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जैसे-जैसे दुनियाभर में मोटापे की समस्या बढ़ रही है, लोगों के बीच नए-नए तरह के डाइटिंग से जुड़े ट्रेंड भी देखने को मिल रहे हैं। इन्हीं में से एक है इंटरमिटेंट फास्टिंग। पिछले एक दशक में, इंटरमिटेंट फास्टिंग (निश्चित समय पर भोजन करना या फिर रुक-रुक कर उपवास रखना) दुनियाभर में सबसे बड़े डाइट ट्रेंड के रूप में सामने आया है। इस डाइट ट्रेंड के विभिन्न लाभों पर अब तक कई अध्ययन किए गए हैं जिसमें- वजन घटाने के लिए मेटाबॉलिक स्विचिंग, इसे मेडिटेरेनियन डाइट के साथ जोड़कर हृदय की सेहत में सुधार, और वेट लॉस में मददगार जैसी चीजें शामिल हैं।

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कई सिलेब्स भी इंटरमिटेंट फास्टिंग को अपना चुके हैं
एक्सपर्ट्स ने इंटरमिटेंट फास्टिंग या आईएफ के कई फायदों को प्रमोट किया है और हॉलिवुड सिलेब्रिटी ह्यू जैकमेन से लेकर बॉलिवुड सिलेब्रिटी मलाइका अरोड़ा तक ने इंटरमिटेंट फास्टिंग को ट्राई करने और अपनाने की बात कही। आईएफ की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए, एक नया अध्ययन जो कहता है कि यह डाइट ट्रेंड काम नहीं करता, कई लोगों के लिए एक झटके की तरह हो सकता है। 

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जामा इंटरनल मेडिसिन में प्रकाशित हुई स्टडी
हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ ईथन वीस की अध्यक्षता में इस स्टडी को कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, सैन फ्रांसिस्को के शोधकर्ताओं ने संपन्न किया। डॉ वीस का कहना है कि उन्होंने इंटरमिटेंट फास्टिंग को अपने ऊपर ट्राई किया और इसे फायदेमंद नहीं पाया। इस स्टडी को हाल ही में जामा (jama) इंटरनल मेडिसिन नाम के जर्नल में प्रकाशित किया गया है। स्टडी का उद्देश्य अधिक वजन और मोटापे से ग्रस्त रोगियों में वजन घटाने और मेटाबॉलिक हेल्थ पर समय-प्रतिबंधित खाने के प्रभाव को निर्धारित करना है। इस स्टडी में जो दावे किए गए हैं उसके बारे में हम आपको यहां बता रहे हैं:

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इंटरमिटेंट फास्टिंग के साइड इफेक्ट्स पर एक नजर
इंटरमिटेंट फास्टिंग या आईएफ को लेकर बेशक अब तक कई अध्ययन हुए हैं और विशेष रूप से इसके समय-प्रतिबंधित भोजन करने (टाइम रिसट्रिक्टेड ईटिंग TRE) के उपप्रकार के बारे में जो कहते हैं कि आप अपने भोजन करने के समय को दिन में 8-12 घंटे तक सीमित करें और बाकी के 12 से 16 घंटों के लिए उपवास करें। इनमें से कई अध्ययनों में आईएफ के फायदे और साइड इफेक्ट्स दोनों का विश्लेषण किया गया है।

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साल 2017 में बिहेवियरल साइंसेज के एक अध्ययन ने संकेत दिया कि भले ही इंटरमिटेंट फास्टिंग ने वजन घटाने में मदद की हो, वसा ऊत्तकों और आंत में जमा फैट के भंडार को कम किया हो, इंसुलिन संवेदनशीलता में सुधार किया हो और मोटापे से जूझ रहे लोगों और अधिक वजन वाले लोगों में आश्चर्यजनक रूप से फायदा देखने को मिला हो, लेकिन इस डाइट ट्रेंड के कारण अनियमित या अस्थिर खाने के पैटर्न, ज्यादा खाने और मूड में कमी जैसी समस्याएं भी देखने को मिलीं।

