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मातृत्व के इस नए सफर में आपका स्वागत है। अब तक आपने अपने शिशु की पहली बार रोने की आवाज सुन ली होगी, उसके साथ स्किन-टू-स्किन कॉन्टैक्ट भी कर लिया होगा और शिशु के जन्म के पहले घंटे में आपको अपने अंदर कई सारी भावनाएं एक साथ महसूस हो रही होंगी। हमें पता है कि अब आपका पूरा ध्यान और फोकस अपने नवजात शिशु पर रहेगा लेकिन ये भी जरूर याद रखें कि प्रसव के बाद नई मां का ध्यान रखना भी उतना ही जरूरी है जितना कि शिशु का।

प्रसव यानी डिलिवरी के बाद नई मां का ध्यान रखना उतना ही जरूरी है जितना प्रसव से पहले प्रेगनेंसी के दौरान। शिशु के जन्म के बाद तो नई मां का ध्यान रखना और भी ज्यादा जरूरी हो जाता है क्योंकि मातृत्व के नई सफर में कदम रखने का मतलब है कि महिला के शरीर में शारीरिक और भावनात्मक रूप से कई तरह के बदलाव होते हैं जिसका सीधा असर महिला की सेहत पर पड़ता है। प्रसव के बाद (पोस्टनेटल) नई मां की देखभाल की शुरुआत डिलिवरी के ठीक बाद अस्पताल से ही शुरू हो जानी चाहिए और देखभाल की यह प्रक्रिया करीब 6 से 8 हफ्ते तक जारी रहनी चाहिए।

नई मां होने के नाते इस दौरान आपको अपनी ताकत का पुनर्निमाण करना होगा और साथ ही इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि आपका पार्टनर या जीवनसाथी नवजात शिशु का ख्याल कैसे रखना है, इसे भी अच्छी तरह से सीख लें। आपने अपने नवजात शिशु को कैसे जन्म दिया है- सिजेरियन डिलिवरी के जरिए या फिर नॉर्मल वजाइनल डिलिवरी के जरिए- इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता। प्रसव के बाद वाले इस समय में आपको 2 महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर फोकस करने की जरूरत है:

प्रसव के बाद के समय में नई मां करें आराम:
नए पैरंट होने का मतलब है कि आपको अपने शिशु की शारीरिक घड़ी के हिसाब से खुद को अडजस्ट करना पड़ता है। अगर शिशु रो रहा हो तो उसे चुप कराना पड़ता है, उसका पेट भरने के लिए दूध पिलाना होता है, हर 2 से 3 घंटे में शिशु का डायपर बदलना पड़ता है। जन्म के पहले पहले महीने में आमतौर पर ज्यादातर शिशु 16 से 18 घंटे तक सोते हैं लेकिन इस दौरान शिशु 8 से 10 बार दूध पीने के लिए जागते भी हैं। ऐसे में इस दौरान अपनी नींद पूरी करने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि जब आपका शिशु सो रहा हो आप भी सोकर अपनी नींद पूरी कर लें। हालांकि यह पर्याप्त नहीं होगा क्योंकि वयस्कों को सामान्य तरीके से कार्य करने के लिए रोजाना रात में 7 से 8 घंटे की नींद की जरूरत होती है।

साथ में आपको शिशु की देखभाल से जुड़े कई अतिरिक्त काम भी होते हैं- शिशु का ध्यान रखना, उसे दूध पिलाना, डकार दिलवाना, शिशु की सफाई करना, डायपर बदलना आदि। ऐसे में प्रसव के बाद हर वक्त थकान महसूस करना भी बेहद सामान्य सी बात है। याद रखें कि इस दौरान आपके शरीर ने काफी कुछ झेला है- आपको प्रसव की तकलीफ से भी उबरना है। इतना ही नहीं प्रसव के बाद होने वाले हार्मोनल असंतुलन की वजह से आपको उदासीनता और मूड स्विंग भी हो सकता है।

