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रूमेटाइड फैक्टर टेस्ट यानी आरएफ टेस्ट हमारे खून में रूमेटाइड फैक्टर की जांच करता है। रूमेटाइड फैक्टर्स हमारे इम्यून सिस्टम द्वारा तैयार किये जाने वाले प्रोटीन्स होते हैं। सामान्य तौर पर हमारा इम्यून सिस्टम बीमारियां पैदा करने वाले तरह-तरह के तत्वों, जैसे वायरस और बैक्टीरिया से लड़ता है। लेकिन रूमेटाइड फैक्टर गलती से हमारे शरीर की ही स्वस्थ ग्रंथियों, जोड़ों और अन्य सामान्य सेल्स पर हमला करने लगते हैं। 

आरएफ टेस्ट का उपयोग आमतौर पर रूमेटाइड अर्थराइटिस की जांच में किया जाता है। रूमेटाइड अर्थराइटिस एक तरह का ऑटोइम्यून डिसऑर्डर है, जिसमें दर्द, सूजन और जोड़ों में अकड़न जैसी स्थिति हो जाती है। रूमेटाइड फैक्टर जुवेनाइल अर्थराइटिस जैसे ऑटोइम्यून डिसऑर्डर, कुछ विशेष संक्रमण और कुछ तरह के कैंसर का भी संकेत हो सकते हैं। 

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  1. रूमेटाइड फैक्टर टेस्ट क्या होता है? - What is RF Test in Hindi?
  2. रूमेटाइड फैक्टर टेस्ट क्यों किया जाता है? - What is the purpose of RF Total Serum Test in Hindi?
  3. रूमेटाइड फैक्टर टेस्ट से पहले - Before RF Test in Hindi
  4. रूमेटाइड फैक्टर टेस्ट के दौरान - During RF Total Serum Test in Hindi
  5. रूमेटाइड फैक्टर टेस्ट के क्या जोखिम हैं? - What are the risks associated with RF Test in Hindi?
  6. रूमेटाइड फैक्टर टेस्ट के परिणाम का क्या मतलब होता है? - What do the results of RF Test mean in Hindi?

आरएफ एक तरह का प्रोटीन होता है। यह हमारे इम्यून सिस्टम द्वारा तैयार किया जाता है। जो हमारे शरीर के स्वस्थ टीशू पर हमला कर सकता है। स्वस्थ लोगों में आरएफ नहीं बनता इसलिए हम कह सकते हैं कि शरीर में आरएफ की मौजूदगी किसी तरह की ऑटोइम्यून बीमारी का संकेत हो सकती है। कई बार स्वस्थ लोगों का शरीर भी आरएफ तैयार करता है। हालांकि ऐसा बहुत दुर्लभ मामलों में होता है और डॉक्टर इस बात को पूरी तरह से समझ नहीं पाते हैं कि ऐसा क्यों होता है।

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आपको डॉक्टर यह टेस्ट कराने की सलाह दे सकते हैं अगर आपको रूमेटाइड अर्थराइटिस के लक्षण दिखते हैं। रूमेटाइड अर्थराइटिस में निम्नलिखित लक्षण होते हैं:

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इस टेस्ट से पहले आपको किसी तरह की कोई तैयारी करने की जरूरत नहीं होती है। हालांकि कुछ लोगोंं को सुई से बहुत डर लगता है। इसीलिए सुई से खून के सैंपल को निकाले जाने को लेकर वो बहुत संवेदनशील होते हैं। इसलिए अगर आपके साथ ऐसा है तो इसे लेकर आप डॉक्टर से बात कर लें। अगर जांच के समय आपको बेहोशी या मतली आने जैसा महसूस हो रहा है तो अपने डॉक्टर से बता दें। 

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यह टेस्ट बहुत जल्दी हो जाता है और इसमें दर्द भी नहीं होता। इस टेस्ट के लिए डॉक्टर सुई से आपके हाथ में से खून का सैंपल लेते हैं। खून के इस सैंपल को डॉक्टर जांच करवाने के लिए लैब में भेज देते हैं।

बाकी खून का सैंपल लेने की विधि अन्य टेस्ट की तरह ही होती है। यानी खून का सैंपल लेते समय डॉक्टर जिस जगह से सैंपल लेना होता है, वहां स्पिरीट से साफ कर देते हैं। इसके बाद आपके हाथ में एक इलास्टिक बैंड बांध देते हैं। इससे उस जगह से खून का प्रवाह रुक जाने के कारण नसें उभर आती हैं। इसके बाद उस जगह से नस में से खून का सैंपल ले लेते हैं। 

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हालांकि इस टेस्ट में वैसे तो कोई खास जोखिम नहीं है लेकिन फिर भी निम्नलिखित में से कोई भी समस्या हो सकती है: 

इस जांच के लिए सुई से खून का सैंपल लिया जाता है जिसके कारण सुई धंसाने से मामूली छेद हो जाता है। उस जगह पर संक्रमण होने की भी थोड़ी सी गुंजाइश होती है। संक्रमण से बचने के लिए उस जगह को साफ और सूखा रखें।

इस टेस्ट के दौरान हल्की सी संभावना इस बात की भी होती है कि खून निकाले जाने के समय आपको सिर में  हल्कापन महसूस हो, चक्कर या मूर्छा आ जाए। अगर टेस्ट के बाद आपको चक्कर आने जैसी कोई समस्या महसूस हो रही है तो अपने डॉक्टर से बताएं। 

हर व्यक्ति की नसें अलग-अलग साइज की होती हैं जिसके कारण कुछ लोगों की नस से बहुत जल्द खून का सैंपल मिल जाता है जबकि कुछ लोगों की नसें जल्दी नहीं मिल पातीं। डॉक्टरों को खून का सैपल लेने के लिए उनकी नसें जल्द नहीं मिल पाती हैं। जिसके कारण डॉक्टर बार-बार अलग-अलग जगहों पर सुई चुभोते हैं जिससे दर्द होता है। अगर आपके हाथ की नस जल्द नहीं मिल पातीं है तो ऐसा करने के कारण आपको भी थोड़ी सी समस्या और तकलीफ हो सकती है। इस दौरान आपको दर्द हो सकता है। हालांकि ऐसा किसी-किसी के साथ ही होता है, सबके साथ नहीं होता है।

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इस टेस्ट के रिजल्ट के लिए आपका शारीरिक परीक्षण, अन्य टेस्ट और आपके बीमारियों के लक्षणों के आधार पर डॉक्टर को अंतिम रिजल्ट तैयार करने में बहुत मदद मिलती है। इससे यह पता चल सकता है कि आपका रूमेटाइड अर्थराइटिस कितना गंभीर है। 

ध्यान रखने वाली बात यह है कि कई बार रूमेटाइड फैक्टर स्वस्थ व्यक्तियों में भी पाया जाता है। यहां तक कि यह लूपस और स्जोग्रेन सिंड्रोम जैसी बीमारियों के पीड़ितों में भी पाया जाता है। यहां तक कि क्रोनिक इन्फेक्शन से ग्रसित व्यक्तियों में भी यह समस्या देखी जाती है।

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References

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