भारत के स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (डीजीएचएस) ने कहा है कि कोरोना वायरस के उन मरीजों को भी कॉन्वलेसेंट प्लाज्मा थेरेपी दी जा सकती है, जिनकी हालत कम गंभीर रूप से संक्रमित होने के बावजूद नहीं सुधर रही। डीजीएचएस का कहना है कि कोविड-19 के ऐसे सामान्य मरीजों को प्लाज्मा थेरेपी दिए जाने पर विचार किया जा सकता है, जिनके इलाज के लिए तमाम दवाओं का इस्तेमाल किया जा चुका है, फिर भी उनकी तबीयत ठीक नहीं हो रही है और उन्हें ऑक्सीजन सपोर्ट की जरूरत पड़ रही है।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन के तहत आने वाले डीजीएचएस ने कहा है कि कोविड-19 के मरीजों को प्लाज्मा थेरेपी दिए जाने का विचार करते समय कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है। इनमें एबीओ कम्पैटिबिलिटी यानी अलग रक्त समूह के व्यक्ति से प्लाज्मा लेने पर होने वाले दुष्प्रभाव के खतरे और दान किए गए प्लाज्मा की क्रॉस-मैचिंग जैसी बातें शामिल हैं। इसके अलावा, प्लाज्मा दिए जाने के बाद मरीज की कई घंटे तक निगरानी की जानी चाहिए ताकि अगर थेरेपी के परिणामस्वरूप कोई विपरीत प्रभाव दिखें तो तुरंत उचित इलाज किया जा सके।
इस बारे में बयान जारी करते हुए डीजीएचएस ने यह भी कहा कि जिन लोगों में आईजीए (इम्यूनोग्लोबुलिन एंटीबॉडी का संक्षिप्त नाम) का अभाव है या जिन्हें इम्यूनोग्लोबुलिन से एलर्जी है, उन्हें प्लाज्मा थेरेपी में शामिल नहीं किया जाना चाहिए। डीजीएचएस ने बताया है कि थेरेपी के तहत कितनी मात्रा में प्लाज्मा दिया जा सकता है। इस नियम के तहत मरीज को चार से 13 मिलीग्राम प्लाज्मा दिए जाने का सुझाव दिया गया है।
गौरतलब है कि हाल ही में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने कॉन्वलेसेंट प्लाज्मा के कलेक्शन के लिए ब्लड ट्रांसफ्यूजन से जुड़े दिशा-निर्देशों में बदलाव कर दिया था। मंत्रालय ने कोरोना वायरस के संक्रमण से उबर चुके मरीजों से प्लाज्मा लेने के लिए कोविड-19 से जुड़े क्लिनिकल ट्रायल प्रोटोकॉल के तहत यह कदम उठाया था। उसके बाद ही डीजीएचएस ने इस संबंध में निर्देश जारी किए हैं। दूसरी तरफ, इंडियन रेड क्रॉस सोसायटी भी सक्षम प्लाज्मा डोनर्स की जानकारी इकट्ठा कर उनका डेटाबेस तैयार कर रही है ताकि उसे कोविड-19 के मरीजों का इलाज करने में लगे अस्पतालों के लिए काम में लाया जा सके।
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क्या है कॉन्वलेसेंट प्लाज्मा थेरेपी?
इस तकनीक में बीमारी से ठीक हुए लोगों के शरीर के खून से प्लाज्मा निकाल कर उसी बीमारी से पीड़ित दूसरे मरीजों का दिए जाते हैं। प्लाज्मा रक्त में मौजूद पीले रंग का तरल पदार्थ होता है, जिसके जरिये रक्त कोशिकाएं और प्रोटीन शरीर के अलग-अलग अंगों तक पहुंचती हैं। प्लाज्मा थेरेपी को कॉन्वलेंसेंट प्लाज्मा थेरेपी भी कहते हैं।
कोविड-19 या अन्य संक्रामक रोग होने के प्रतिक्रिया स्वरूप हमारा शरीर रोग-प्रतिकारकों यानी एंटीबॉडीज का निर्माण कर लेता है। ये रोग-प्रतिकारक कोविड-19 और अन्य बीमारियों से लड़ने में अहम भूमिका निभाते हैं। जिन लोगों की रोग-प्रतिकारक क्षमता या इम्यून सिस्टम पहले से मजबूत होती है या इलाज के दौरान दुरुस्त हो जाती है, वे आसानी से कोरोना वायरस के संक्रमण को मात दे देते हैं। यही वजह है कि दुनियाभर में डॉक्टर और शोधकर्ता कोविड-19 की काट ढूंढने के लिए प्रयोग के तहत ऐसे लोगों के ब्लड सैंपल में से प्लाज्मा अलग करके उन लोगों को दे रहे हैं, जिनमें एंटीबॉडीज या तो बने नहीं हैं या वायरस को रोक पाने अथवा खत्म करने में सक्षम नहीं हैं।
हालांकि, प्लाज्मा थेरेपी से मरीज का ठीक होना कई बातों पर निर्भर करता है। हाल के दिनों में इस विषय पर कुछ शोध सामने आए हैं। इनमें से एक में बताया गया है कि कोविड-19 के मरीजों के ठीक होने के बाद उनके शरीर में कोरोना वायरस को खत्म करने वाले एंटीबॉडीज कुछ समय के बाद कम या खत्म हो जाते हैं। ऐसे में शोधकर्ताओं ने सलाह दी है कि इस बीमारी के मरीजों के ठीक होने के बाद जितना जल्दी हो सके उनके शरीर से प्लाज्मा के रूप में एंटीबॉडी ले लिए जाएं। इससे उस मरीज के बचने की संभावना बढ़ सकती है, जिसे एंटीबॉडीज दिए जा रहे हैं।
उत्पाद या दवाइयाँ जिनमें कोविड-19: तबीयत में सुधार नहीं होने पर कोरोना वायरस के सामान्य मरीजों को भी प्लाज्मा थेरेपी दी जा सकती है- स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय है
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