प्री-एक्लेमप्सिया गर्भावास्था से जुड़ा एक ऐसा डिसऑर्डर है जो प्रेगनेंसी की दूसरी छमाही में अचानक सामने आता है और मां तथा बच्चे के लिए कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं खड़ी कर सकता है। मेडिकल विशेषज्ञ बताते हैं कि प्री-एक्लेमप्सिया की वजह से दीर्घकालिक बीमारियों, जैसे डायबिटीज और हृदय रोग, के पैदा होने का खतरा बढ़ जाता है। अब शोधकर्ताओं ने इस डिसऑर्डर से जुड़े दो नए संकेतकों या बायोमार्कर्स एफकेबीपीएल और सीडी44 की खोज की है जो इस हेल्थ कंडीशन को समझने, इसकी पहचान करने और ट्रीटमेंट के तरीके को बेहतर करने में काफी सहायक हो सकते हैं। इस खोज से जुड़ा शोध 'जर्नल ऑफ क्लिनिकल एंडोक्रिनॉलजी एंड मेटाबॉलिज्म' नामक मेडिकल पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।

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प्री-एक्लेमप्सिया की वजह से गर्भवती महिला को हाई ब्लड प्रेशर की समस्या हो सकती है। यहां तक कि उनका ऑर्गन फेलियर तक हो सकता है। बच्चे का समय से पहले पूर्व जन्म लेना या मृतावस्था में जन्म (स्टिलबर्थ) लेना भी प्री-एक्लेमप्सिया के गंभीर परिणामों में शामिल हैं। लेकिन अब एफकेबीपीएल और सीडी44 बायोमार्कर्स के जरिये इस समस्या को पहले ही पकड़ा जा सकता है। ऑस्ट्रेलिया स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नॉलजी सिडनी की प्रोफेसर और इस शोध की वरिष्ठ लेखिका डॉ. लाना मैकक्लेमेंट्स का कहना है कि प्रेगनेंसी से पहले और उसके बाद दोनों ही स्थितियों में इन बायोमार्कर्स को प्री-एक्लेमप्सिया की पहचान करने और उसके खतरों का आंकलन करने में इस्तेमाल किया जा सकता है।

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डिसऑर्डर पर बात करते हुए डॉ. मैकक्लेमेंट्स ने बताया, 'प्री-एक्लेमप्सिया दो प्रकार का होता है। एक की पहचान प्रेगनेंसी के शुरुआती 34 हफ्तों से पहले (अर्ली-ऑनसेट) होती है और दूसरे की इतने ही हफ्तों के बाद जिसे लेट-ऑनसेट प्री-एक्लेमप्सिया कहते हैं। मौजूदा समय में इस डिसॉर्डर से जुड़ी तमाम जांच और निगरानी का फोकस 34 हफ्तों से पहले होने वाले यानी अर्ली-ऑनसेट प्री-एक्लेमप्सिया पर होता है, जो इस समस्या के कुल मामलों का केवल दस से 15 प्रतिशत है। ज्यादातर मामले लेट-ऑनसेट प्री-एक्लेमप्सिया के होते हैं, जिन्हें अधिकतर बार अनदेखा किया गया है।'

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शोधकर्ताओं का कहना है कि एफकेबीपीएल और सीडी44 दोनों बायोमार्कर्स लेट-ऑनसेट प्री-एक्लेमप्सिया को डायग्नॉस करने के लिहाज से विशेष रूप से सहायक हैं। डॉ. मैकक्लेमेंट्स ने बताया कि ये बायोमार्कर्स अव्यवस्थित गर्भनाल या मां की नाड़ी के सही से काम नहीं करने की जानकारी देने में मददगार हैं, जो कि प्री-एक्लेमप्सिया के विशेष लक्षणों में शामिल हैं। इसके अलावा, एफकेबीपीएल प्री-एक्लेमप्सिया के इलाज को भी बेहतर करने में सक्षम साबित हो सकता है, क्योंकि यह इस डिसऑर्डर को पनपने में अहम भूमिका निभाने वाली मध्योतक कोशिका यानी मेसेनकीमल सेल को रोकने का काम करता है। डॉ. मैकक्लेमेंट्स ने बताया कि यही कारण है कि वे और उनके साथी शोधकर्ता इस नई खोज को लेकर उत्साहित हैं।

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