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वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययनों के माध्यम से यह दिखाया है कि वैसे बच्चे जिनकी माएं डिप्रेशन (अवसाद) या ऐंग्जाइटी (चिंता) की समस्या से जूझ रही होती हैं उन बच्चों में स्वस्थ मांओं के बच्चों की तुलना में शारीरिक रूप से तनाव के लक्षण अधिक दिखाई देते हैं, जब उन्हें एक मानक तनाव परीक्षण दिया जाता है। तनाव से गुजर रहे इन बच्चों की दिल की धड़कनें काफी बढ़ जाती हैं, जिससे शोधकर्ताओं को डर है कि बड़े होने पर इन बच्चों को भावनात्मक तनाव का सामना करना पड़ सकता है। 

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प्रेगनेंसी और डिलिवरी के बाद 10-20% महिलाओं में दिखते हैं मूड संबंधी विकार
मां और शिशु के बीच परस्पर संपर्क और संवाद, विशेष रूप से नवजात शिशु के जीवन के शुरुआती कुछ महीनों में, शिशु के स्वस्थ विकास में बहुत बड़ी भूमिका निभाता है। कुछ मांओं को, विशेष रूप से वे जो अवसाद, चिंता या डिलीवरी के बाद डिप्रेशन जैसे मूड विकारों से पीड़ित होती हैं उन्हें अपने शिशु के नकारात्मक स्नेह को विनियमित करने में मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, जिस कारण ऐसा माना जाता है कि बड़े होने पर बच्चे में असुरक्षा की भावना पैदा होती है। गर्भावस्था के दौरान और प्रसव के बाद की अवधि में मूड संबंधी विकार जैसे चिड़चिड़ापन, मूड में अचानक बदलाव और हल्का डिप्रेशन आदि बेहद कॉमन है जो करीब 10 से 20 प्रतिशत महिलाओं में देखने को मिलता है।

स्टिल फेस टेस्ट के जरिए मां और बच्चों की जांच की गई
पहली बार 1970 में तैयार किए गए प्रसिद्ध "स्टिल फेस टेस्ट" में नवजात शिशुओं के लिए "भावनात्मक रूप से दूर रहने वाली" मांओं के प्रभाव को प्रदर्शित किया गया था। इस दौरान मांओं को अपने बच्चों के साथ चंचलतापूर्वक बातचीत करने के लिए कहा गया और फिर उन्हें एक अवधि बितानी थी जहां उनका सारा संपर्क रिक्त हो गया, इससे पहले कि वे सामान्य संपर्क को फिर से शुरू करें। इसके दूसरे चरण में स्टिल-फेस एपिसोड के दौरान शिशुओं ने हद से ज्यादा नकारात्मक भावनाओं के साथ-साथ सामाजिक जुड़ाव में कमी और व्यवहार से परहेज का प्रदर्शन किया।

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अवसादग्रस्त मां के बच्चों की हार्ट बीट में 8 बीट प्रति मिनट की बढ़ोतरी
अब स्टडी की प्रारंभिक खोज के दौरान जर्मनी के शोधकर्ताओं ने दिखाया कि जिस अवधि में मां बच्चे से अपना ध्यान हटाती है, उस समय चिंता या अवसाद से पीड़ित मांओं के बच्चों की हृदय गति में उल्लेखनीय वृद्धि देखने को मिली। स्वस्थ मांओं के बच्चों की तुलना में औसतन 8 बीट प्रति मिनट अधिक की बढ़ोतरी। स्वस्थ बच्चों की तुलना में इन शिशुओं को उनकी मांओं ने बहुत अधिक कठिन स्वभाव के शिशु के तौर पर वर्गीकृत किया।

परीक्षण के दौरान मां और बच्चे की हार्ट रेट की दर को मापा गया
शोधकर्ताओं ने इस स्टडी में कुल 50 मांओं और उनके बच्चों को शामिल किया: इनमें से 20 मांओं को जन्म के समय अवसाद या चिंता से जुड़ी समस्या थी और 30 मांएं स्वस्थ और कंट्रोल ग्रुप वाली थीं। प्रत्येक मां-शिशु के जोड़े को स्टिल फेस टेस्ट से गुजरना पड़ा। मांओं से कहा गया था कि वे 2 मिनट के लिए अपने बच्चों के साथ खेलें और फिर आंखों के संपर्क को बनाए रखते हुए बच्चे के साथ सभी तरह के संपर्क (इंटरैक्शन) को बंद कर दें। 2 मिनट के बाद मांओं ने फिर से बच्चों के साथ चंचलता के साथ बातचीत शुरू कर दी। इस पूरे परीक्षण के दौरान शोधकर्ताओं ने मां और बच्चे दोनों के हार्ट रेट की दर को मापा।

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अवसादग्रस्त मां के बच्चों में तनाव के प्रति अधिक संवेदनशील प्रतिक्रिया
जर्मनी के यूनिवर्सिटी ऑफ हेडिलबर्ग के अनुसंधानकर्ता फैबियो ब्लैन्को डोर्मोन्ड कहते हैं, "अपनी इस रिसर्च में हमने पाया कि अगर कोई मां चिंतित, उदास या डिप्रेशन में थी, तो उसके बच्चे में टेस्ट के दौरान तनाव या स्ट्रेस के प्रति और अधिक संवेदनशील शारीरिक प्रतिक्रिया देखने को मिली, किसी स्वस्थ मां के बच्चे की तुलना में। यह गैर-संवाद वाले चरण के दौरान हार्ट बीट में प्रति मिनट औसतन 8 बीट की सांख्यिकीय वृद्धि थी। यह एक शुरुआती खोज है, इसलिए हमें एक बड़े नमूने के साथ इसे दोहराना होगा यह सुनिश्चित करने के लिए कि परिणाम इसके अनुकूल हों। यही हमारा अगला कदम है।"

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मां के डिप्रेशन का शिशु के तनाव प्रणाली पर दिखता है तत्काल प्रभाव
न्यूयॉर्क स्थित माउंट सिनाई के आइकैन स्कूल ऑफ मेडिसिन में विमिन्स हेल्थ प्रोग्राम की डायरेक्टर प्रफेसर वीर्ले बर्गिन्क इस बारे में कहती हैं, "इस स्टडी का अर्थ ये हुआ कि नई मांओं में अवसादग्रस्तता और चिंता विकारों का निदान और उपचार जल्द से जल्द करना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह शिशु के तनाव प्रणाली पर तत्काल प्रभाव डालता है। इससे पहले हुए अध्ययनों में न केवल शॉर्ट टर्म के लिए बल्कि लंबे समय तक बच्चों पर पोस्टपार्टम मूड विकारों के प्रभावों को दिखाया गया है। ज्यादातर प्रसवोत्तर मनोदशा विकार गर्भावस्था के दौरान या उससे पहले ही शुरू हो जाते हैं और इसलिए प्रारंभिक डायग्नोसिस बेहद महत्वपूर्ण है।"

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