स्मोकिंग करने वाले लोगों में ई-सिगरेट पीने का चलन बढ़ रहा है। इसे सिगरेट पीने वाले लोगों की स्मोकिंग के प्रति झुकाव में कमी करने के योगदान के रूप में देखा जा रहा है। न्यूजीलैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ ओटागो में हुए अध्ययन के मुताबिक, धूम्रपान करने वाले लोग अपनी इस लत को छोड़ने के प्रयास के तहत ई-सिगरेट पहले से ज्यादा आजमाने लगे हैं। हालांकि इसके अन्य कारण भी सामने आए हैं। शोधकर्ताओं ने बताया है कि 2016 से 2018 के बीच लोगों में धूम्रपान को लेकर जागरूकता तो बढ़ी ही, साथ ही ई-सिगरेट का इस्तेमाल भी पहले से ज्यादा होने लगा। न्यूजीलैंड के वेलिंग्टन शहर में हुई इस स्टडी के प्रमुख शोधकर्ता और यूनिवर्सिटी के पब्लिक हेल्थ डिपार्टमेंट के प्रोफेसर रिचर्ड एडवर्ड्स ने बताया कि इन दो सालों की अवधि के दौरान 18 से 24 वर्ष की आयु के लोगों में ई-सिगरेट का इस्तेमाल सबसे ज्यादा कॉमन पाया गया। वहीं, जिन लोगों (सभी आयु वर्ग) ने हाल में स्मोकिंग करना छोड़ा है, उनमें भी ई-सिगरेट का चलन बढ़ा है।

खबर के मुताबिक, यह अध्ययन न्यूजीलैंड में तंबाकू आधारित उत्पादों के नियंत्रण को लेकर शुरू किए गए एक प्रोजेक्ट का हिस्सा है। इसके लिए 2016 से 2017 के बीच 1,155 और 2018 में 1,020 ऐसे लोगों का सर्वे किया गया था, जिन्हें धूम्रपान करने की आदत थी या हाल में जिन्होंने इस आदत को छोड़ दिया था। अध्ययन के लिए न्यूजीलैंड में राष्ट्रीय स्तर पर हुए हेल्थ सर्वे से प्रतिभागियों का नामांकन किया गया। उनसे पूछा गया कि ई-सिगरेट को लेकर उन्हें कितनी जानकारी है, वे इसका इस्तेमाल क्यों कर रहे हैं और इसके क्या फायदे हैं।

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इसमें 2018 में हुए सर्वे के परिणामों से पता चला कि लोगों में वैपिंग डिवाइसेज यानी ई-सिगरेट को लेकर जागरूकता काफी ज्यादा है। अध्ययनकर्ताओं की मानें तो सर्वे में 98 प्रतिशत प्रतिभागियों (स्मोकिंग करने वाले और छोड़ने वाले दोनों) ने कहा कि वे ई-सिगरेट के बारे में जानते हैं। वहीं, 77 प्रतिशत प्रतिभागियों के मुताबिक, उन्होंने यह वैपिंग डिवाइस इस्तेमाल करने की कोशिश की है और 22 प्रतिशत ने बताया कि वे (अध्ययन के समय) महीने में एकाध बार ई-सिगरेट का इस्तेमाल कर रहे थे। 11 प्रतिशत दैनिक रूप से ऐसा कर रहे थे। परिणामों पर बात करते हुए प्रोफेसर एडवर्ड्स ने कहा कि हाल में स्मोकिंग छोड़ने वाले लोगों (23 प्रतिशत) में ई-सिगरेट का चलन सबसे ज्यादा पाया गया है। वे रोजाना इस वैपिंग डिवाइस का इस्तेमाल कर रहे थे, जबकि उस समय धूम्रपान करने वालों की दर आठ प्रतिशत थी।

सर्वे में शामिल प्रतिभागियों में से 78 प्रतिशत ने कहा कि वे धूम्रपान करने की लत से छुटकारा पाने के लिए ई-सिगरेट की मदद ले रहे हैं। वहीं, 81 ने माना कि वे स्मोकिंग की आदत को कम करने की कोशिश में ऐसा कर रहे हैं। इस पर प्रोफेसर एडवर्ड्स ने कहा कि ये परिणाम स्मोकिंग की आदत छुड़ाने के मामले में ई-सिगरेट पर भरोसा जगाने वाले हैं, क्योंकि सिगरेट छोड़ने वाले ज्यादातर प्रतिभागी इसी की मदद ले रहे हैं और दैनिक रूप से धूम्रपान करने वाले लोग भी इससे निजात पाने के लिए ई-सिगरेट का सहारा लेने लगे हैं। इस पर प्रोफेसर ने कहा, 'इससे पता चलता है कि धूम्रपान के प्रसार को कम करने में में ई-सिगरेट योगदान दे रही हैं और 2025 तक आयोतेयारोया (न्यूजीलैंड के कबीलाई लोग माओरी इस देश को इसी नाम से बुलाते हैं) को धूम्रपान मुक्त करने के उद्देश्य को पूरा करने में मदद कर रही है।'

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हालांकि यह राह इतनी आसान नहीं है। दरअसल, अध्ययन में यह तो पता चला कि लोगों में स्मोकिंग छोड़ने के लिए ई-सिगरेट का चलन बढ़ा है, लेकिन कइयों ने यह भी बताया कि उन्होंने केवल प्रयोग के तहत ऐसा किया। वे नियमित रूप से ऐसा नहीं कर रहे, जिससे यह संकेत मिलता है कि सभी को धूम्रपान से मुक्त कराने में कुछ अवरोधकों का सामना करना पड़ सकता है। इस बारे में बात करते हुए प्रोफेसर एडवर्ड ने कहा, 'सबसे आम संभावित बाधाएं ये हैं कि ज्यादातर (68 प्रतिशत) प्रतिभागी सोचते हैं कि वैपिंग से उन्हें स्मोकिंग के मुकाबले कम संतुष्टि मिल रही है। एक और मुश्किल लोगों की गलत जानकारी हो सकती है। 39 प्रतिशत प्रतिभागियों का यह मानना था कि ई-सिगरेट स्मोकिंग जितनी या उससे ज्यादा नुकसानदेह है, जबकि 15 प्रतिशत इसे लेकर आश्वस्त नहीं थे।'

प्रोफेसर ने कहा कि यह स्मोकिंग को लेकर पब्लिक एजुकेशन के महत्व को रेखांकित करता है। इसके अलावा सिगरेट छोड़ने की प्रेरणा आर्थिक कारणों से भी जुड़ी पाई गई। सर्वे में शामिल कई स्मोकर्स ने बताया कि उन्होंने सिगरेट पीने में होने वाले खर्च के मद्देनजर ई-सिगरेट को बतौर विकल्प चुना। यानी उनका सिगरेट छोड़ कर वैपिंग डिवाइस का सहारा लेना इच्छा नहीं, बल्कि आर्थिक मजबूरी थी। ऐसे में अध्ययन से जुड़े शोधकर्ताओं ने माना कि हालांकि सिगरेट की लत छुड़ाने में ई-सिगरेट योगदान दे रही है, लेकिन लोगों को स्मोक-फ्री करने के लिए अभी काफी कुछ किए जाने की जरूरत है। चलते-चलते बता दें कि यह अध्ययन इंटरनेशनल जर्नल ऑफ एनवायरन्मेंटल रिसर्च एंड पब्लिक हेल्थ में प्रकाशित हुआ है।

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