वेस्टर्न पेसिफिक रीजन में डायरिया की गंभीर स्थिति के कारण बच्चों की मौत के मामलों में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है। रोटावायरस के कारण होने वाली इस भयावह स्थिति की रोकथाम के लिए शुरू किए गए टीकाकरण अभियान के चलते यह सफलता मिली है।

मर्डोक चिल्ड्रन्स रिसर्च इंस्टीट्यूट (एमसीआरआई) के नेतृत्व में किए गए इस शोध को बीएमसी इंफेक्शन डिजीज में प्रकाशित किया गया है। इसमें बताया गया कि पैसिफिक आइलैंड देश किरिबाती में कुपोषण की उच्च दर होने के बावजूद बच्चों में इस टीके की वजह से मृत्युदर में कमी देखने को मिली है। पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में किरिबाती पहला ऐसा देश है, जहां रोटावायरस टीकाकरण के प्रभावों के सुखद परिणाम देखने को मिले हैं।

गौरतलब है कि रोटावायरस दुनियाभर में बच्चों में गंभीर दस्त का सबसे आम कारण है। इसकी वजह से दुनियाभर में हर साल लगभग 215,000 बच्चों की मौत हो जाती है।

कम स्वच्छता और शुद्ध पेयजल के अभाव वाले देश में मिले अच्छे परिणाम

एमसीआरआई के प्रोफेसर फियोना रसेल ने बताया कि किरिबाती में बच्चों को रोटावायरस से ​सुरक्षा मुहैया कराने के लिए टीके दिए जाने के दो साल बाद यानी साल 2015 में यह अध्ययन किया गया। बच्चों में अब इसके सुखद परिणाम नजर आ रहे थे। किरिबाती सहित अन्य गरीब देश, जहां स्वच्छता के व्यापक इंतजाम नहीं हैं, वहां भी इस वैक्सीन के बेहतर परिणाम दर्ज किए गए हैं, जो काफी सुकून देने वाला है। बकौल प्रोफेसर रसेल, प्रशांत महाद्वीप में किरिबाती एक ऐसा देश है जहां न तो साफ पेयजल की सुविधा है न ही स्वच्छता के पुख्ता इंतजाम। लिहाजा यहां कुपोषण और बाल मृत्युदर सबसे अधिक है।

एक समय किरिबाती में रोटावायरस डायरिया का खूब प्रकोप देखने को मिला। देश में पांच साल से कम आयु वाले 70 प्रतिशत से ज्यादा बच्चे वायरस के शिकार हो गए थे। इसके बाद यहां टीकाकरण अभियान की शुरुआत हुई। अध्ययन मे पाया गया कि टीकाकरण के बाद पांच साल से कम आयु वाले बच्चों में आंत में सूजन के मामलों में 37 फीसदी, जबकि पेट संबंधी अन्य रोगों में 44 फीसदी की कमी दर्ज की गई।

इस अध्ययन के आधार पर प्रोफेसर रसेल कहती हैं कि यह शोध काफी दूरगामी साबित होगा। अब एशिया सहित अन्य महाद्वीपों में भी नीति निर्माताओं को इस वैक्सीन के व्यापक प्रयोग के बारे में विचार करना चाहिए। उन्होंने कहा कि अच्छे परिणाम आने के बाद भी अब तक एशिया के नाम मात्र के देशों ने ही इस वैक्सीन को अपने राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रमों में शामिल किया है।

भारत में क्या हैं हालात

भारत में हर साल जन्म लेने वाले 1,000 में से 37 बच्चों की पांच वर्ष से कम आयु में ही मौत हो जाती है। इनमें से भी ज्यादातर मौत डायरिया की वजह से होती है। रोटावायरस पांच साल से कम उम्र के बच्चों में दस्त का एक प्रमुख कारण है। एक अनुमान के मुताबिक भारत में सालाना 78,000 बच्चों की मौत इसी वजह से हो जाती है। वायरस की रोकथाम के लिए रोटावैक नामक वैक्सीन को भारतीय ड्रग कंट्रोलर जनरल द्वारा 2014 में लाइसेंस दिया गया। इसके दो वर्ष बाद 2016 में भारत ने अपने राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में वैक्सीन को चरणबद्ध तरीके से देने की शुरुआत की।

संक्रमण के दौरान क्या होता है?

य​ह एक ऐसा वायरस है जिसकी वजह से आंतों का इंफेक्शन (गैस्ट्रोएन्टराइटिस) होता है। इससे आंत की अंदरूनी परत को नुकसान पहुंचता है। ऐसी स्थिति में शरीर थोड़े से भी भोजन का पाचन नहीं कर पाता है। पांच साल से कम आयु के बच्चों में इसका असर अधिक देखने को मिलता है। एक अध्ययन में पाया गया कि पांच साल तक होने से पहले तकरीबन हर बच्चे को यह इंफेक्शन होता है।

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रोटावायरस टीका

Dr. Gagan Agarwal
MBBS,MD
15 वर्षों का अनुभव
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