प्रसव के बाद नई मां को पोषण की जरूरत:
शिशु के जन्म के तुरंत बाद आपको अपना वजन घटाने की चिंता करने की जरूरत नहीं क्योंकि इस दौरान आपका मुख्य लक्ष्य यह होना चाहिए कि आप खुद को स्वस्थ कैसे बनाए रखेंगी। आमतौर पर तो यही होता है कि प्रसव प्रक्रिया के दौरान प्राकृतिक रूप से महिला का वजन कुछ कम हो जाता है। लेकिन अगर ऐसा नहीं होता तो आप डिलिवरी के 8 सप्ताह बाद स्वस्थ तरीके से पोस्टपार्टम वेट लॉस प्रोग्राम शुरू कर सकती हैं। इस दौरान, आपको अपना पूरा फोकस पोषण प्राप्त करने में करना चाहिए ताकि आपके शरीर की ऊर्जा का लेवल बना रहे क्योंकि आपको अपने नवजात शिशु की देखभाल जो करनी है।

  1. प्रसव के बाद आराम करने का महत्व
  2. नई मां के लिए पोषण और प्रसव के बाद डाइट
  3. नॉर्मल वजाइनल डिलिवरी के बाद नई मां की देखभाल
  4. प्रसव के बाद ब्रेस्ट में दर्द और सूजन
  5. प्रसव के बाद त्वचा और बालों में बदलाव
  6. प्रसव के बाद अवसाद और मू़ड में बदलाव
  7. प्रसव के बाद वजन कम करना
  8. सिजेरियन डिलिवरी होने पर प्रसव के बाद ऐसे रखें ध्यान
  9. प्रसव के बाद चेकअप क्यों जरूरी है?
  10. और आखिर में इन बातों का रखें ध्यान

प्रसव के बाद आराम करने का महत्व

रिसर्च में यह बात साबित हो चुकी है कि हमारा शरीर और मस्तिष्क सही तरीके से काम कर सके इसके लिए नींद अति आवश्यक है। प्रसव के तुरंत बाद आपकी नींद पूरी होना इन 2 वजहों से भी जरूरी है।

पहला- आपका शरीर प्रसव के दौरान काफी कुछ झेल चुका है। प्रेगनेंसी के बाद पीरियड्स आना, प्रसव के दौरान योनी में लगे टांके, दर्द और हार्मोनल असंतुलन- इन सबकी वजह से नई मां को हमेशा थकान और चिड़चिड़ापन महसूस होता रहता है। प्रसव के कुछ दिनों बाद आपकी मांसपेशियों में सूजन आ सकती है और कमजोरी महसूस हो सकती है और आपके गर्भाशय को वापस अंदर जाने और सामान्य होने में करीब 6 सप्ताह का समय लग सकता है। 

दूसरा- नई मां को नई जिम्मेदारियां भी उठानी पड़ती हैं जैसे- शिशु को ब्रेस्टफीडिंग करवाना, शिशु के गर्भनाल गांठ का ध्यान रखना, शिशु की साफ-सफाई करना, उसे सुलाना, रोने पर चुप कराना आदि और इन सारी चीजों की वजह से नई मां को हद से ज्यादा थकान महसूस होती रहती है।

ऐसे में इन टिप्स की मदद से आप आराम कर सकती हैं और प्रसव के बाद के समय (पोस्टनेटल पीरियड) में आराम करके रिकवर हो सकती हैं:

  • अपने नवजात शिशु को दूध पिलाने और अपना ध्यान रखने के अलावा आपको बाकी के कुछ काम अपने जीवनसाथी, भरोसेमंद नर्स, रिश्तेदार या दोस्तों को भी करने के लिए देने चाहिए। याद रखें कि अगर आप अपनी सेहत का ध्यान नहीं रखेंगी तो इसका सीधा असर आपके बच्चे पर पड़ेगा।
  • जब शिशु सोए तो आप भी सो जाइए भले ही यह नींद कुछ देर के लिए ही क्यों न हो। ये समय और घंटे जुड़ते जाएंगे और आपकी नींद पूरी हो जाएगी।
  • अपने शिशु को अपने नजदीक ही रखें लेकिन उसके साथ अपना बिस्तर शेयर न करें। शिशु के पालने को अपने पास ही रखें ताकि आपको बार-बार उठकर शिशु के पास जाने की जरूरत न पड़े और थकान कुछ कम हो, फिर चाहे दिन का समय हो या रात का।
  • आपके दोस्त और परिवार के सदस्य भले ही आपसे और नवजात शिशु से मिलने के लिए आते रहें लेकिन उनके आने की वजह से अपने रूटीन में बदलाव न करें। अगर यह शिशु के सोने या दूध पीने का समय हो तो रूटीन के हिसाब से वैसा ही करें।
  • रोजाना कम से कम एक बार घर से बाहर जरूर निकलें ताकि आपको ताजा हवा और सूरज की रोशनी मिल सके। अगर आपकी डॉक्टर आपको सलाह देती हैं तो आपको पोस्टपार्टम एक्सरसाइज भी कर सकती हैं।

