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जीवन की उन्नति या विकास एक ऐसी क्रूर प्रक्रिया है जिसमें सबसे मजबूत और योग्यतम को ही जीवित रहने की अनुमति होती है। प्राकृतिक रूप से चुने जाने के इस सिद्धांत के बेहद सूक्ष्म लेकिन कठिन संकेत मानव संभोग और यौन व्यवहार की जटिलताओं में भी देखे जाते हैं, जहां महिलाओं को अपने उस विशिष्ट पार्टनर का चुनाव करना होता है जो आनुवंशिक रूप से उपयुक्त ऐसी संतान को जन्म देने में उनकी मदद कर सके, जिसमें जीवित रहने की संभावना अधिक हो। इस बारे में अब तक कई सिद्धांत सामने आ चुके हैं कि आखिर एक महिला या पुरुष अपने लिए सही पार्टनर का चुनाव कैसे करते हैं।

इतना ही नहीं सही पार्टनर का चुनाव करने के बाद भी निषेचन की प्रक्रिया के दौरान फर्टिलाइजेशन के लिए सही स्पर्म का चुनाव करने से पहले बेकार और अयोग्य स्पर्म को निकाल दिया जाता है। वैसे तो ज्यादातर लोग निषेचन की इस प्रक्रिया को ओलिंपिक की किसी रेस की तरह मानते हैं, जिसमें जो स्पर्म सबसे पहले एग के पास पहुंच जाता है वही उसे फर्टिलाइज कर देता है। लेकिन हाल ही में हुई एक रिसर्च में यह बात सामने आयी है कि स्पर्म या शुक्राणुओं की यह रेस वाली बात पूरी तरह सही नहीं है और महिला के शरीर में मौजूद एग्स अपने चुने हुए पार्टनर के स्पर्म को भी अस्वीकार कर सकते हैं।

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स्टॉकहोम यूनिवर्सिटी, मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी एनएचएस फाउंडेशन ट्रस्ट और द यूनिवर्सिटी ऑफ मैनचेस्टर के अनुसंधानकर्ताओं के एक समूह ने इस रिसर्च को अंजाम दिया। स्टॉकहोम यूनिवर्सिटी के असोसिएट प्रफेसर डॉ जॉन फिट्सपैट्रिक ने स्टडी के नतीजों को समझाते हुए एक प्रेस रिलीज के दौरान बताया कि महिला के शरीर में मौजूद अंडे कुछ खास तरह के केमिकल्स को रिलीज करते हैं ताकि वे उपयुक्त स्पर्म को आकर्षित कर सकें और ऐसा जरूरी नहीं कि ये चुना हुआ स्पर्म उसी पुरुष का हो जिसे महिला ने अपने पार्टनर के तौर पर चुना है। वह चुना हुआ स्पर्म पूरी तरह से किसी दूसरे पुरुष का भी हो सकता है।

निषेचन की प्रक्रिया से जुड़ी बाधा दौड़
सिर्फ एक बार वीर्य का स्त्राव (इजैक्युलेशन) होने पर गर्भाशय के अंदर लाखों स्पर्म या शुक्राणु रिलीज होते हैं। हालांकि, इस प्रक्रिया के दौरान गर्भाशय के पास बाधाओं से भरा एक संपूर्ण मार्ग है, जिसके जरिए ओवा या अंडे के विकल्प को कम करने में मदद मिलती है। इसमें गर्भाशय का ऐसिडिक पीएच लेवल, गर्भाशय की दीवार के अंदर मौजूद म्यूकस की मोटी परत और विभिन्न श्वेत रक्त कोशिकाएं (WBCs) शामिल हैं, जिनका इस्तेमाल गर्भाशय, शुक्राणुओं को मारने के लिए करता है। महिला का शरीर शुक्राणुओं (स्पर्म) को बाहरी तत्व मानता है और इसलिए महिला का इम्यून सिस्टम यानी प्रतिरक्षा प्रणाली उन्हें खत्म करने के लिए प्रतिक्रिया करती है।

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इसके अलावा शुक्राणु तो गर्भाशय के अंदर 3 से 5 दिन तक जीवित रह सकता है, लेकिन अंडा सिर्फ 24 घंटे यानी 1 दिन के लिए। कई अध्ययनों में यह बात भी सामने आयी है कि कुछ चिड़िया ऐसी भी हैं जो शुक्राणुओं को बाहर निकाल देती हैं ताकि अयोग्य स्पर्म द्वारा अंडे को फर्टिलाइज करने से बचाया जा सके। ऐसा हमेशा जरूरी नहीं कि जो पहला स्पर्म अंडे के पास पहुंच गया वही उसे फर्टिलाइज करेगा। ऐसा इसलिए क्योंकि ओवा या अंडे के ईर्द-गिर्द 2 तरह की बेहद मोटी सुरक्षात्मक परत होती है। लिहाजा अंडे के अंदर प्रवेश करने के लिए शुक्राणु को इन सुरक्षात्मक परतों को तोड़ना होता है। सैंकड़ों शुक्राणु इन दो परतों को तोड़ने की कोशिश करते हैं और जब दोनों लेयर के बीच पर्याप्त जगह बन जाती है तभी कोई स्पर्म अंडे के अंदर प्रवेश कर उसके साथ मिल पाता है।

आमतौर पर, फर्टिलाइजेशन की इस जटिल प्रक्रिया के लिए महिला की प्रजनन प्रणाली शुक्राणुओं को विशेष तरह की एक प्रक्रिया के माध्यम से तैयार करती है, जिसे कैपेसिटेशन या क्षमतायन कहते हैं। लिहाजा वैसे शुक्राणु जो इस क्षमतायन प्रक्रिया को पूरा नहीं कर पाते हैं वे तो अंडे को बिलकुल फर्टिलाइज नहीं कर सकते।

इसमें अंडे की भूमिका क्या है?
अनुसंधानकर्ताओं ने देखा है कि आमतौर पर निष्क्रिय रहने वाला या दिखने वाला अंडा, सही शुक्राणु का चुनाव करने में अहम भूमिका निभाता है। अंडा खास तरह के केमिकल को रिलीज करता है ताकि, आनुवंशिक रूप से उपयुक्त शुक्राणु को आकर्षित किया जा सके और अनुचित या बेमेल शुक्राणु को अस्वीकार कर सके।

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इस चुनाव को अंजाम देने वाले जीन्स आमतौर पर इम्यून सिस्टम यानी प्रतिरक्षा प्रणाली से जुड़े होते हैं, खासतौर पर एमएचसी (मेजर हिस्टोकम्पैटिबिलिटी कॉम्प्लेक्स) जो इंसान की कोशिकाओं में मौजूद होता है। एमएचसी हमारे शरीर में मौजूद रोगाणुओं की पहचान कर उन्हें शरीर से बाहर निकालने में अहम भूमिका निभाता है। लिहाजा अगर असमान एमएचसी वाले शुक्राणु से अंडा मिल जाता है तो होने वाली संतान का इम्यून सिस्टम, दोनों पैरंट्स से ज्यादा मजबूत होगा और इसलिए उसके जीवित रहने व सर्वाइव करने की संभावना अधिक होगी।

इस बारे में पहले भी बताया जा चुका है कि एमएचसी का शरीर की गंध के साथ जुड़ाव होता है और इंसान, शरीर की गंध के जरिए एमएचसी में भेद या भिन्नता का पता लगा सकता है। इतना ही नहीं वे जिस परफ्यूम का चुनाव करते हैं वह भी उनके एमएचसी से मिलता-जुलता होता है।

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