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निःसंदेह गर्भावस्था हर महिला के लिए एक बेहतरीन सफर है। हर महिला इसका आनंद उठाना चाहती है। लेकिन इस सफर में सिर्फ खुशियां ही खुशियां हों, ऐसा बिल्कुल नहीं है। इस जर्नी में उठा-पटक है, उतार-चढ़ाव है। गर्भावस्था के दौरान मन बहुत खुश होता है तो कई बार शारीरिक परेशानियों की वजह से गर्भवती महिला उदास हो जाती है। यहां तक कि यह सफर उसे तनाव में भी डाल सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि गर्भावस्था के दौरान कई तरह की बीमारियां हो सकती हैं। समय रहते इनके बारे में पता न लगे, तो समस्या गंभीर हो सकती है। बीमारी लाइलाज रहने पर गर्भपात तक हो जाता है। अतः प्रेगनेंसी के इस सफर के शुरूआती चरण यानी दसवें सप्ताह में होने वाली बीमारियों के बारे में अवश्य जानें। तभी आप इन बीमारियों से बची रह सकती हैं।

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  1. योनि से रक्तस्राव होना - Yoni se ratksrav hona
  2. बहुत ज्यादा मतली और उल्टी होना - Bahut jyada matli ya ulti hona
  3. तेज बुखार का होना - Tej bukhar hona
  4. योनि स्राव और योनि में खुजली होना - yoni srav aur yoni me khujli hona
  5. पेशाब करने के दौरान जलन और दर्द होना - Peshab karne ke dauran jalan aur dard hona
  6. पिंडलियों में दर्द, सूजन और गंभीर सिरदर्द - Pindliyon me dard, sujan aur gambhir sirdard
  7. लंबे समय से चला आ रहा रोग - Lambe samay se chala aa raha rog
  8. थकान होना और नींद न आना - Thakan hona aur nind na aana
  9. कब्ज या डायरिया होना - kabj ya diarrhea hona
  10. सांस लेने में तकलीफ - Saans lene me takleef

ज्यादातर महिलाओं को लगता है कि गर्भावस्था के दौरान ब्लीडिंग नहीं होती है। जबकि गर्भावस्था के दसवें सप्ताह में थोड़ी-बहुत ब्लीडिंग या रक्तस्राव होना सामान्य है। विशेषज्ञों के अनुसार पहली तिमाही में यदि किसी गर्भवती महिला को बहुत ज्यादा ब्लीडिंग होती है, तो यह चिंता का विषय है। हैवी ब्लीडिंग का मतलब गर्भपात या एक्टोपिक प्रेग्नेंसी (अस्थानिक गर्भावस्था) हो सकती है। ऐसा होने पर खून का रंग अवश्य देखें। खून का रंग जितना गाढ़ा होता है, गर्भपात होने की आशंका की उतनी ही पुष्टि होती है। इसके इतर यदि आपको ब्लीडिंग हो रही है, साथ ही पीरियड्स के दौरान होने वाले दर्द की तरह दर्द हो रहा है तो भी यह गर्भपात की ओर संकेत देता है। अगर किसी महिला को ब्लीडिंग के साथ पेट के निचले हिस्से में दर्द हो और दर्द तीव्र हो तो यह एक्टोपिक प्रेग्नेंसी की ओर इशारा करता है। यह एक ऐसी समस्या है जिसमें गर्भाशय के बाहर गर्भधारण हो जाता है। आमतौर पर फेलोपियन ट्यूब में ही एक्टोपिक प्रेगनेंसी की दिक्कत होती है।

आप क्या करें:
ब्लीडिंग के साथ-साथ दर्द होने पर जरा भी लापरवाही न बरतें। डाॅक्टर से संपर्क करें। वह लक्षणों के आधार पर आपको अल्ट्रासाउंड और ब्लड सैंपल की जांच की सलाह दे सकते हैं। जैसा कि पहले भी बताया है कि हल्की-फुल्की ब्लीडिंग देखकर डरें  नहीं। लेकिन ऐसी समस्या को नजरंदाज करना भी सही नहीं है।

