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हर साल दुनियाभर में करीब 20 लाख मृत बच्चों का जन्म होता है। यानी हर 16 सेकंड में एक मृत बच्चा पैदा होता है। संयुक्त राष्ट्र (यूएन) से जुड़े तीन संगठन यूनाइटेड नेशंस चिल्ड्रेन्स फंड (यूनिसेफ), विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और इकनॉमिक एंड सोशल अफेयर्स की पॉप्युलेशन डिविजन ने वर्ल्ड बैंक के साथ मिल कर मृत जन्म यानी स्टिलबर्थ को लेकर पहली बार कोई संयुक्त आंकलन किया है। इसकी रिपोर्ट को 'अ निगलेक्टिड ट्रैजेडी: दि ग्लोबल बर्डन ऑफ स्टिलबर्थ' नाम से प्रकाशित किया गया है।

डब्ल्यूएचओ की आधिकारिक वेबसाइट पर प्रकाशित खबर के मुताबिक, रिपोर्ट से पता चलता है कि दुनियाभर में 84 प्रतिशत स्टिलबर्थ के मामले निम्न और निम्न-मध्यम आय वाले देशों में देखने को मिलते हैं। साल 2019 में स्टिलबर्थ के हर चार मामलों में से तीन सब-सहारा अफ्रीका या दक्षिण एशिया से थे। रिपोर्ट में गर्भावस्था के 28 हफ्तों या उससे ज्यादा समय तक बच्चे में जीवन का कोई लक्षण नहीं दिखने को मृत जन्म के रूप में परिभाषित किया गया है।

रिपोर्ट में यूनिसेफ की एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर हेनरिटा फोर कहती हैं, 'जन्म के समय या प्रेग्नेंसी के दौरान बच्चे को खोना परिवार के बहुत बड़ी त्रासदी होती है। हर 16 सेकंड में दुनिया में कहीं कोई मां मृत जन्म की त्रासदी से गुजरती है, जिसे बयान करना संभव नहीं है। बच्चे का जीवन खत्म होने के अलावा महिला, परिवार और समाज पर इसके मनोवैज्ञानिक और वित्तीय प्रभाव गंभीर रूप से और लंबे समय तक दिखते हैं। उच्च स्तर की गुणवत्तापूर्ण मॉनिटरिंग, सही एंटेनेटल (जन्म से पूर्व) केयर और प्रशिक्षित बर्थ अटेंडेंट के जरिये स्टिलबर्थ के कई मामलों को रोका जा सकता है।'

रिपोर्ट कहती है कि कोविड-19 महामारी से दुनियाभर में स्टिलबर्थ के मामले बढ़ सकते हैं। इसमें कहा गया है कि कोरोना वायरस संकट की वजह से 50 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित हुई हैं, जिससे 12 महीने से ज्यादा की अवधि में दो लाख से ज्यादा अतिरिक्त स्टिलबर्थ के मामले देखने को मिल सकते हैं। रिपोर्ट के लेखकों ने निम्न और मध्य आय वाले 117 देशों को लेकर यह आशंका जताई है। उन्होंने कहा है कि ऐसा होने पर वैश्विक स्तर पर मृत जन्म के मामलों में 11 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी हो सकती है। रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसा प्रेग्नेंसी और जन्म के दौरान मिलने वाली खराब गुणवत्ता वाली चिकित्सा के कारण है। इसके अलावा, एंटेनेटल और इंट्रापार्टम सर्विसेज के लिए निवेश की कमी को भी इस स्थिति के लिए जिम्मेदार बताया गया है। साथ ही, नर्सिंग व मिडवाइफरी (प्रसूति विद्या) को स्टिलबर्थ की रोकथाम के संबंध में प्रमुख चुनौतियां करार दिया है।

रिपोर्ट तैयार करने में शामिल सभी प्रतिष्ठित संस्थानों ने कहा है कि 40 प्रतिशत से ज्यादा स्टिलबर्थ के मामले प्रसव के दौरान देखने को मिलते हैं। यह एक ऐसा नुकसान है, जिसकी भरपाई बच्चे के जन्म के समय प्रशिक्षित स्वास्थकर्मी को उपलब्ध कराकर और इमरजेंसी में समय पर केयर देकर की जा सकती है। रिपोर्ट की मानें तो सब-सहारा अफ्रीका और मध्य तथा दक्षिण एशिया में करीब आधे मृत जन्म के मामले प्रसव के दौरान ही घटित होते हैं। यूरोप, उत्तरी अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों में ऐसे मामलों की दर केवल छह प्रतिशत है।