नई मां के लिए पोषण और प्रसव के बाद डाइट

हमें उम्मीद है कि आपने प्रेगनेंसी के दौरान क्या खाना चाहिए और क्या नहीं खाना चाहिए इसका पूरा ध्यान रखा होगा। प्रेगनेंसी के 9 महीनों के दौरान आपका जो वजन बढ़ा है वह आपको प्रसव के बाद के समय में काम आएगा। लेकिन इस दौरान आपको संतुलित भोजन करने की जरूरत है जिसमें अनाज, कार्बोहाइड्रेट्स, फल और सब्जियां, डेयरी उत्पाद और प्रोटीन शामिल हो। अपनी डाइट में फाइबर से भरपूर चीजों को भी शामिल करें ताकि आपको प्रसव के बाद कब्ज जैसी दिक्कतें न हों।

इसके अलावा आपको नट्स और सीड्स के जरिए हेल्दी फैट भी मिल सकता है और शरीर में पानी की कमी न हो इसके लिए पानी और दूध भी पिएं। चूंकि आप शिशु को ब्रेस्टफीडिंग करवाती हैं इसलिए बेहद जरूरी है कि आपको प्रसव के बाद के समय में डिहाइड्रेशन (शरीर में पानी की कमी) की दिक्कत न हो। अगर आपके शरीर में विटामिन और मिनरल्स की कमी होगी तो डॉक्टर आपको सप्लिमेंट्स का सेवन करने की भी सलाह दे सकते हैं।

नॉर्मल वजाइनल डिलिवरी के बाद नई मां की देखभाल

अगर आपकी नॉर्मल वजाइनल डिलिवरी हुई है तो आपके लिए प्रसव के बाद अपना ध्यान रखना आसान होगा। इस दौरान बेहद जरूरी है कि आप जितना हो सके उतना आराम करें, पोषण युक्त आहार का सेवन करें उसके अलावा कुछ ऐसे जरूरी लक्षण हैं जिनका ध्यान रखना आवश्यक है। इन लक्षणों के बारे में जानें और इस तरह की समस्याओं में आराम कैसे मिलेगा इसके बारे में भी:

  1. नॉर्मल डिलिवरी के बाद योनि में दर्द
  2. नॉर्मल डिलिवरी के बाद योनि से स्त्राव
  3. नॉर्मल डिलिवरी के बाद दर्द और संकुचन
  4. नॉर्मल डिलिवरी के बाद यूरिन पर कंट्रोल न रहना
  5. नॉर्मल डिलिवरी के बाद बवासीर

नॉर्मल डिलिवरी के बाद योनि में दर्द

नॉर्मल डिलिवरी के दौरान अक्सर एपिसियोटोमी (वजाइनल टियर) योनि में टांके लगते हैं। ऐसे में अगर आपके साथ भी ऐसा हुआ हो तो अगले कुछ हफ्तों तक आपको वहां दर्द बना रहेगा। अगर टांका ज्यादा लंबा हो तो उसे भरने में ज्यादा समय लग सकता है। ऐसे में दर्द और तकलीफ को कुछ कम करने के लिए आप इन उपायों को आजमा सकती हैं-

  • अपने डॉक्टर से किसी दर्द-निवारक क्रीम या स्प्रे के बारे में पूछें जो पूरी तरह से सुरक्षित हो।
  • कब्ज की समस्या से बचने के लिए आपको लैक्सेटिव की भी जरूरत पड़ सकती है।
  • घाव की बर्फ से सिंकाई कर सकती हैं या फिर अपनी सुविधा के अनुसार आप ठंडे या गर्म पानी के टब में भी बैठ सकती हैं।
  • जब तक घाव भर नहीं जाता किसी सॉफ्ट तकिए या पैडेड रिंग पर बैठें ताकि घाव पर किसी तरह का प्रेशर न पड़े।
  • अगर असहनीय दर्द हो रहा हो तो तुरंत डॉक्टर से बात करें क्योंकि यह इंफेक्शन का संकेत हो सकता है।

