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गर्भावस्था के दौरान अजन्मे बच्चे को मां के जरिये अलग-अलग तरह की एलर्जी ट्रांसफर हो सकती हैं। सिंगापुर में हुए एक प्रीक्लिनिकल अध्ययन में पता चला है कि गर्भावस्था के दौरान जब बच्चा गर्भाशय में विकसित हो रहा होता है, उस समय मां का इम्यून सिस्टम अजन्मे शिशु को एलर्जी पास कर सकता है। अध्ययन की मानें तो यह एक बड़ा कारण हो सकता है कि पैदा होने के बाद शुरुआती जीवनकाल में भी कुछ बच्चों को इस समस्या का सामना करना पड़ता है। इस महत्वपूर्ण जानकारी को साइंस पत्रिका ने हाल ही में प्रकाशित किया है।

अध्ययन के हवाले से पत्रिका ने बताया है कि शरीर के इम्यून सिस्टम का एक प्रमुख रोग प्रतिरोधक यानी एंटीबॉडी इम्यूनोग्लोबुलिन ई (आईजीई) इस एलर्जिक रिएक्शन के लिए जिम्मेदार होता है। यह एंटीबॉडी गर्भवती महिला की गर्भनाल के जरिये भ्रूण में घुसता है और उसकी मैस्ट सेल्स को बांध लेता है। यही इम्यून सेल्स भ्रूण में एलर्जिक रिएक्शन पैदा करने का काम करती हैं। इन प्रतिक्रियाओं में नाक बहना और अस्थमा जैसी समस्याएं शामिल हैं।

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अध्ययन से जुड़ी सह-लेखक और सिंगापुर के ड्यूक-एनयूएस मेडिकल स्कूल की इम्यूनोलॉजिस्ट एश्ले सैंट जॉन ने इन परिणामों पर बात करते हुए कहा है, 'पूर्व में इस जानकारी के बारे में ज्यादा नहीं पता था कि मां का इम्यून सिस्टम बच्चे के विकास के दौरान उसे प्रभावित कर सकता है और क्यों जन्म के बाद कुछ बच्चे किसी प्रकार की एलर्जी होने पर उसके खिलाफ तुरंत इम्यून रेस्पॉन्स पैदा कर लेते हैं, जबकि वे पहले कभी भी उस समस्या की चपेट में न आए हों।'

पत्रिका के मुताबिक, अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने मादा चूहों को प्रेग्नेंसी से पहले रैगवीड पोलेन नाम के एक कॉमन एलर्जन (एलर्जी पैदा करने वाला तत्व) से एक्सपोज किया। रिपोर्ट की मानें तो विश्लेषण के दौरान यह देखना दिलचस्प रहा कि जिन मादा चूहों को इस एलर्जन ने प्रभावित किया था, उनके बच्चों में भी एलर्जिक रिएक्शन पाए गए थे।

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हालांकि यह संवेदनशीलता विशेष एलर्जन की वजह से थी। इसके अलावा, चूहों के बच्चों ने धूल या अन्य प्रकार के तत्वों के प्रभाव में एलर्जिक प्रतिक्रिया नहीं दी थी। वहीं, रैगवीड पोलन के कारण हुई एलर्जन स्पेसेफिक सेंसिटिविटी समय के साथ लुप्त हो गई थी। पैदा होने के चार हफ्तों में किए गए परीक्षणों में चूहों के बच्चे एलर्जिक रिएक्शन से प्रभावित दिखे थे, लेकिन छह हफ्ते होते-होते ये रिएक्शन या तो कम हुए या खत्म ही हो गए।

इस बारे में डॉ. सैंट जॉन ने कहा है, 'एंटीबॉडी का जीवनकाल आधा होता है। यानी जो एंटीबॉडी मां से बच्चे में ट्रांसफर होते हैं, वे समय के साथ धीरे-धीरे खत्म होते जाते हैं। इसलिए वे एक समय तक ही एलर्जिक रेस्पॉन्स देने का काम करते हैं। धीरे-धीरे उनकी मात्रा कम होती जाती है और प्रभाव भी। अभी तक हम यह नहीं जान पाए हैं कि क्या ये रोग प्रतिरोधक उन एलर्जन से उनमें खुद की एलर्जी पैदा कर पाते हैं या नहीं। भावी अध्ययन में हम यही जानने की कोशिश करेंगे।'

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वहीं, अध्ययन से जुड़े एक अन्य शोधकर्ता जेरी चेन ने कहा, 'क्लिनिकल दृष्टिकोण से देखें तो आईजीए के प्लेसेंटल ट्रांसफर को लेकर और ज्यादा समझ विकसित करना और भ्रूण की मैस्ट सेल सक्रिया से जुड़े मकैनिज्म के बारे में और जानना मां से बच्चे में ट्रांसफर होने वाली एक्जिमा या अन्य एलर्जी को कम करने से जुड़ी रणनीति के लिए मददगार हो सकता है।'

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