वहीं, कोविड-19 का जिक्र करते हुए रिपोर्ट कहती है कि इस संकट से पहले भी निम्न व मध्यम आय वाले देशों में स्टिलबर्थ को रोकने के लिए बहुत कम महिलाओं को समय रहते उच्च गुणवत्ता वाली चिकित्सा सेवा मिल पा रही थी। इन 117 देशों में प्रेग्नेंसी के दौरान महिलाओं को होने वाली कई समस्याओं व मुद्दों से निपटने की जरूरत पर भी जोर दिया गया है। इनमें सी-सेक्शन, मलेरिया रोकथाम, हाइपरटेंशन मैनेजमेंट, सिफलिस डिटेक्शन और ट्रीटमेंट जैसे अहम विषय शामिल हैं। इनके अलावा, प्रसव के समय सहायक वजाइनल डिलिवरी के मुद्दे पर भी ध्यान दिए जाने का सुझाव दिया गया है, जोकि स्टिलबर्थ प्रिवेंशन के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है। रिपोर्ट के मुताबिक, जिन महिलाओं को इस क्रिटिकल इंटरवेंशन की जरूरत होती है, उनमें से आधे से भी कम को यह मिल पाता है।

हालात केवल गरीब देशों के खराब नहीं हैं। रिपोर्ट बताती है कि साल 2019 में कोई 39 उच्च आय वाले देशों में भी स्टिलबर्थ के मामलों की संख्या नवजात शिशु मृत्यु से ज्यादा देखी गई है। वहीं, 15 उच्च आय वाले देशों में मृत जन्म के मामले वहां दर्ज किए गए इन्फेंट डेथ की घटनाओं से ज्यादा थे। इन देशों में महिलाओं या मांओं की शिक्षा का स्तर इस स्थिति के लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार बताया गया है। एक ट्रेंड यह देखा गया है कि कोई देश गरीब हो या अमीर, दोनों ही में स्टिलबर्थ रेट ग्रामीण इलाकों में ज्यादा दर्ज किया गया है। इसके लिए आर्थिक-सामाजिक कारण प्रमुख रूप से जिम्मेदार हैं। मिसाल के लिए नेपाल में अल्पसंख्यक जातियों की महिलाओं का स्टिलबर्थ रेट (कथित) अगड़ी जाति या उच्च वर्ग की महिलाओं की अपेक्षा 40 से 60 प्रतिशत ज्यादा था। वहीं, कनाडा या अमेरिका जैसे उन्नत देशों में ऐसा गैर-ईसाई या अफ्रीकी मूल के लोगों के साथ होता है। कनाडा में इनुइट जनसंख्या की महिलाओं में स्टिलबर्थ रेट वहां की बाकी आबादी के मुकाबले तीन गुना ज्यादा पाया गया है। इसी तरह, अमेरिका में अफ्रीकी-अमेरिकी मूल की महिलाओं में यह दर श्वेत महिलाओं की अपेक्षा दोगुनी है।

इन तमाम कारणों की वजह से हेल्थ सर्विस में हुई प्रगति के बावजूद नवजात बच्चों की मौत की वजहों को रोकने या उनका समाधान करने और मृत जन्म के मामलों को कम करने से जुड़े प्रयासों की गति धीमी रही है। आंकड़े इसकी गवाही देते हैं। साल 2000 से 2019 के बीच दुनियाभर में स्टिलबर्थ में कमी से संबंधित वार्षिक दर औसतन केवल 2.3 प्रतिशत के आसपास रही है। वहीं, नवजात मृत्यु दर में केवल 2.9 प्रतिशत की कटौती हुई है, जबकि जन्म से लेकर पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर केवल 4.3 प्रतिशत कम हुई है। हालांकि प्रभावी नीति, कार्यक्रम व निवेश के जरिये इन आंकड़ों को सुधारा जा सकता है।

रिपोर्ट पर विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस एडनॉम गेब्रेयेसस ने कहा है, 'दुनिया में बच्चे का स्वागत करना एक खुशी का पल होता है। लेकिन दुनियाभर में हर दिन हजारों माता-पिता एक असहनीय दुख (स्टिलबर्थ) का सामना करते हैं, क्योंकि उनके बच्चे मरे हुए पैदा होते हैं। मृत जन्म की त्रासदी बताती है कि स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने और उन्हें वैसा बनाए रखना कितना ज्यादा जरूरी है। साथ ही, नर्स और मिडवाइफ को लेकर निवेश बढ़ाना कितना महत्वपूर्ण है।'

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