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हर स्‍त्री की जिंदगी में अपने बच्‍चे को जन्‍म देना एक अनोखा अनुभव रहता है जिसमें असहनीय दर्द के बाद अपने शिशु को गोद में लेने की खुशी मिलती है। जन्‍म के बाद शिशु के पहली बार रोने से ही जैसे मां का सारा दर्द छूमंतर हो जाता है। अक्‍सर नवजात शिशु रोकर ही अपनी भूख, बीमारी होने या दर्द का संकेत देते हैं लेकिन जन्‍म के तुरंत बाद पहली बार रोना कुछ अलग और महत्‍वपूर्ण होता है।

आज इस लेख के जरिए हम आपको बताने जा रहे हैं कि शिशु के लिए जन्‍म के तुरंत बाद रोना क्‍यों जरूरी होता है और इससे क्‍या पता चलता है।

  1. क्‍यों जरूरी है फर्स्‍ट क्राई (पहली बार रोना)
  2. शिशु के रोने से मिलते हैं ये संकेत
  3. नवजात शिशु के लिए कितना रोना है नॉर्मल
  4. कब-कब रोता है शिशु
  5. डॉक्‍टर को कब दिखाएं
  6. जन्म के 24 घंटे में शिशु क्यों रोता है के डॉक्टर

जन्‍म के तुरंत बाद शिशु का रोना इस बात का संकेत देता है कि उसके फेफड़े ठीक तरह से काम कर रहे हैं। इससे गायनेकोलॉजिस्‍ट को नवजात शिशु की सेहत के बारे में पता चलता है। अगर शिशु तेज रोता है तो इसका मतलब है कि वो ठीक है जबकि धीरे रोना किसी स्‍वास्‍थ्‍य स्थिति का संकेत हो सकता है।

जन्‍म से पहले तक शिशु गर्भनाल के जरिए ही सांस लेता है। यहां तक कि जन्‍म के दौरान भी शिशु के फेफड़ों में हवा नहीं होती है। हालांकि, जन्‍म के बाद गर्भनाल को काटने के पश्‍चात् शिशु को अपने आप ही सांस लेनी होती है। जन्म के 10 सेकेंड्स बाद शिशु अपनी पहली सांस लेता है जिसमें उसके फेफड़ों में हवा भरती है और वो नाक एवं मुंह से एमनीओटिक फ्लूइड (गर्भ में शिशु के आसपास मौजूद और उसे सुरक्षा देने वाला फ्लूइड) को बाहर निकालता है। इसी वजह से शिशु पहली बार रोता है। कभी-कभी जब शिशु इस फ्लूइड को खुद बाहर नहीं निकाल पाता है, तब उस स्थिति में डॉक्‍टर सक्‍शन ट्यूब से इसे बाहर निकालते हैं।

(और पढ़ें - नवजात शिशु को खांसी क्यों होती है)

  • सामान्‍यत: जन्‍म के बाद पहले 24 घंटों में नवजात शिशु बहुत शांत रहता है। गर्भ की गरमाई और आराम के बाद जब वो बाहर आता है तो उसे नए वातावरण में एडजस्‍ट होने में समय लगता है।
  • नवजात शिशु रोकर ही आपका ध्‍यान अपनी ओर खींचता है और अपनी हर जरूरत के बारे में बताता है। अपनी बात कहने के लिए नवजात शिशु के पास रोने के अलावा और कोई तरीका नहीं होता है।
  • शिशु के रोने पर मां का ध्‍यान उसकी ओर जाता है, यहां तक कि नींद में भी मां को अपने शिशु के रोने की आवाज सुनाई दे जाती है।
  • शिशु दिनभर में लगभग 3 घंटे रोता है। कभी-कभी वो इससे ज्‍यादा समय तक भी रो सकता है। शिशु अधिकतर दोपहर के बाद और शाम को रोते हैं।

(और पढ़ें - नवजात शिशु को कितना सोना चाहिए)

यूनाइटेड किंगडम की नेशनल चाइल्‍डबर्थ ट्रस्‍ट के अनुसार हर शिशु अलग होता है और ये कह पाना काफी मुश्किल है कि आपके बच्‍चे का कितना रोना सामान्‍य है। हालांकि, रिसर्च कहती है कि एक दिन में नवजात शिशु का लगभग दो घंटे रोना सामान्‍य है। अगर आपका शिशु दिनभर में 3.5 घंटे से ज्‍यादा रोता है तो आपको एक बार डॉक्‍टर को दिखा लेना चाहिए। जैसे-जैसे शिशु का विकास होता है, वैसे-वैसे वो कम रोने लगता है। 6 से 8 सप्‍ताह का शिशु दिनभर में लगभग एक घंटा रोता है।

भूख लगने पर

बच्‍चे सबसे ज्‍यादा भूख लगने पर रोते हैं। शिशु को हर दो से तीन घंटे में दूध पिलाने की जरूरत होती है। थोड़े समय में आप खुद ही भूख लगने पर अपने शिशु के संकेतों को समझ जाएंगीं। जब दूध पीते समय शिशु का पेट भर जाता है तो वो अपने आप ही ब्रेस्‍ट से अपना मुंह हटा लेता है।

