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इंसान की जिंदगी में रिश्तों से लेकर उम्र तक में कई पड़ाव आते हैं। बचपन, जवानी और फिर बुढ़ापा आना स्वाभाविक है। इसको इस तरह से भी समझा जा सकता है  कि अगर किसी का जन्म इस धरती पर हुआ है तो उसके जीवन में एक निर्धारित समय के बाद बुढ़ापा आना निश्चित है और इस सत्य को बदला या नकारा नहीं जा सकता है।

उम्र के हर पड़ाव के आने से पहले शरीर में कुछ बदलाव आते हैं और आज इस लेख के जरिए हम आपको बुढ़ापा लाने वाले अलग-अलग कारकों के बारे में बताने जा रहे हैं।

आमतौर पर 60 साल की उम्र के बाद वृद्धावस्था मानी जाती है लेकिन अगर इस उम्र तक आते-आते कोई व्यक्ति फिट भी है और रोग रहित भी, तो क्या वह व्यक्ति बुजुर्ग है। यह अहम सवाल है। मगर इन सवालों की उलझनों को दूर कर शोधकर्ताओं ने ऐसे चार चरण तलाशे हैं जो यह बताते हैं कि जनाब आप बूढ़े हो चुके हैं।

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कैसे की गई रिसर्च?

नेचर मेडिसिन में प्रकाशित ताजा रिपोर्ट के मुताबिक स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के मेडिकल स्कूल के शोधकर्ताओं ने इंसान की उम्र बढ़ने के साथ बुढापा आने के चार वर्गों का विश्लेषण किया है जिसमें मेटाबोलिक, इम्यून, लिवर और किडनी की कार्यक्षमता शामिल है।

शोधकर्ताओं का यह विश्लेषणात्मक (analysis) अध्ययन दो से तीन सालों तक चला, जिसमें 34 से लेकर 68 साल के 43 स्वस्थ लोगों को शामिल किया गया था। इस दौरान शोधकर्ताओं ने इन लोगों में पहचाने गए जीवाणु और जैविक अणुओं का मूल्यांकन किया।

बुढ़ापे के लिए इन चीजों को बनाया आधार

प्रोटीन, मेटाबोलाइट (पाचन या शरीर की अन्य रसायनिक प्रक्रिया के दौरान बनने वाला पदार्थ) और लिपिड (फैट) की जांच करने के बाद शोधकर्ताओं ने एजिंग (उम्र बढ़ने की प्रक्रिया) के चार प्रकार बताए। इसका पहला प्रकार मेटाबोलिक यानी चयापचय है जिसका संबंध चयापचय से जुड़े विकारों से है।

दूसरा प्रकार प्रतिरक्षा तंत्र है। तीसरा लीवर और चौथा मुख्य रूप से गुर्दे यानी किडनी की समस्या से जुड़ा है।

इस रिसर्च के प्रमुख शोधकर्ता प्रोफेसर सनाइडर और उनके सहकर्मियों के मुताबिक मेटाबॉलिक एजिंग (उम्र के साथ पाचन कमजोर होना) वाले लोगों में डायबिटीज जैसी बढ़ती रहने वाली बीमारियों की आशंका ज्यादा रहती है। उम्र बढ़ने पर इन लोगों का हीमोग्लोबिन ए1सी का लेवल भी बढ़ सकता है। हीमोग्लोबिन ए1सी ब्लड शुगर लेवल को मापता है।

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एक नहीं, कई तरह से बूढ़ा होता है शरीर

शोधकर्ताओं की टीम ने यह भी पाया कि इंसान में एक तरह से नहीं बल्कि दो या इससे ज्यादा तरह से एजिंग होती है। इस प्रकार बूढ़ा होने पर व्यक्ति में एक साथ ही कई विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम रहता है।

एजिंग के प्रकारों के अलावा अध्ययनकर्ताओं की टीम ने लोगों में उम्र बढ़ने की दर में भी अंतर पाया। शोधकर्ताओं का कहना है कि इस रिसर्च के परिणाम से लोगों को स्वस्थ जीवन जीने और जीवन पर अधिक नियंत्रण पाने में मदद मिलेगी।

क्या सच में बढ़ती उम्र को रोकना संभव है

प्रोफेसर सनाइडर और उनकी टीम ने अन्य कारकों पर भी ध्यान दिया जो एजिंग की प्रक्रिया को अलग तरह से प्रभावित करते हैं। इसका मतलब है कि इंसुलिन के प्रति संवेदनशील स्वस्थ व्यक्तियों में एजिंग की तुलना उन लोगों से की गई जिनमें इंसुलिन प्रतिरोध था साथ ही उनका शरीर प्रभावी ढंग से ब्लड शुगर नहीं बना पा रहा था।

शोधकर्ताओं ने पाया कि उम्र बढ़ने पर इंसुलिन के प्रति संवेदनशील और इंसुलिन प्रतिरोध वाले लोगों में लगभग 10 अणुओं में महत्वपूर्ण भिन्नता थी। इनमें से कई अणु प्रतिरक्षा प्रणाली के कार्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

कुल मिलाकर देखा जाए तो शोधकर्ताओं की टीम ने पाया कि करीब ऐसे 10 अणु थे, जो वृद्धावस्था में इंसुलिन संवेदनशील और इंसुलिन प्रतिरोधी वाले लोगों में काफी अलग थे। इन अणुओं में से कुछ अणुओं ने लोगों के इम्यूनिटी सिस्टम को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई।

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कुछ प्रतिभागियों में हीमोग्लोबिन ए1सी और क्रिएटिन के स्तर में बदलाव को एजिंग के लिए जिम्मेदार पाया गया। इसकी वजह से किडनी की कार्यक्षमता धीमी हो जाती है। वहीं कुछ लोगों में जीवनशैली में बदलाव करने के बाद भी अध्ययन के दौरान कोई सुधार नहीं देखा गया। 

इस रिसर्च से पता चलता है कि हमारा शरीर सिर्फ एक तरह से बूढ़ा नहीं होता है बल्कि कई कारक मिलकर उसे कमजोर और बूढ़ा बनाते हैं।

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