नॉर्मल डिलिवरी के बाद योनि से स्त्राव

प्रेगनेंसी के दौरान आपके गर्भाशय में सतह पर एक बाहरी म्यूकस मेम्ब्रेन बनता है जो प्रसव के तुरंत बाद हटना शुरू हो जाता है। यही वजह है कि प्रसव के बाद योनि से स्त्राव (डिस्चार्ज) होना शुरू हो जाता है जिसमें मेम्ब्रेन के साथ ही खून भी होता है और यह कुछ दिनों या हफ्तों तक जारी रहता है। शुरुआत में यह स्त्राव लाल रंग और बहुत ज्यादा होता है लेकिन धीरे-धीरे वह पानी की तरह हो जाता है और उसका रंग भी गुलाबी या पीला हो जाता है। ऐसा होना सामान्य सी बात है और इस फ्लो से निपटने के लिए मार्केट में हेवी-ड्यूटी पोस्टनेटल सैनिटरी पैड्स आसानी से मिल जाते हैं। लेकिन अगर आपको हद से ज्यादा ब्लीडिंग हो रही हो और साथ में पेड़ू में दर्द और बुखार भी हो तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।

नॉर्मल डिलिवरी के बाद दर्द और संकुचन

प्रसव के बाद संकुचन और क्रैम्प्स महसूस करना बेहद सामान्य सी बात है। इसे आफ्टरेपन भी कहा जाता है। इन संकुचनों के माध्यम से शरीर रक्त वाहिकाओं को संकुचित करने की कोशिश करता है ताकि ब्लीडिंग को कम किया जा सके। खासकर ब्रेस्टफीडिंग के दौरान इस तरह का संकुचन महसूस होना या आफ्टरपेन होना सामान्य सी बात है क्योंकि ब्रेस्टफीडिंग के दौरान शरीर से ऑक्सिटोसिन रिलीज होता है और यह एक नैचरल प्रक्रिया है। लेकिन अगर दर्द बहुत ज्यादा हो रहा हो और आप उसे बर्दाश्त न कर पा रही हों तो आप अपने डॉक्टर के किसी दर्द निवारक गोली के बारे में पूछ सकती हैं।

नॉर्मल डिलिवरी के बाद यूरिन पर कंट्रोल न रहना

अक्सर नॉर्मल वजाइनल डिलिवरी के बाद ऐसा होता है कि यूरिन या ब्लैडर पर आपका नियंत्रण नहीं रहता और पेशाब निकल जाती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि नॉर्मल डिलिवरी के दौरान पेड़ू (पेल्विक फ्लोर) के स्ट्रेच होने या उसमें चोट लगने का खतरा अधिक होता है। यही पेल्विक फ्लोर गर्भाशय, ब्लैडर, रेक्टम और आंत जैसे अंगों को सपोर्ट करता है। कुछ ही हफ्तों के अंदर यह समस्या अपने आप ठीक भी हो जाती है। आप चाहें तो कीगल एक्सरसाइज के जरिए अपनी पेल्विक फ्लोर मांसपेशियों को फिर से पहले की तरह मजबूत बना सकती हैं।

नॉर्मल डिलिवरी के बाद बवासीर

अगर मलत्याग के दौरान आपको दर्द महसूस हो रहा हो और मलाशय में सूजन महसूस हो रही हो तो आपको बवासीर की समस्या हो सकती है। ऐसे में दर्द से बचने के लिए मलत्याग न करने की बजाए इन टिप्स को अपनाएं:

  • फाइबर से भरपूर चीजों का सेवन करें और खूब सारा पानी पिएं। इससे मल सॉफ्ट हो जाएगा और आसानी से बाहर आ जाएगा। इसके लिए आप चाहें तो अपनी रोजाना की डाइट में 1 चम्मच अलसी के बीज को शामिल कर सकती हैं।
  • अपने डॉक्टर से बवासीर के इलाज के बारे में पूछें जिसमें स्टूल सॉफ्टनर और ओटीसी क्रीम शामिल है।
  • मलाशय के हिस्से में सूजन और दर्द से निपटने के लिए आप चाहें तो रोजाना 2 से 3 बार गर्म पानी में 10 से 15 मिनट तक बैठ सकती हैं।

