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प्रेगनेंसी के दौरान गर्भवती महिला को उल्टी और मतली आना खासकर गर्भावस्था की पहली तिमाही में एक सामान्य सी बात है। इसे आम बोलचाल की भाषा में मॉर्निंग सिकनेस भी कहा जाता है। मॉर्निंग सिकनेस के लिए किसी खास तरह के उपचार की भी जरूरत नहीं होती क्योंकि ज्यादातर मामलों में यह समस्या अपने आप ही ठीक हो जाती है। लेकिन अब एक नई रिसर्च की मानें तो अगर गर्भवती महिला को गंभीर मॉर्निंग सिकनेस की समस्या हो तो उसे गर्भावस्था के दौरान और डिलिवरी के बाद में भी डिप्रेशन होने का जोखिम बढ़ जाता है।

गंभीर मॉर्निंग सिकनेस को हाइपरेमेसिस ग्रैविडेरम (एचजी) के तौर पर जाना जाता है
गंभीर मॉर्निंग सिकनेस जिसे हाइपरेमेसिस ग्रैविडेरम (एचजी) के रूप में जाना जाता है, व्यक्ति को दुर्बल बनाने वाली एक ऐसी स्थिति है जो यूके में लगभग 1 से 2 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं को प्रभावित करती है। सामान्य मॉर्निंग सिकनेस की तुलना में एचजी एक अधिक गंभीर समस्या है और यह गर्भावस्था के दौरान महिला के अस्पताल में भर्ती होने के सबसे सामान्य कारणों में से एक है और यह समस्या बच्चे के जन्म होने तक जारी रह सकती है। जिन गर्भवती महिलाओं को हाइपरेमेसिस ग्रैविडेरम (एचजी) की समस्या होती है वे कई-कई सप्ताह तक बिस्तर से उठ भी नहीं पाती हैं, उन्हें डिहाइड्रेशन की समस्या हो जाती है, उनका वेट लॉस होने लगता है, वे अपना कोई काम नहीं कर पाती हैं और अगर उनके और भी बच्चे हैं तो उनकी देखभाल करने में भी उन महिलाओं को मुश्किल आती है।

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50% महिलाओं में प्रसवपूर्व और 30% महिलाओं में प्रसव के बाद डिप्रेशन
यूके के इंपीरियल कॉलेज लंदन और इंपीरियल कॉलेज हेल्थकेयर एनएचएस ट्रस्ट के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययन में पाया गया कि हाइपरेमेसिस ग्रैविडेरम (एचजी) यानी गंभीर मॉर्निंग सिकनेस की समस्या से पीड़ित लगभग आधी महिलाओं में प्रसवपूर्व (एंटीनेटल) डिप्रेशन पाया गया और करीब 30 प्रतिशत महिलाओं में प्रसव के बाद (पोस्टनेटल) डिप्रेशन की समस्या देखने को मिली। जिन महिलाओं में एचजी की समस्या नहीं थी उनमें सिर्फ 6 प्रतिशत महिलाओं को ही प्रसवपूर्व डिप्रेशन हुआ और 7 प्रतिशत को प्रसव के बाद डिप्रेशन का सामना करना पड़ा। स्टडी के इन नतीजों को पियर-रिव्यूड मेडिकल जर्नल बीबीएमजे ओपन में 13 अक्टूबर 2020 को प्रकाशित किया गया था।

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एचजी के मनोवैज्ञानिक प्रभाव को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा
डॉ निकोला मिशेल-जोन्स, प्रसूति और स्त्री रोग में विशेषज्ञ रजिस्ट्रार और अध्ययन की प्रमुख ऑथर का मानना ​​है कि एचजी, इस स्थिति के मनोवैज्ञानिक प्रभाव को उतनी गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है जितना लिया जाना चाहिए, ना ही हेल्थकेयर प्रफेशनल द्वारा और ना ही आम जनता के द्वारा। डॉ जोन्स आगे कहती हैं,  "हमारे इस अध्ययन से पता चलता है कि एचजी से पीड़ित महिलाओं में प्रसवपूर्व डिप्रेशन से पीड़ित होने की आशंका 8 गुना अधिक है और प्रसव के बाद उनमें डिप्रेशन होने का खतरा 4 गुना अधिक है। अध्ययन में शामिल कुछ महिलाओं में एचजी से पीड़ित होने के बाद खुद को नुकसान पहुंचाने के विचार भी आए थे। ये आंकड़े वाकई चौंकाने वाले हैं और महिलाओं को मिलने वाले उपचार में ये परिलक्षित होने चाहिए। हमें एचजी के संदर्भ में सिर्फ शारीरिक लक्षणों का इलाज करने की बजाए और अधिक करने की आवश्यकता है। एचजी से पीड़ित महिलाओं का नियमति रूप से मानसिक स्वास्थ्य मूल्यांकन भी होना चाहिए।"