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आईएफ बाइंज ईटिंग को बढ़ावा देता है
करंट ओबेसिटी रिपोर्ट्स नाम के जर्नल में साल 2019 में प्रकाशित एक अध्ययन में इसी तरह की रिपोर्ट सामने आयी जिसमें कहा गया कि आईएफ उम्र बढ़ने यानी एजिंग की समस्या को कम कर सकता है, हृदय और संज्ञानात्मक स्वास्थ्य में सुधार कर सकता है, लेकिन साथ ही साथ यह हाइपरफैजिया (बहुत ज्यादा भोजन करने), बाइंज ईटिंग व्यवहार, ऊर्जा की कमी, मूड में कमी और लंबे समय तक इस ट्रेंड को फॉलो करने में कमी जैसी समस्याएं देखने को मिलीं।

पहले के सभी अध्ययनों ने आईएफ के वेट लॉस पॉइंट पर सहमति जतायी
इंटरमिटेंट फास्टिंग या आईएफ का पालन करने से कई तरह की अनहेल्दी प्रैक्टिस की समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं और इस डाइट को लंबे समय तक जारी नहीं रखा जा सकता- इस तरह का सुझाव देने के बावजूद इन अध्ययनों में से किसी ने भी यह दावा नहीं किया कि आईएफ डाइट ट्रेंड काम नहीं करता है या यह वजन घटाने में मददगार नहीं है। इससे पहले जितनी भी स्टडीज हुई इन सभी एक बात पर सहमति जताई और वो ये थी कि इंटरमिटेंट फास्टिंग वजन कम करने में मदद करता है। लेकिन जामा में प्रकाशित इस नई  स्टडी का यही सबसे बड़ा बिंदू है जिसमें यह दावा किया गया है कि इंटरमिटेंट फास्टिंग वेट लॉस में मदद नहीं करता।

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जामा में प्रकाशित आईएफ से जुड़ी नई स्टडी क्या कहती है?
इस नए अध्ययन के पीछे शोधकर्ताओं ने जो पहला बिंदु सामने रखा है वो है- ह्यूमन क्लिनिकल ट्रायल जिसमें इंटरमिटेंट फास्टिंग के फायदे और दुष्प्रभाव का विश्लेषण किया गया है, वे सभी या तो गैर-मौजूद हैं या अध्ययन बेहद छोटा है यानि कम लोगों को शामिल किया गया है। आईएफ से जुड़े अधिकांश अध्ययन जानवरों पर आधारित हैं, विशेष रूप से चूहों पर। 

इससे पहले हुए ज्यादातर अध्ययन पशुओं पर आधारित थे
यहां तक ​​कि ऊपर जिन दो अध्ययनों का उल्लेख किया गया है वे भी आईएफ पर पहले से प्रकाशित पशु अध्ययनों के मेटा-विश्लेषण ही थे। इससे यह संकेत मिलता है कि जहां आईएफ का संबंध है, मानव विषयों पर वास्तविक, बड़े पैमाने पर डेटा का अभाव रहा है, जब तक कि यह नया अध्ययन सामने नहीं आया। इस अध्ययन में यूरेका रिसर्च प्लेटफॉर्म के माध्यम से 2018 और 2019 के बीच भर्ती हुए 116 प्रतिभागियों को शामिल किया गया और उन्हें 2 रैन्डमाइज्ड समूहों में विभाजित किया गया। अक्टूबर 2019 तक एक स्टडी ऐप के जरिए इन लोगों से डेटा एकत्र किया गया।