प्रसव के बाद ब्रेस्ट में दर्द और सूजन

अगर आप अपने नवजात शिशु को पूरी तरह से ब्रेस्टफीडिंग न करवाएं तो आपके ब्रेस्ट में सूजन हो सकती है, ब्रेस्ट कठोर महसूस हो सकते हैं या ब्रेस्ट में दर्द या ब्रेस्ट के मुलायम होने (टेंडरनेस) की भी दिक्कत हो सकती है। इन सबकी वजह से आपके शिशु को ब्रेस्टफीडिंग के दौरान ब्रेस्ट को मुंह में लेने (लैचिंग) में मुश्किल हो सकती है। इन लक्षणों से बचने के लिए इन उपायों को आजमाएं:

  • अपने शिशु को पिलाने से पहले ब्रेस्ट पंप की मदद से या फिर अपने हाथों से ही ब्रेस्ट से थोड़ा दूध निकाल लें।
  • दूध पिलाना आसान हो इसके लिए आप चाहें तो ब्रेस्टफीडिंग से पहले गर्म पानी से नहा सकती हैं या फिर किसी कपड़े को गर्म पानी में भिगोकर उससे ब्रेस्ट को साफ कर सकती हैं।
  • शिशु को ब्रेस्टफीडिंग करवाते वक्त ठंडे गीले कपड़े को ब्रेस्ट के ऊपर रखें।
  • अगर आप शिशु को ब्रेस्टफीडिंग नहीं करवा रही हैं तो सही तरीके की ब्रा पहनें ताकि ब्रेस्ट को सपोर्ट मिले।

प्रसव के बाद त्वचा और बालों में बदलाव

प्रेगनेंसी के दौरान हार्मोन लेवल बढ़ने की वजह से भले ही आपको चेहरे पर प्रेगनेंसी ग्लो और बेहतर बाल नजर आ रहे हों लेकिन प्रसव के बाद इन सबमें बदलाव होने लगता है। प्रसव के बाद हार्मोन्स के लेवल को सामान्य होने में करीब 5 महीने का वक्त लगता है और इस दौरान आपके बाल तेजी से गिरने लगते हैं और स्किन का ग्लो भी खत्म हो जाता है। वहीं दूसरी तरफ अगर प्रेगनेंसी के दौरान आपके चेहरे पर डार्क पैचेज, झाइयां (मेलास्मा) हो गया था तो अब यह धीरे-धीरे हटने लगेगा। प्रसव के बाद शुरुआती कुछ हफ्तों तक आपके स्ट्रेच मार्क्स भी बहुत खराब लगते हैं लेकिन अगर आप इसका पूरा ध्यान रखें तो धीरे-धीरे यह गायब भी हो जाएंगे।

प्रसव के बाद अवसाद और मू़ड में बदलाव

हार्मोन का लेवल बढ़ने की वजह से प्रेगनेंसी के दौरान मूड स्विंग्स नॉर्मल है और प्रसव के बाद जब तब हार्मोन का लेवल कम नहीं हो जाता तब तक मूड स्विंग्स जारी रहते हैं। इस दौरान नई मां को नींद आने में दिक्कत हो सकती है, बार-बार रोने का मन करता है, बेचैनी महसूस होती है और किसी भी काम में रुचि नहीं रहती। इस फेज को बेबी ब्लूज भी कहते हैं। आमतौर पर प्रसव के 2-3 हफ्ते बाद बेबी ब्लूज खत्म हो जाता है लेकिन इस दौरान आपको अपना पूरा ख्याल रखना चाहिए। अपने जीवनसाथी बात करें, अपनी फीलिंग्स अपने परिवार वालों, रिश्तेदारों और दोस्तों से शेयर करें और अगर जरूरत महसूस हो तो डॉक्टर की मदद लें।

कई मामलों में बेबी ब्लूज गंभीर समस्या बन जाता है और इस वजह से महिला पोस्टपार्टम डिप्रेशन का शिकार हो जाती है। अगर आपको शिशु के जन्म के 2 हफ्ते बाद तक हद से ज्यादा थकान महसूस हो रही हो, डिप्रेशन फील हो रहा हो, मूड स्विंग्स बहुत ज्यादा हो रहे हों, भूख न लग रही हो और किसी बात में खुशी महसूस न हो रही हो तो यह पोस्टपार्टम डिप्रेशन का संकेत हो सकता है। इस परिस्थिति से निपटने के लिए चिकित्सीय मदद लेना बेहद जरूरी है क्योंकि बहुत सी महिलाएं सालों तक इसे झेलती रहती हैं बिना ये जाने कि आखिर उन्हें क्या हुआ है।

