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कार्डियोवस्कुलर डिजीज यानी हृदय रोग से बचाव के लिए विशेषज्ञ ओमेगा-3 फैटी एसिड सप्लीमेंट की सलाह देते हैं। कई अध्ययनों के जरिए शोधकर्ताओं ने इसके सकारात्मक प्रभाव का जिक्र भी किया है। लेकिन एक नई रिसर्च में वैज्ञानिकों ने ओमेगा-3 सप्लीमेंट को कम प्रभावशाली बताया है। शोधकर्ताओं का कहना है कि ओवरऑल हार्ट हेल्थ के लिए इस सप्लीमेंट का कोई खास प्रभाव देखने को नहीं मिला है। रिसर्च में बताया गया है कि ओमेगा-3 सप्लीमेंट हाल में दिल का दौरा झेल चुके बुजुर्गों में भविष्य में हृदय संबंधी घटनाओं को रोकने में अप्रभावी साबित हुआ है।

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दरअसल वैज्ञानिकों ने जब प्लेसबो से ओमेगा-3 फैटी एसिड सप्लीमेंट की तुलना की तो पाया कि स्टैटिन थेरेपी और ब्लड थिनर के अतिरिक्त हृदय संबंधी घटनाओं की संख्या में कमी नहीं आई। यह रिसर्च नॉर्वे में की गई थी, जिसमें 1,000 से अधिक रोगियों को शाामिल किया गया। रिपोर्ट के अनुसार ओमेगा-3 सप्लीमेंट की प्रतिदिन खुराक लेने से हृदय संबंधी घटनाओं का जोखिम कम नहीं हुआ, जिसमें दूसरा हार्ट अटैक, स्ट्रोक, बाईपास सर्जरी या मृत्यु की घटनाएं शामिल हैं। इसमें बुजुर्गों से जुड़ी हाल की कुछ घटनाएं हैं जो हार्ट अटैक के बाद जीवित बचे थे।

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हृदय रोग की घटनाओं को रोकने में ओमेगा-3 कम प्रभावी  
इस रिसर्च को अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के साइंटिफिक सेशन 2020 में पेश किया गया था। वहीं, इस रिसर्च को अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन की पत्रिका "सर्कुलेशन" में प्रकाशित किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक ओएमईएमआई ट्रायल (मायोकार्डिअल इन्फ्रक्शन के साथ बुजुर्ग रोगियों में ओमेगा-3 फैटी एसिड) को यूरोपीयन देश नॉर्वे में आयोजित किया गया था। इस दौरान शोधकर्ताओं ने जांच की थी कि क्या बुजुर्गों में हार्ट अटैक आने के बाद स्टेंडर्ड ट्रीटमेंट (मानक उपचार) के तौर पर ओमेगा-3 सप्लीमेंट (1.8 ग्राम) असरदार साबित हो सकती है। साथ ही क्या ओमेगा-3 के जरिए भविष्य में होने वाली हृदय संबंधी घटनाओं को रोका जा सकता है।

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रिसर्च के प्रिसिंपल इंवेस्टिगेटर और नॉर्वे के ओस्लो यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल में सेंटर फॉर क्लीनिकल रिसर्च के एक शोधकर्ता एमडी अरे ए. कल्स्टैड का कहना है "यह रिसर्च विशेष रूप से कमजोर रोगी समूह पर केंद्रित है। इस मामले में हाल ही में हृदय रोग से जुड़े बुजुर्ग रोगियों को देखा गया जिसमें रिस्क फैक्टर का भार अधिक था। सच यह है कि इस ग्रुप में शामिल लोगों में ओमेगा-3 दवा का कोई खास प्रभाव देखने को नहीं मिला।"

कैसे की गई थी रिसर्च?
इस रिसर्च के तहत शोधकर्ताओं ने एक हजार से अधिक रोगियों (29 प्रतिशत महिलाएं) को शामिल किया था, जिनकी उम्र 70 से 82 साल थी। रिपोर्ट के मुताबिक इन सभी लोगों को पिछले दो महीनों के भीतर हार्ट अटैक के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया था। हालांकि, अधिकांश लोग (97%) कोलेस्ट्रॉल कम करने वाली दवाएं (स्टैटिन) ले रहे थे। इसके अलावा ज्यादातर लोग (86%) खून को पतला करने वाली दो दवाएं भी ले रहे थे। रिसर्च के जरिए शोधकर्ताओं ने आधे लोगों को रैंडम्ली प्रतिदिन एक ओमेगा-3 सप्लीमेंट लेने के लिए चुना, जबकि बाकी लोगों को एक प्लेसबो कैप्सूल (कॉर्न ऑयल) दिया गया था।

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दो सालों के फॉलोअप के बाद शोधकर्ताओं ने दोनों समूहों में हृदय संबंधी घटनाओं जैसे कि स्ट्रोक, रीवस्कुलेराइजेशन (बाईपास सर्जरी या एंजियोप्लास्टी), हार्ट फेल या मृत्यु के लिए अस्पताल में भर्ती होने की घटनाओं का विश्लेषण किया। डेटा से पता चलता है कि दोनों समूहों के बीच हृदय की घटनाओं की दर में कोई अंतर (दोनों समूहों के लिए लगभग 20%) नहीं था।

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