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पहली तिमाही में उल्टी और मतली होना सामान्य है। दसवें सप्ताह में भी यह समस्या बनी रहती है। कुछ महिलाओं को तो प्रेगनेंसी के नौ माह तक उल्टी और मतली होती रहती है। लेकिन बहुत ज्यादा या बार-बार उल्टी होना स्वास्थ्य के लिए सही नहीं है। इससे शरीर में पानी की कमी हो सकती है। शरीर में पानी की कमी होने पर आपके लिए जटिलताएं बढ़ सकती हैं। इसलिए ध्यान रखें कि अगर आप 12 घंटे तक पानी या तरल पदार्थ शरीर में नहीं रख पाती हैं तो तुरंत डाॅक्टर से संपर्क करें। इस तरह लगातार उल्टी होने का मतलब वजन घटना, निर्जलीकरण, इलेक्ट्रोलाइट में असंतुलन आदि समस्या है।

आप क्या करें:
इस समस्या को हल्के में न लें। लगातार उल्टी होने पर डाॅक्टर से कहें कि डिहाइड्रेशन की समस्या का समाधान करे। जरूरी हो तो अस्पताल में भर्ती हो जाएं। उल्टी और मतली से निपटने के लिए डाॅक्टर कुछ दवाएं भी दे सकते हैं। विशेषज्ञों की मानें तो मतली और उल्टी पहली तिमाही में होते ही हैं। कई मामलों में लगातार उल्टी होना स्वस्थ प्रेगनेंसी की निशानी होती है।

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गर्भवती महिला का शरीर का तापमान अगर 101 डिग्री फैरेनहाइट या 38 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा हो तो यह चिंता का विषय हो सकता है। कई बार शरीर का तापमान सामान्य बुखार को ही इंगित नहीं करता अपितु किसी तरह के इंफेक्शन की ओर भी इशारा करता है। संक्रमण होने पर इसका प्रभाव गर्भ में पल रहे भ्रूण पर भी पड़ता है। अतः बुखार होने पर इसके साथ ही अन्य लक्षणों पर भी गौर करें मसलन रैशेज, जोड़ों में दर्द। ये लक्षण साइटोमेगालो वायरस, टोक्सोप्लाज़मोसिज़ और पार्वो वायरस जैसे समस्या के हो सकते हैं। ये सामान्य समस्याएं नहीं हैं। इसलिए इन्हें कतई नजरंदाज न करें।

आप क्या करें:
बुखार होने पर डाॅक्टर के पास जाएं। इसके साथ ही अन्य लक्षण जैसे बदन दर्द, फ्लू, रैशेज और जोड़ों में दर्द के बारे में भी डाॅक्टर को विस्तार से बताएं। गर्भावस्था के दौरान सभी जरूरी वैक्सीनेशन समय पर अवश्य लें।

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कुछ मामलों में गर्भावस्था के दौरान योनि में खुजली या योनि स्राव होना सामान्य माना जाता है। लेकिन कुछ मामलों में यह संक्रमण या सेक्सुअल ट्रांसमिटेड डिजीज होने का संकेत देता है। विशेषज्ञों के अनुसार इस समस्या का गर्भावस्था पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है। यह भ्रूण के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकता है।

आप क्या करें:
योनि में खुजली या योनि से स्राव होने पर परेशान न हों, न ही शर्मिंदगी महसूस करें। अपनी गाइनोकोलाॅजिस्ट को इस संबंध में पूरी जानकारी दें। अगर आपने ऐसा नहीं किया तो गर्भावस्था का अगला चरण या आने वाले हफ्ते काफी मुश्किल भरे हो सकते हैं। यही नहीं आपके बच्चे के लिए भी यह स्थिति हानिकारक हो सकती है।