प्रसव के बाद वजन कम करना

प्रेगनेंसी के दौरान वजन बढ़ना सामान्य सी बात है। प्रसव के दौरान शिशु के साथ-साथ प्लेसेंटा और अमनिऑटिक फ्लूइड भी शरीर से बाहर निकल जाता है इसलिए प्रसव के तुरंत बाद आपका काफी वजन कम हो जाता है। हालांकि गर्भाशय के अब भी अंदर न जाने की वजह से बेबी बंप नजर आता है। गर्भाशय को वापस सामान्य होने में कुछ दिनों का समय लगता है इसलिए सब्र करें। वजन घटाने के चक्कर में अपने शरीर पर बेवजह का प्रेशर न डालें और वेट लॉस के लिए डाइटिंग या कार्ब्स न खाने जैसे तरीके बिलकुल न अपनाएं। प्रसव के बाद के समय में आपको खूब सारे पोषण युक्त आहार की जरूरत है। अगर आपके लिए वजन घटाने बेहद जरूरी हो तो आप डिलिवरी के 8 हफ्ते बाद इसकी शुरुआत कर सकती हैं, उससे पहले नहीं।

सिजेरियन डिलिवरी होने पर प्रसव के बाद ऐसे रखें ध्यान

अगर आपके डॉक्टर यह फैसला करते हैं कि आपकी और आपके शिशु की सेहत को खतरा है और आपके लिए सिजेरियन या सी सेक्शन डिलिवरी करना जरूरी है तो आपको ये याद रखना होगा कि आपको रिकवर होने में नॉर्मल डिलिवरी वालों की तुलना में ज्यादा समय लगेगा। सी सेक्शन के दौरान करीब 45 मिनट से 1 घंटे का वक्त लगता है और सर्जरी के जरिए शिशु को बाहर निकाला जाता है। इस दौरान मां को जनरल एनेस्थीसिया दिया जाता है और पेट में 2 जगह चीरा लगाया जाता है- एक गर्भाशय के पास और दूसरा पेट के निचले हिस्से में।

चूंकि यह एक सर्जरी है इसलिए नई मां जिसने सी-सेक्शन के जरिए शिशु को जन्म दिया है उसे अपने घाव और टांकों का ख्याल रखना पड़ता है और साथ में अपने शिशु का भी। इस मामले में जीवनसाथी, परिवार के लोग, रिश्तेदार या नर्स की और ज्यादा मदद की जरूरत होती है। ऐसे में अगर आपकी सी-सेक्शन डिलिवरी हुई हो तो इन बातों का ध्यान रखें:

  1. सी-सेक्शन के दौरान लगे चीरे का ध्यान कैसे रखें?
  2. सी-सेक्शन के बाद ब्रेस्टफीड कैसे कराएं?
  3. सी सेक्शन डिलिवरी में प्रसव के बाद दिखने वाले लक्षण

सी-सेक्शन के दौरान लगे चीरे का ध्यान कैसे रखें?

सी-सेक्शन के दौरान पेट में लगे चीरों का ज्यादा ध्यान रखने की जरूरत है क्योंकि अगर आप ऐसा नहीं करेंगी तो उसमें इंफेक्शन होने का खतरा रहेगा। सी-सेक्शन से रिकवर होने के दौरान असहज महसूस होना, थकान लगना, दर्द होना ये सब सामान्य सी बात है। इसके अलावा इन बातों का ध्यान जरूर रखें-

  • डॉक्टर आपको कुछ जरूरी दर्द निवारक दवाएं और कुछ दूसरी सुरक्षित दवाइयां देंगे ताकि आपका घाव जल्दी भर जाए। लेकिन ध्यान रहे कि आप डॉक्टर के बताए हुए प्रिस्क्राइब डोज से ज्यादा दवा न लें। अगर दर्द ज्यादा हो रहा हो तो आप हीट-पैड से सिंकाई भी कर सकती हैं।
  • खूब सारा आराम करें और अपने शिशु को उठाने के अलावा किसी भी तरह का कोई भार न उठाएं। ध्यान रहे कि आपको और आपके शिशु को जिन चीजों की जरूरत हो वो सब आपके आसपास ही मौजूद रहे ताकि आपको उठकर इधर उधर जाने की जरूरत न पड़े।

सी-सेक्शन के बाद ब्रेस्टफीड कैसे कराएं?

