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नए कोरोना वायरस के एयरबोर्न ट्रांसमिशन यानी हवा में फैलने का एक 'बड़ा सबूत' मिला है। प्रतिष्ठित अमेरिकी अखबार दि न्यूयॉर्क टाइम्स (एनवाईटी) ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया है कि हवा में बहते ड्रॉपलेट्स में सार्स-सीओवी-2 वायरस के जेनेटिक मटीरियल के केवल टुकड़े ही नहीं होते, बल्कि जीवित वायरस भी फैलता है। अखबार के मुताबिक, विषाणु विज्ञानियों और एयरोसोल साइंटिस्टों की एक टीम ने बकायदा सबूत के साथ इसकी पुष्टि की है। 

दरअसल, यूनिवर्सिटी ऑफ फ्लोरिडा की एक रिसर्च टीम ने हवा में मौजूद कणों के सैंपलों से जीवित कोरोना वायरस को आइसोलेट करने में कामयाबी हासिल की है। ये सैंपल अस्पतालों में भर्ती कोविड-19 मरीजों से सात से 16 फीट के बीच की दूरी से लिए गए थे। यह डिस्टेंस कोरोना वायरस से बचने के लिए निर्देशित छह फीट की दूरी से ज्यादा है। शोध में शामिल नहीं हुए कई वैज्ञानिकों ने संबंधित अध्ययन से जुड़े सबूतों को स्वीकार किया है। लेकिन कुछ विशेषज्ञों ने कहा है कि इन परिणामों में यह सामने नहीं आया है कि हवा से मिले वायरस के सैंपल संक्रमण फैलाने में सक्षम हैं या नहीं।

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गौरतलब है कि नए कोरोना वायरस के हवा में फैलने की आशंका पहले भी कुछ शोधों में जताई गई है। लेकिन उनमें सैंपल इकट्ठा करने के तरीकों को लेकर संशय बना रहा है। एक स्टडी में वैज्ञानिक वायरस को आइसोलेट करने में सफल भी हो गए थे। लेकिन उसमें यह साबित नहीं हुआ था कि वह किसी को संक्रमित भी कर सकता है या नहीं। ऐसे में नए अध्ययन से जुड़े वैज्ञानिकों ने एक खास सैंपलर तैयार किया जो विशुद्ध जलवाष्प का इस्तेमाल करते हुए एयरसोल का आकार बड़ा कर देता है। इससे हवा में मौजूद सैंपल को इकट्ठा करना आसान हो जाता है। इसके तुरंत बाद उन्हें तरल युक्त सॉल्ट, शुगर और प्रोटीन में ट्रांसफर कर दिया जाता है, जो रोगाणु को संरक्षित करने का काम करते हैं। हालांकि इस टेक्निक का इस्तेमाल पहले के शोधों में भी किया गया है, लेकिन उनमें अस्पतालों में हवा में मौजूद बाकी रेस्पिरेटरी वायरसों के सैंपल इतने घुल मिल गए कि सार्स-सीओवी-2 को आइसोलेट करना मुश्किल हो गया था। नए अध्ययन में यह काम ज्यादा बेहतर तरीके से किया गया है।

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इसमें शोधकर्ताओं ने फ्लोरिडा यूनिवर्सिटी के हेल्थ शैंड्स अस्पताल के एक कोविड-19 वॉर्ड रूम से एयर सैंपल इकट्ठे किए। यहां बता दें कि जिस रूम से सैंपल लिए गए, उनमें किसी भी कोरोना मरीज के इलाज से जुड़ी मेडिकल प्रक्रिया नहीं चल रही थी। गौरतलब है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन और कुछ अन्य स्वास्थ्य संगठनों यह कहते हुए एयरोसोल ट्रांसमिशन की संभावना को नकारा है कि बिना मेडिकल प्रोसीजर वाले माहौल में वायरस हवा में नहीं फैलता है। यही कारण है कि वैज्ञानिकों ने ऐसी ही जगह के एयर सैंपल लिए, जहां मरीज किसी तरह के मेडिकल प्रोसीजर से नहीं गुजर रहे थे। ऐसा करते हुए शोधकर्ताओं ने दो सैंपलर को इस्तेमाल किया। एक में मरीजों से सात फीट की दूरी तक के एयर सैंपल लिए गए और दूसरे में करीब 16 फीट की दूरी तक के नमूने इकट्ठा किए गए। दोनों ही सैंपलों से जीवित वायरस मिलने का दावा किया गया है।

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अध्ययन से जुड़े वैज्ञानिक जॉन लेडनिकी ने बताया कि रूम में हवा का फ्लो हर एक घंटे में छह बार बदला गया। वहां उचित और सक्षम फिल्टर्स को लगाया गया था। अल्ट्रावायलेट इरैडिएशन के अलावा अन्य सुरक्षा इंतजाम भी किए गए थे। इसके बावजूद प्रति लीटर वायु में 74 वायरस पार्टिकल्स पाए गए। इसका मतलब है कि जिन जगहों (जैसे स्कूल) में वेंटिलेशन की व्यवस्था अच्छा नहीं है, वहां वायरस ज्यादा मात्रा के साथ हवा में मौजूद हो सकता है। हालांकि कुछ अन्य विशेषज्ञों का कहना है कि इस परिणाम से यह दावा करना मुश्किल है कि वायरस के इस तरह हवा में मिलने से इन्फेक्शन का खतरा भी है। बहरहाल, इन मिश्रित प्रतिक्रियाओं से साफ होता है कि इस नए दावे से सार्स-सीओवी-2 कोरोना वायरस के एयरबोर्न ट्रांसमिशन की बहस को नई हवा मिल गई है।

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