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3 अस्पतालों की 214 महिलाएं स्टडी में हुईं शामिल
इस स्टडी में लंदन के 3 अस्पतालों- चेल्सी एंड वेस्टमिंस्टर हॉस्पिटल एनएचएस फाउंडेशन ट्रस्ट, क्वीन चार्लट्स एंड चेल्सी हॉस्पिटल और सेंट मैरीज हॉस्पिटल (दोनों अस्पताल इंपीरियल कॉलेज हेल्थकेयर एनएचएस ट्रस्ट का हिस्सा हैं) की 214 महिलाओं को शामिल किया गया जो अपनी प्रेगनेंसी की पहली तिमाही में थीं।

स्टडी में शामिल आधी महिलाओं को एचजी के लक्षणों के साथ अस्पताल में भर्ती कराया गया था तो वहीं, एक समान कंट्रोल ग्रुप वाली गर्भवती महिलाएं जिन्हें जी मिचलाने और उल्टी की समस्या ज्यादा नहीं थी उन्हें मिडवाइफ के नेतृत्व वाले एंटीनेटल क्लिनिक के माध्यम से स्टडी में शामिल किया गया था। स्टडी में शामिल होने से 1 साल तक इनमें से किसी भी महिला का मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति के लिए इलाज नहीं किया गया था। गर्भावस्था की पहली तिमाही में और बच्चे के जन्म के 6 सप्ताह बाद इन महिलाओं के मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य का मूल्यांकन किया गया।

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एचजी वाली 49% और बिना एचजी वाली 6% महिलाओं को प्रेगनेंसी में हुआ डिप्रेशन
एचजी से पीड़ित महिलाओं में से 49 प्रतिशत ने गर्भावस्था के दौरान डिप्रेशन का अनुभव किया, जबकि नियंत्रण समूह वाली महिलाओं में से केवल 6 प्रतिशत ने। नियंत्रण समूह वाली सिर्फ 7 फीसदी महिलाओं में प्रसव के बाद डिप्रेशन देखने को मिला जबकी एचजी वाले समूह में महिलाओं में प्रसव के बाद डिप्रेशन का आंकड़ा 29 प्रतिशत था। एचजी वाली कम से कम आधी महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान या प्रसव के बाद 4 सप्ताह या इससे भी अधिक समय तक काम से छुट्टी लेने के लिए मजबूर होना पड़ा।

स्टडी में शामिल 8 महिलाओं को प्रेगनेंसी टर्मिनेट भी करनी पड़ी
हालांकि इस स्टडी में एचजी और मातृ-शिशु संबंध के बीच कोई सीधा लिंक नहीं पाया गया, लेकिन अन्य शोधों से पता चला है कि डिप्रेशन, इस मातृ-शिशु बंधन पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। दुख की बात है कि स्टडी में शामिल 8 महिलाएं जिन्हें गर्भावस्था के दौरान एचजी की समस्या हो गई थी, उन्हें मूल रूप से बच्चे को जन्म देने की इच्छा व्यक्त करने के बावजूद एचजी की वजह से गर्भावस्था को समाप्त करना पड़ा। डॉ जोन्स जो अपनी पहली प्रेगनेंसी के दौरान साल 2018 में खुद भी एचजी की समस्या से पीड़ित थीं वे कहती हैं, "हालांकि हम पूरे भरोसे के साथ ये नहीं कह सकते कि उन महिलाओं के प्रेगनेंसी को समाप्त करने के फैसले के पीछे एचजी ही प्रमुख कारण था, लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि एचजी का भी रोल जरूर रहा होगा।"

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एचजी से पीड़ित महिलाओं को मानसिक देखभाल की भी जरूरत
डॉ मिशेल-जोन्स को उम्मीद है कि उनकी इस स्टडी के निष्कर्ष एचजी को बेहतर तरीके से समझने में और क्लिनिकल ​​दिशा निर्देशों को बदलने में मदद कर सकते हैं कि आखिर गंभीर मॉर्निंग सिकनेस यानी एचजी से पीड़ित महिलाओं का इलाज कैसे किया जाए और साथ ही इसमें मनोवैज्ञानिक स्क्रीनिंग और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ को भी शामिल किया जाए।

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