चूंकि आपके पेट में सर्जरी से जुड़ा घाव है, ऐसे में आपके लिए बैठकर शिशु को ब्रेस्टफीडिंग करवाना बेहद मुश्किल या नामुमकिन सा हो सकता है। इस दौरान आपको ध्यान रखना होगा कि आपके टांकों पर किसी तरह का प्रेशर न आए। ऐसे में शिशु को ब्रेस्टफीड करवाते वक्त अपने घाव का ध्यान रखते हुए आप इन पॉस्चर्स को ट्राई कर सकती हैं:

  • साइड-लाइंग होल्ड: अपने दाईं या बाईं तरफ करवट लेकर लेटें और शिशु को भी करवट लेकर लिटाएं ताकि उसका चेहरा आपके ब्रेस्ट की तरफ हो। एक हाथ से शिशु को सपोर्ट दें और दूसरे हाथ से शिशु को अपने ब्रेस्ट को मुंह में लेने में मदद करें। जब शिशु आराम से ब्रेस्ट से दूध पीना शुरू कर दे तो एक साथ से शिशु को सपोर्ट देना जारी रखें और दूसरे हाथ से अपने सिर को सपोर्ट दें।
  • फुटबॉल होल्ड: अपने शिशु को साइड में रखें और अपने हाथ और कोहनी की मदद से शिशु को सपोर्ट दें। दूसरे हाथ से शिशु को ब्रेस्ट को मुंह में पकड़ने में मदद करें। जब शिशु दूध पीना शुरू कर दे तो एक हाथ से शिशु को सपोर्ट दें और दूसरे हाथ से अपने सिर को।

सी सेक्शन डिलिवरी में प्रसव के बाद दिखने वाले लक्षण

नॉर्मल वजाइनल डिलिवरी की ही तरह सी-सेक्शन डिलिवरी के बाद भी प्रसव के बाद दिखने वाले (पोस्टनेटल) लक्षण नजर आते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि सर्जरी के प्रसीजर से रिकवर होने के साथ-साथ आपको प्रेगनेंसी से भी रिकवर होना है। इस दौरान आपको भले ही योनि में दर्द न हो लेकिन योनि से स्त्राव, आफ्टरपेन, सिकुड़न, संकुचन, ब्रेस्ट में दर्द या मुलायमपन महसूस होना क्योंकि आप ब्रेस्टफीडिंग करवा रही हैं, बाल गिरना, मूड चेंज आदि सबकुछ महसूस होगा। प्रसव के बाद के इन लक्षणों से कैसे डील करना है इस बारे में आर्टिकल में पहले ही ऊपर बताया जा चुका है।

सी-सेक्शन या सिजेरियन डिलिवरी के बाद भी पोस्टपार्टम डिप्रेशन का खतरा बना रहता है इसलिए इसे लेकर भी सतर्कता बरतें। अपनी सभी तरह की भावनाओं को पार्टनर से कहें, मूड स्विंग हो रहा हो, मन में डिप्रेशन से जुड़े विचार आ रहे हों, शिशु के जन्म के बाद खुशी महसूस न हो रही हो तो अपने डॉक्टर से बात करें, जीवनसाथी या दोस्तों से बात करें ताकि आपको बेहतर महसूस हो।

प्रसव के बाद चेकअप क्यों जरूरी है?

