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सिद्ध औषधी, इलाज की पारंपरिक पद्धति है जिसकी शुरुआत दक्षिण भारत के राज्य तमिलनाडु में हुई थी और इसे भारत की सबसे प्राचीन चिकित्सा प्रणाली में से एक माना जाता है। सिद्ध चिकित्सा प्रणाली की खास बात ये है कि इसमें प्राचीन चिकित्सीय तरीकों और आध्यात्मिक नियमों के साथ ही रसायन विद्या और योग विद्या का भी अभ्यास किया जाता है। सिद्ध ये शब्द सिद्धि से बना है जिसका अर्थ है किसी चीज को प्राप्त करना, उत्कृष्टता या दिव्य। सिद्धि का संबंध आमतौर पर अष्ट सिद्धि से होता है। इन 8 महान अलौकिक शक्तियों को अंतरआत्मा के तौर पर गिना जाता है। जो लोग इन शक्तियों को प्राप्त कर लेते हैं उन्हें सिद्धर कहा जाता है।

औषधी की सिद्ध पद्धति में एक व्यक्ति को ब्रम्हांड के सूक्ष्म रूप के तौर पर देखा जाता है जो कि 5 प्राकृतिक तत्वों- धरती, अग्नि, वायु, जल और आकाश और 3 भाव या रस- वात्त (गतिविधि), पित्त (पाचन या मेटाबॉलिज्म) और कफ से मिलकर बना है। सिद्ध चिकित्सा का मूलभूत सिद्धांत बहुत हद तक आयुर्वेद से मिलता जुलता है लेकिन आयुर्वेद से खुद को अलग करने का सिद्ध चिकित्सा का सबसे बड़ा तरीका ये है कि सिद्ध औषधी को बनाने में जड़ी बूटियों के साथ ही धातु और खनिज पदार्थों का भी इस्तेमाल किया जाता है। जैसे- सल्फर, माइका या अभ्रक, मर्क्युरी या पारा आदि।

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सिद्ध सिस्टम की मूल अवधारणा एक ऐसे सिस्टम के बारे में है जिसमें शरीर, दिमाग और आत्मा तीनों पर बराबर जोर दिया जाता है। जब कोई व्यक्ति बीमार हो जाता है तो उसके शरीर में इस संतुलन को दोबारा से सही करने की कोशिश की जाती है। सिद्ध चिकित्सा के बारे में लोगों को बहुत कम जानकारी है इसलिए इससे जुड़ी कुछ गलत धारणाएं भी हैं। 

1. गलत धारणा : सिद्ध चिकित्सा पद्धति पूरी तरह से सुरक्षित है और इसका कोई साइड इफेक्ट नहीं है
हकीकत :
बहुत से लोगों को लगता है कि सिद्ध चिकित्सा पद्धति में चूंकि प्राकृतिक जड़ी बूटियों का इस्तेमाल होता है इसलिए यह पूरी तरह से नैचरल है और इसका कोई साइड इफेक्ट नहीं है। लेकिन साल 2018 में ऐनल्स ऑफ इंडियन अकैडमी ऑफ न्यूरोलॉजी में प्रकाशित एक स्टडी की मानें तो ऐसे 32 मरीजों की जांच की गई जिन्हें मर्क्युरी युक्त सिद्ध औषधी दी गई थी। स्टडी में शामिल करीब दो तिहाई मरीज जिन्हें साल 2012 से 2016 के बीच यह दवा दी गई थी उनमें मर्क्युरी टॉक्सिटी यानी पारे की विषाक्तता से जुड़ी समस्या देखने को मिली जिसकी वजह से उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। सिद्ध चिकित्सा पद्धति में चूंकि खनिज पदार्थों का भी इस्तेमाल होता है, इसलिए कुछ लोगों में इसके दुष्प्रभाव भी नजर आ सकते हैं।

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2. गलत धारणा : सिद्ध एक प्राचीन चिकित्सा प्रणाली है इसलिए आधुनिक समय में यह चिकित्सा पद्धति उपयुक्त नहीं है
हकीकत :
संपूर्ण रूप से बीमारी को ठीक करने के अपने दृष्टिकोण की वजह से दुनियाभर में पारंपरिक चिकित्सा पद्धति का पुनर्उत्थान हो रहा है और सिद्ध चिकित्सा पद्धति भी उन्हीं में से एक है। इस पद्धति में इलाज के लिए स्थानीय स्तर पर मिलने वाले कम कीमत के उत्पादों का इस्तेमाल होता है। यही वजह है कि सिद्ध चिकित्सा पद्धति न सिर्फ तमिलनाडु की धरोहर है बल्कि दुनियाभर में तेजी से प्रसिद्ध भी हो रही है। इसी का एक ताजा उदाहरण है सिद्ध चिकित्सा के माध्यम से नए कोरोना वायरस का सफल इलाज जिसका दावा तमिलनाडु की सरकार भी कर रही है।

3. गलत धारणा : कोई और दवा चल रही हो तो उसके साथ सिद्ध चिकित्सा की दवा नहीं ले सकते
हकीकत :
सिद्ध दवाइयों का उपयोग करते समय आमतौर पर किसी व्यक्ति को बहुत ज्यादा दुष्प्रभाव नहीं होता। चिकित्सा की यह प्राचीन तकनीक कई ‎शोधकर्ताओं के माध्यम से बेहद सुरक्षित पाई गई है और सिद्ध चिकित्सा प्रणाली से जुड़ी दवाएं दूसरी दवाइयों के साथ किसी तरह की बाधा भी उत्पन्न ‎करने के लिए नहीं जाना जाती है। यह पूरी तरह से प्राकृतिक इलाज है और ‎इसमें डरने की कोई ज़रूरत नहीं है।

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