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ताजा खबरों के हवाले से यह पता चला है कि बिहार में इन्सेफेलाइटिस सिंड्रोम से पीड़ित बच्चों की संख्या 135 के पार पहुंच चुकी है।
बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में पिछले दो हफ़्तों में एक्यूट इन्सेफेलाइटिस सिंड्रोम से मरने वाले बच्चों की संख्या लगातार बढ़ रही है। यह इन्सेफेलाइटिस का ही भयानक रूप है। 

स्थानीय सरकारी अस्पताल के अधीक्षक (सुप्रीटेंडेंट) का कहना है कि एईएस के रोजाना लगभग 40 से 50 नए मामले आते हैं, लेकिन हमारे पास साधनों की बहुत कमी है। जब से इस बीमारी का पता चला है, तभी से ज्यादातर मरीजों का इलाज मुजफ्फरपुर के श्री कृष्ण मेडिकल काॅलेज एंड हाॅस्पीटल (एसकेएमसीएच) में ही चल रहा है। अस्पताल अपने सीमित साधनों के कारण इस स्थिति को बेहतर तरीके से संभालने में नाकामयाब है। अस्पताल के स्रोतों का कहना है कि मुख्य मंत्री और यूनिय हेल्थ मिनिस्टर जैसे बड़े-बड़े लोग यहां आए हैं और स्थिति का मुआयना किया है।

अस्पताल में बेड और डाॅक्टर की कमी होने की वजह से बिहार के हेल्थ सोसाइटी ने 15 डाॅक्टर, टेक्नीशियन और नर्स अस्पताल को मुहैया कराए हैं। अस्पताल के अधीक्षक का कहना है कि हमने दो बच्चों को एक बेड पर रखा है ताकि ज्यादा से ज्यादा बच्चों का इलाज किया जा सके।

अस्पताल के अधीक्षक ने स्वीकार किया है कि वरिष्ठ डाॅक्टरों का अभाव है। लेकिन इस बीना पर मरीजों को अस्पताल में भर्ती न करना अमानवीय होगा। ज्यादातर मरीज उत्तरी बिहार के दूर गांव से यहां आए हैं। हमने मामले की गंभीरता को समझते हुए पीडियाट्रिक आईसीओ सहित 20 बेड और 4 नए एसी लगवाए हैं। लेकिन बार-बार बिजली जाने की वजह से इलाज सही तरीके से नहीं हो पा रहा है।

आश्चर्य की बात यह भी है कि इस बीमारी से पीड़ित बच्चों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। डॉक्टरों के मुताबिक इस बुखार से पीड़ित बच्चों की उम्र चार से पंद्रह साल के बीच है।

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कौन-कौन सा क्षेत्र है प्रभावित

अब तक एक्यूट इन्सेफेलाइटिस सिंड्रोम से सबसे ज्यादा पीड़ित बच्चे उत्तरी बिहार के वैशाली, शिवहर, मोतिहारी और सीतामढ़ी से ही थे। अब बंका, वैशाली और समस्तीपुर से भी एईएस के मरीजा आ रहे हैं।

इस संबंध में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कह चुके हैं कि यह मामला बेहद गंभीर है। बच्चों की इस तरह मौत चिंता का विषय है। स्वास्थ्य सचिव खुद इस मामले का संज्ञान ले रहे हैं। डाॅक्टरों से भी अतिरिक्त सजग रहने की बात कही गई है।

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क्यों हो रहे हैं बच्चे बीमार

सवाल ये उठता है कि आखिर यह बीमारी इस तरह एकाएक बच्चों को अपनी चपेट में क्यों ले रही है? दरअसल, जिन बच्चों को अस्पताल में भर्ती किया गया है, उन बच्चों में अधिकतर हाइपोग्लाइसीमिया (खून में रक्त शर्करा का स्तर गिर जाना) के साथ सोडियम की कमी पाई गई है।

श्री कृष्णा मेडिकल काॅलेज अस्पताल के मेडिकल सुप्रीटेंडेंट डाॅक्टर शाही का कहना है कि इस बाबत जांच की जानी जरूरी है।’ मुजफ्फरपुर में और इसके आसपास के क्षेत्रों में अत्यधिक गर्मी के दौरान यह बीमारी ज्यादा फैल रही है। 15 साल से कम उम्र के बच्चे इस बीमारी का ज्यादा शिकार हो रहे हैं। 

एक्यूट इन्सेफेलाइटिस सिंड्रोम होने पर बच्चे में मानसिक स्तर पर भी बदलाव आते हैं। उसे  प्रलाप (उलझन महसूस होना), कोमा और दौरे आने लगते हैं। पिछले साल की तुलना में इस साल पीड़ित बच्चों की मरने की संख्या बढ़ी है। मृत्यु दर बढ़ने के कारण अभिभावक सहित पूरा प्रशासन डरा हुआ है।

कहां हुई चूक

इस संबंध में स्वास्थ्य विभाग ने स्वीकार किया है कि यदि समय रहते उन्होंने इस बीमारी को लेकर सही तरह से जागरूकता फैलाई होती तो शायद इतने बच्चे बीमार नहीं पड़ते। निश्चित रूप से उन्हें गांव-गांव में यह सूचना देनी चाहिए थी कि गर्मी के दिनों में बच्चों की किस तरह देखभाल करनी चाहिए। लेकिन अब विभाग सतर्क है और इस बाबत कड़े कदम उठाने की बात कह रहा है।

अभिभावकों के लिए डाॅक्टरों की सलाह

इस घटना के बाद डॉक्‍टरों की ओर से पैरेंट्स को खास सलाह दी गई है कि रात को बच्चे को खाली पेट न सोने दें। उसे रात को खाना जरूर खिलाएं। संभव हो तो शाम के समय भी बच्चे को नहलाएं ताकि वह गर्मी से बचा रह सके।

दोपहर के समय उन्हें सूरज की तेज धूप में कतई न खेलने दें। ध्यान रखें कि उस समय तापमान 42-43 डिग्री सेल्सियस होता है और इतनी तेज गर्मी बच्चों के लिए असहनीय होती है।

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