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पेशाब के दौरान अगर किसी गर्भवती महिला को दर्द होता है या जलन होती है तो यह यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन का संकेत हो सकता है। अगर इसका समय पर इलाज नहीं किया गया तो यह समस्या गंभीर हो सकती है, संक्रमण फैल सकता है। इसका सीधा-सीधा असर गर्भ में पल रहे बच्चे पर पड़ता है।

आप क्या करें:
अगर सच में आपको संक्रमण हुआ है तो दर्द और जलन को खत्म करने का समाधान खोजें। बिना देरी किए डाॅक्टर से मिलें। वे आपको दर्द कम करने और संक्रमण को खत्म करने की दवा देंगे। इसके साथ ही डाॅक्टर आपके और बच्चे की सुरक्षा का भी पूरा ख्याल रखेंगे।

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हालांकि गर्भवती महिलाओं के पैरों में सूजन होना आम समस्या है। इसके बावजूद इन बीमारियों के प्रति लापरवाही बरतना सही नहीं है। गर्भावस्था में इस तरह की समस्या होने से खून के थक्के जमने की आशंका बढ़ जाती है। कई दफा खून के थक्के जमने की वजह से पिंडलियों में सूजन और दर्द होता है। नतीजतन थक्का फेफड़ों की ओर स्थानांतरित हो सकता है जो कि गर्भवती महिला के लिए घातक स्थिति है।

इसी तरह अगर आपको तीव्र सिरदर्द है, तो समझें कि ऐसा मस्तिष्क में खून के थक्के जमने की वजह से भी हो सकता है। हालांकि प्रेग्नेंसी में सिरदर्द होने की अन्य वजहें भी होती हैं। अतः सिरदर्द होने पर तुरंत इसे गंभीर न समझें।

आप क्या करें:
अगर आपको गर्भ धारण करने से पहले भी खून के थक्के जमने की समस्या रही है या तीव्र सिरदर्द होता रहा है तो अपने डाॅक्टर को इस संबंध में पूरी जानकारी दें। वे आपसे प्रेगनेंसी के दौरान सभी जरूरी एहतियात बरतने की सलाह दे सकते हैं।

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जिन महिलाओं को लंबे समय से कोई रोग है, जैसे थायराइड, डायबिटीज, हाई बीपी, अस्थमा आदि तो उन्हें सामान्य गर्भवती महिलाओं की तुलना में ज्यादा सजग रहना चाहिए। अपनी मेडिकल स्थिति में जरा भी बदलाव होने पर उसे नोट करना चाहिए। वैसे भी इस तरह की बीमारियों को अगर सही तरह से नियंत्रित नहीं किया गया तो यह गर्भावस्था को प्रभावित कर सकती है। इससे गर्भ में पल रहे शिशु के स्वास्थ्य पर भी असर पड़ सकता है।

उदाहरण स्वरूप समझें, विशेषज्ञ कहते हैं कि अगर आपका थायराइड हार्मोन बहुत कम या ज्यादा है, तो गर्भपात होने का जोखिम बढ़ जाता है। इसी तरह अगर आपके शुगर के स्तर को नियंत्रित नहीं किया गया तो इससे भी गर्भपात हो सकता है या फिर बच्चा असामान्य पैदा हो सकता है।

आप क्या करें:
किसी भी तरह की जटिलताओं को महसूस करने पर डाॅक्टर को इस बाबत सूचित करें। इसके अलावा डाॅक्टर द्वारा दी गई दवा नियमित समय पर लें।

गर्भावस्था की पहली तिमाही महिलाओं के लिए काफी जटिल होती है। खासकर दसवें सप्ताह की बात करें तो इन दिनों गर्भवती महिला पर्याप्त नींद नहीं ले पातीं है नतीजतन हमेशा थकान से भरी रहती हैं। अच्छी तरह न सो पाने के कारण गर्भवती महिला को सीने में जलन की समस्या हो सकती है। रात को भी बार-बार उनकी नींद टूट जाती है। यूं तो ये सामान्य प्रक्रिया है। इसके लिए ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं होती। लेकिन यदि समस्या गंभीर हो रही है तो इसे नजरंदाज न करें।