116 प्रतिभागियों को 2 ग्रुप्स में बांटा गया
एक ग्रुप को कंसिस्टेंट मील टाइमिंग (सीएमटी या सुसंगत-भोजन समय) ग्रुप नाम दिया गया और इन लोगों को भोजन के बीच में स्नैकिंग की अनुमति के साथ 1 दिन में तीन बार भोजन खाने के लिए कहा गया था। वहीं दूसरे समूह को टाइम रिस्ट्रिक्टेड मील (टीआरई यानी समय-प्रतिबंधित खाना) नाम दिया गया और उन्हें निर्देश दिया गया कि वे दोपहर 12 बजे से रात 8 बजे के बीच जब भी और जितना भी चाहें खा सकते हैं लेकिन फिर रात 8 बजे से दोपहर 12 बजे के बीच कैलोरी का सेवन पूरी तरह से बंद कर देना था।

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12 सप्ताह के बाद, दोनों समूहों ने बेसलाइन से कुछ वजन कम जरूर किया, समय-सीमा वाले आहार ग्रुप (टीआरई) ने लगभग 2.07 पाउंड (938 ग्राम) और सुसंगत भोजन समूह (सीएमटी) ने 1.5 पाउंड यानी 680 ग्राम। शोधकर्ताओं ने दोनों समूहों के बीच वजन के अंतर को बहुत महत्वपूर्ण नहीं माना। TRE समूह में स्केलेटल मसल मास यानी कंकाल की मांसपेशी द्रव्यमान में कमी देखने को मिली जिसके कारण शरीर के निचले अंगों में स्केलेटल स्ट्रेंथ (कंकाल की ताकत) में भी कमी आयी।

आईएफ के सेहत से जुड़े फायदे कम और नुकसान ज्यादा
इस अध्ययन के निष्कर्षों से पता चलता है कि जब TRE डाइट की तुलना CMT डाइट से की जाती है, तो यहां पर बहुत अधिक वजन कम नहीं होता है क्योंकि TRE समूह द्वारा खोए गए वजन का एक बड़ा हिस्सा मांसपेशियों का था फैट का नहीं। इसके अलावा जब बात वसा द्रव्यमान, इंसुलिन संवेदनशीलता, ग्लूकोज स्तर या लिपिड प्रोफाइल में अंतर की आती है तो दोनों समूहों के बीच कोई महत्वपूर्ण अंतर नहीं था, यह दर्शाता है कि TRE या इंटरमिटेंट फास्टिंग से जुड़ा कोई अतिरिक्त स्वास्थ्य लाभ नहीं है।

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मांसपेशियों में कमी के कारण कमजोरी, विकलांगता का खतरा
वास्तव में, जैसा कि अध्ययन ने बताया है TRE प्रोटोकॉल का पालन करने वालों में मांसपेशियों के स्तर में कमी आ जाती है और इसके कारण संभवतः कमजोरी, विकलांगता, जीवन की गुणवत्ता में कमी और यहां तक ​​कि सार्कोपिनिया या तेजी से मांसपेशियों की हानि जैसी समस्याएं देखने को मिल सकती हैं। यहां पर शोधकर्ताओं की दलील ये है कि, टीआरई प्रोटोकॉल के दौरान मांसपेशियों के नुकसान की मात्रा सकारात्मक रूप से वेट रीगेन या दोबारा वजन बढ़ने से संबंधित थी।

इंटरमिटेंट फास्टिंग डाइट के दौरान प्रतिबंधित भोजन यह भी सुझाव देता है कि इस दौरान व्यक्ति प्रोटीन का कम सेवन करता है, जो भविष्य में हानिकारक साबित हो सकता है। इसका मतलब यह है कि जो प्रतिभागी इंटरमिटेंट फास्टिंग और विशेष रूप से टीआरई के माध्यम से अपना वजन कम करते हैं, वे जब इस डाइट को फॉलो करना बंद कर देते हैं तो न सिर्फ उनका वजन दोबारा बढ़ जाता है बल्कि उनकी समग्र सेहत पर भी इसका बुरा असर पड़ता है, विशेष रूप से मांसपेशियों और कंकाल की सेहत पर।

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