आपकी नॉर्मल वजाइनल डिलिवरी हुई हो या फिर सी-सेक्शन या सिजेरियन डिलिवरी, आपके लिए प्रसव के बाद चेकअप करवाना बेहद जरूरी है। अमेरिकन कॉलेज ऑफ ऑब्स्ट्रेटिशन्स और दूसरे गाइनैकॉलजिस्ट्स की मानें तो प्रसव के बाद (पोस्टनेटल) हेल्थ चेकअप सिर्फ एक बार नहीं होना चाहिए। यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है जिससे यह पता चलता रहता है कि आपके शिशु की सेहत और उसका विकास उसकी उम्र के हिसाब से सही तरीके से हो रहा है या नहीं। साथ ही यह भी पता चल जाता है कि नई मां प्रेगनेंसी के बाद रिकवर हो रही है या नहीं।

आपको प्रसव के बाद अपने शिशु के साथ चेकअप के लिए तीसरे हफ्ते में, छठे हफ्ते में और 12वें हफ्ते में जाना पड़ सकता है। अगर आप सी-सेक्शन डिलिवरी से गुजरी हों तो आपको और ज्यादा बार चेकअप के लिए जाना पड़ सकता है ताकि यह पता चले कि आपको पेट में लगा चीरा और टांके सही ढंग से भर रहे हैं या नहीं। पोस्टनेटल चेकअप एक अच्छा मौका है जब आप अपनी रिकवरी और शिशु का ध्यान कैसे रखना है इससे जुड़े कई सवाल डॉक्टर से पूछ सकते हैं। याद रखें कि कोई भी सवाल गलत नहीं होता क्योंकि यह आपके शिशु की सुरक्षा से जुड़ा है। ऐसे में डॉक्टर के सुझावों पर पूरा ध्यान दें।

और आखिर में इन बातों का रखें ध्यान

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आंकड़े की मानें तो प्रसव के बाद शुरुआती एक महीने में बहुत सी मांओं और नवजात शिशु की मौत हो जाती है जिसमें से करीब 50 प्रतिशत मामले प्रसव के 24 घंटे के अंदर होते हैं। लिहाजा प्रसव के बाद के शुरुआती 24 घंटे बेहद अहम माने जाते हैं। इस दौरान सबसे ज्यादा केयर और ध्यान की जरूरत होती है ताकि नई मां और शिशु दोनों की सेहत अच्छी बनी रहे।

प्रसव के बाद पोस्टपार्टम पीरियड को 3 फेज में बांटा जाता है- प्रसव के बाद शुरुआती 6 से 12 घंटे के समय को अक्यूट फेज कहते हैं। 2 से 6 हफ्ते का समय दूसरा फेज होता है और आखिरी फेज 6 महीने तक का हो सकता है और इस दौरान नई मां का शरीर फिर से पहले की तरह सामान्य होने लगता है। इस दौरान इस बात का ध्यान रखें कि कहीं आपको प्रसव के बाद किसी तरह की कोई जटिलता जैसे- यूट्राइन प्रोलैप्स या अमनियोटिक फ्लूइड इम्बोलिज्म की दिक्कत तो नहीं हो रही।

आप नई मां हैं इसलिए अपने खाने पीने का पूरा ध्यान रखें। स्वस्थ और संतुलित भोजन करें और अपने पार्टनर के साथ-साथ अपने डॉक्टर से भी बात करें कि आपको कैसा महसूस हो रहा है। करीब 80 प्रतिशत नई मांओं पर बेबी ब्लूज का असर होता है और इसके लिए शर्मिंदगी महसूस करने की जरूरत नहीं। बेबी ब्लूज की समस्या खुद ठीक हो जाती है लेकिन पोस्टपार्टम डिप्रेशन पर ध्यान देने की जरूरत है क्योंकि ये एक गंभीर समस्या है। याद रखें कि ये दोनों ही दिक्कते हार्मोनल असंतुलन की वजह से होती हैं और अपने डॉक्टर, जीवनसाथी, दोस्तों और परिवार के सदस्यों की मदद के जरिए आप इससे जल्दी बाहर आ सकती हैं।

बच्चे को ब्रेस्टफीड करवाना आसान नहीं होता। आप चाहें तो इसमें किसी बुजुर्ग रिश्तेदार की मदद ले सकती हैं। अगर आप तुरंत सफल न हों तो परेशान होने की जरूरत नहीं। प्रसव के बाद के कुछ लक्षण अस्थायी होते हैं जैसे स्किन औऱ बालों में बदलाव। आप चाहें तो इसके लिए कुछ घरेलू नुस्खे अपना सकती हैं। प्रेगनेंसी के वजन को कम करने को लेकर तनाव न लें। शिशु से जुड़ा कितना कुछ है करने को। उस पर फोकस करें और हमेशा खुश और स्वस्थ बनी रहें।

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