आप क्या करें:
नींद न आने की स्थिति में आप ऐसे काम करें, जिससे आपको नींद आ सके। मसलन सोने के कुछ देर पहले किताब पढ़ें। इस तरह की गतिविधियों से भी कोई मदद न मिले तो इस संबंध में गाइनोकोलाॅजिस्ट से मिलें।

दसवें सप्ताह में कब्ज या डायरिया की समस्या सामान्य नहीं है। आमतौर पर गर्भवती महिला को कब्ज की समस्या खानपान में बदलाव और पर्याप्त मात्रा में आयरन युक्त आहार न लेने की वजह से होती है। ऐसी स्थिति में बवासीर हो सकता है या फिर मल से खून निकल सकता है।

डायरिया होना भी गर्भवती महिलाओं के लिए सही नही है। यदि 3 से 4 दिनों तक डायरिया हो तो गर्भवती महिला को कमजोरी और निर्जलीकरण हो सकता है।

आप क्या करें:
डायरिया होने पर तुरंत डाॅक्टर के पास जाएं। ज्यादा से ज्यादा पानी पीएं और तरल पदार्थ का सेवन करें। कुछ मामलों में फूड पाइजनिंग की वजह से भी डायरिया हेा जाता है। गर्भवती महिला को ऐसी स्थिति में 24 घंटे के अंदर इस समस्या का समाधान कर लेना चाहिए वरना इससे स्वास्थ्य को हानि हो सकती है।

पहली तिमाही में गर्भवती महिला में प्रोजेस्टेरोन का स्तर बढ़ जाता है। नतीजतन सांस लेने में तकलीफ होने लगती है। दरअसल दसवें सप्ताह तक आते-आते गर्भाशय फैलने लगता है जिससे डायाफ्राम और लंग्स ऊपर की ओर खिसकने लगते हैं। यही वजह है कि इस सप्ताह में सांस लेने में तकलीफ हो सकती है। हालांकि यह कोई गंभीर समस्या नहीं है। सप्ताह दर सप्ताह यह समस्या अपने आप सुलझ जाती है। लेकिन यदि छींकते, खांसते हुए भी आपको सांस लेने में दिक्कत हो तो डाॅक्टर से संपर्क करना बेहतर होता है।

आप क्या करें:
इस सप्ताह सांस लेने में तकलीफ होने पर कुछ छोटे-छोटे सुझाव को अपना सकते हैं जैसे धीरे-धीरे काम करें, हमेशा सीधे होकर बैठें, रात को सोते समय ऊंचे तकिए का इस्तेमाल करें ताकि सांस लेने में तकलीफ न हो। इन सबके इतर अगर समस्या तब भी बनी रहे तो विशेषज्ञों से सलाह लें। वे आपकी स्थिति का परीक्षण कर तुरंत समझ जाएंगे कि ये सामान्य सांस लेने की दिक्कत है या फिर अन्य जटिलताओं की ओर संकेत कर रहा है।

गर्भावस्था के दसवें सप्ताह में सिर्फ बीमारी ही जटिलताओं का काराण नहीं बनतीं अपितु इसके साथ ही कुछ शारीरिक बदलाव या गर्भधारण की स्थितियां भी जोखिम बढ़ा सकती हैं। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि 10 से 15 फीसदी गर्भवती महिलाओं का गर्भपात हो जाता है। हालांकि इनमें से 80 फीसदी गर्भपात पहली तिमाही में होते हैं। इसकी वजह संक्रमण, क्रोमोसोमल असामान्यता, थक्का बनना या गर्भाशय में समस्या होना है। गर्भपात से बचने के लिए संतुलित आहार, नियमित एक्सरसाइज करनी चाहिए। इसके साथ ही ऊपर बताए गए सुझावों को अपनाएं। यकीन मानिए गर्भावस्था का दसवां सप्ताह सुकून और आराम से कट जाएगा।

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