMA नेटवर्क ओपन नामक पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि प्री-एक्लेम्प्टिक गर्भवती महिलाओं के शरीर में यदि विटामिन डी का उच्च स्तर हो तो यह उनके बच्चे में उच्च रक्तचाप को होने से रोक सकता है।

जॉन्स हॉपकिंस ब्लूमबर्ग स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के वैज्ञानिकों ने अमेरिका के मैसाचुसेट्स में 754 मातृ-शिशु जोड़े पर एक अध्ययन किया और 1998 से 2018 तक उनके आंकड़ों का विश्लेषण किया। इसमें जिन जानकारियों को शामिल किया गया था उसमें- गर्भावस्था के दौरान प्री-एक्लेम्प्सिया की उपस्थिति के संबंध में डेटा, जन्म के समय गर्भनाल से एकत्रित रक्त के नमूनों का परीक्षण और 3 से 18 साल के बीच के बच्चों की ब्लड प्रेशर रीडिंग भी शामिल थी।

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विटामिन डी बच्चे में हाई बीपी के जोखिम को कम कर सकता है
अध्ययन के शुरुआती परिणामों से पता चला है कि प्री-एक्लेम्प्टिक मांओं से पैदा होने वाले बच्चों में गैर-प्रीएक्लेम्प्टिक मांओं के बच्चों की तुलना में सिस्टॉलिक रक्तचाप अधिक था। अध्ययन में आगे पता चला कि जिन बच्चों के खून में विटामिन डी का स्तर सबसे कम था (जन्म के दौरान उनकी गर्भनाल से लिया गया खून) उन बच्चों में उच्च रक्तचाप देखने को मिला। ऐसे में वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला कि प्री-एक्लेम्प्टिक गर्भवती महिलाओं को डाइट्री सप्लिमेंट्स की मदद से अपना विटामिन डी का सेवन बढ़ाना चाहिए ताकि उनके बच्चों में उच्च रक्तचाप के जोखिम को कम किया जा सके।

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