वहीं अगर आप शिशु को फॉर्म्‍यूला-फीड करवा रही हैं तो उसे एक बार दूध पीने के बाद कम से कम दो घंटे तक दोबारा दूध पीने की जरूरत नहीं पड़ती है लेकिन ये पैटर्न हर शिशु में अलग होता है। कुछ बच्‍चे दूध पीने के बाद लंबे समय तक शांत रहते हैं।

अगर शिशु लगातार पूरा दूध नहीं पीता है तो उसे थोड़ी-थोड़ी देर में कम मात्रा में फॉर्म्‍यूला मिल्‍क पिलाएं।

थकान महसूस होने पर

जन्‍म के बाद बाहर का वातावरण शिशु के लिए बहुत अलग होता है और वो लगातार इस माहौल में एडजस्‍ट होने के लिए कोशिश कर रहा होता है। आसपास के लोगों की आवाज से शिशु को डर लग सकता है और उसे नींद आने में भी दिक्‍कत होती है।

परिणामस्‍वरूप, शिशु को थकान होने लगती है जिसकी वजह से वो रोने लगता है। स्‍तनपान के बाद शिशु को शांत कमरे में रखें और सुलाने से पहले उसे अपनी गोद में रखें।

गोद में आने के लिए

शिशु हमेशा अपनी मां के नजदीक रहना चाहता है। नौ महीने तक गर्भ में रहने के दौरान वो अपनी मां की आवाज और दिल की धड़कन को ही सुनता रहता है। जन्‍म के बाद शिशु अपनी मां को स्‍पर्श और महक से पहचानने लगता है। शिशु को सुरक्षित महसूस करने के लिए लगातार अपनी मां के स्‍नेह की जरूरत पड़ती है। शिशु चाहता है कि उसकी मां उसे हर समय अपनी गोद में रखे। इससे शिशु को खुशी मिलती है और वो खुद को सुरक्षित महसूस करता है।

बहुत ठंड या गर्मी लगती है

नौ महीने तक गर्भ में एमनीओटिक फ्लूइड शिशु को सुरक्षा और गरमाई देता है। जन्‍म के बाद शिशु को बाहरी तापमान में एडजस्‍ट होने में थोड़ा समय लगता है। समय के साथ उसकी त्‍वचा बाहरी वातावरण के अनुकूल हो जाती है। तब तक आपको अपने शिशु को मौसम के हिसाब से कपड़े पहनाने चाहिए। गरमाई देने के लिए शिशु को केवल एक कपड़ा पहनाकर मुलायम ब्‍लैंकेट से ढक कर सुला दें।

उसे ज्‍यादा कपड़े पहनाने की गलती न करें। छूने पर आपको शिशु के हाथ और पैर हल्‍के ठंडे लग सकते हैं। खासतौर पर जन्‍म के पहले 24 घंटों में इनका रंग हल्‍का नीला लग सकता है। छाती के ऊपरी हिस्‍से और कपड़ों को हाथ लगाकर शिशु के शरीर के तापमान का अंदाजा लगा सकते हैं।

नैपी बदलने के लिए

भूख के बाद शिशु सबसे ज्‍यादा नैपी बदलवाने के लिए रोते हैं। हालांकि, कुछ बच्‍चों को नैपी बदलना अच्‍छा नहीं लगता है और इस दौरान वो थोड़े चिड़चिड़े हो जाते हैं। ऐसा ठंडी हवा के कारण हो सकता है। गाना गाकर या बात करके शिशु का ध्‍यान बंटाते हुए नैपी बदलें। एक हफ्ते में आप खुद ही इस काम में माहिर हो जाएंगीं।

वैसे तो हर समय मां का ध्‍यान अपनी ओर खींचने के लिए नवजात शिशु रोने का सहारा लेते हैं लेकिन अगर आपका बच्‍चा लगातार रोए जा रहा है तो उसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। अगर आपको शिशु के रोने के नियमित पैटर्न में कोई बदलाव दिख रहा है तो तुरंत पीडियाट्रिशियन यानी बाल रोग चिकित्‍सक को दिखाएं।

नवजात शिशु को रोते हुए चुप करवाना बहुत मुश्किल काम है और मां को तो ये काम दिन-रात करते रहना पड़ता है। अगर आप पहली बार मां बनी हैं तो आपके लिए भी अपने शिशु को संभालना और समय-समय पर उसकी जरूरतों को समझना मुश्किल होगा लेकिन आप जितना ज्‍यादा अपने शिशु के साथ समय बिताएंगीं उतना ही ज्‍यादा आप उसकी जरूरतों, आदतों और संकेतों को समझने लगेंगीं।

Dr. Yeeshu Singh Sudan

Dr. Yeeshu Singh Sudan

पीडियाट्रिक

Dr. Veena Raghunathan

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पीडियाट्रिक

Dr. Sunit Chandra Singhi

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