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ताड़ का तेल यानि पाम ऑयल बहुत उपयोगी वनस्पति तेल है। यह अधिकांश लोग जानते ही हैं। ताड़ के तेल के उत्पादन में उपयोग की जाने वाली मुख्य किस्मों में अफ्रीकी पाम ऑयल (एलेईस गिनेंसिस) और अमेरिकन पाम ऑयल (एलेयस ऑलिफेरा) हैं। ताड़ का तेल स्वाभाविक रूप से लाल या नारंगी रंग का होता है, जो इसमें मौजूद उच्च बीटा कैरोटीन के कारण होता है।

पाम ऑयल के फायदे एक तरफ, क्या आप जानते हैं कि पाम ऑयल की खेती हमारे पर्यावरण को कितना नुकसान पहुंचाती है। जी हां, ताजा रिसर्च में यह पता चला कि कैसे पाम ऑयल के पौधे ग्लोबल वार्मिंग में बड़ा योगदान दे रहे हैं। दरअसल बाकी बड़े पेड़ों की अपेक्षा पाम ऑल के छोटे पौधों से ग्रीनहाउस गैसें (कार्बन डाई आक्साइड, नाइट्रस आक्साइड, मीथेन, क्लोरो-फ्लोरो कार्बन) दोगुनी मात्रा में निकलती हैं और ऐसा कुछ दिनों या कुछ सालों में देखने को नहीं मिला है, बल्कि शुरुआती दौर से ही ऐसा है।

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शोधकर्ताओं ने एक नए अध्ययन में खुलासा किया है कि पाम यानि ताड़ के पौधों से निकलने वाली यह गैसें ग्लोबल वार्मिग के लिए भी जिम्मेदार हैं।

क्या कहती है रिसर्च?
जरनल नेचर कम्युनिकेशन्स में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार नॉटिंघम यूनिवर्सिटी के अध्ययनकर्ताओं ने पाम ट्री प्लांटेशन (ताड़ के पौधारोपण) के अलग-अलग चरणों में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन की जांच की। अध्ययनकर्ताओं ने यह शोध मलेशिया के उत्तरी सेलांगोर पीट के जंगल में किया।

क्या है ताड़ का तेल?
ताड़ के तेल का उपयोग आमतौर पर अफ्रीका, दक्षिण पूर्व एशिया और दक्षिण अमेरिका के कुछ देशों में खाना पकाने के तेल के रूप में किया जाता है, अन्य प्रकार के तेलों के मुकाबले इसमें ट्रांस फैट कम होने के कारण स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं की वजह से इसका इस्तेमाल दुनियाभर में बढ़ गया है।

रिसर्च के दौरान शोधकर्ताओं ने बताया है कि पाम ऑयल एक वनस्पति तेल है, जिसकी दुनिया में सबसे अधिक खपत होती है। इतना ही नहीं, पिछले 18 सालों में वैश्विक स्तर पर पाम ऑयल की मांग तीन गुना से अधिक बढ़ी है। साल 2000 में जहां पाम ऑयल का उत्पादन करीब 2 करोड़ टन होता था वहीं, साल 2018 में यह बढ़कर 7 करोड़ टन हो गया। मलेशिया दुनिया में पाम ऑयल का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है।

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कैसे की गई रिसर्च?
इस रिसर्च के तहत शोधकर्ताओं ने चार अलग-अलग चरणों में पांच जगहों का विश्लेषण किया, जिसमें पहली जगह थी सेकंडरी फॉरेस्ट यानि घना जंगल

  • दूसरी जगह पर हाल में सूखा जंगल था, मगर साफ नहीं था
  • तीसरी जगह साफ थी और यहां हाल ही में नए पाम ऑयल के पौधे लगाए गए थे।
  • चौथी जगह में पाम ऑयल के बड़े पौधे थे।

शोधकर्ताओं को इन जगहों पर मिट्टी और गैस के विश्लेषण से पता चला कि ताड़ के बड़े पेड़ों की तुलना में छोटे पौधे 50 प्रतिशत ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ रहे थे। शोधकर्ताओं ने कहा कि पाम ऑयल के छोटे पौधे से निकलने वाली यह गैस कुल ग्रीनहाउस गैसों का लगभग एक चौथाई हिस्सा है। इस लिहाज से उष्णकटिबंधीय दलदली जंगल, वैश्विक स्तर पर कार्बन डाइऑक्साइड को बढ़ाने के लिए लगभग 20 प्रतिशत तक जिम्मेदार हैं।

ताड़ के पौधे से ये गैसें भी निकलती हैं
शोधकर्ताओं ने कहा कि पीटलैंड्स यानि दलदलीय जगह के सूखने से मिट्टी में ऑक्सीजन का स्तर बढ़ जाता है। इसके चलते जैविक पदार्थों के गलन या सड़न की दर में वृद्धि हो जाती है और इनसे बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड गैस निकलने लगती है। इसके अलावा ताड़ के छोटे पौधे मीथेन और नाइट्रोक्सीपेरोक्सी नाइट्रेट जैसी ग्रीनहाउस गैस छोड़ते हैं, जो हमारे पर्यावरण के लिए खतरनाक हैं।

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ग्रीन हाउस गैसों का हमारे स्वास्थ्य पर प्रभाव?
myUpchar से जुड़ी डॉक्टर फतमा के मुताबिक ग्रीनहाउस गैसों के बढ़ने के कारण एसिड रेन बनती है, जिससे त्वचा की समस्याओं के साथ क्रोनिक लंग (फेफड़ों से जुड़ी घातक बीमारी) की समस्या और अस्थमा, ब्रोंकाइटिस (bronchitis) की परेशानी भी आती है।

डॉक्टर बताती हैं कि इसके अलावा ग्रीनहाउस गैसों के बढ़ते स्तर के कारण बिल्डिंग और फसलों को भी नुकसान पहुंचता हैं। उदाहरण के लिए ताजमहज (दुनिया के अजूबों में से एक) का रंग इन गैसों की वजह से फीका पड़ रहा है। 

कैसे करें बचाव
डॉक्टर के मुताबिक ताड़ की खेती के जरिए छोटे पौधे से निकलने वाली गैंसों पर नियंत्रिण तभी हो सकता है जब पाम ऑयल का अन्य विकल्प तलाशा जाए।

काफी संख्या में लोग पाम ऑयल का इस्तेमाल खाना बनाने के लिए करते हैं। इसलिए बड़े स्तर पर इसकी खेती होती है। मगर ताड़ के छोटे पौधों से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसें ग्लोबल वार्मिंग में हिस्सादारी निभा रही हैं, जिससे तमाम बीमारियों का खतरा बढ़ा है। इसलिए पाम ऑयल का बेहतर विकल्प ही इन बीमारियों से हमारा बचाव कर सकता है।

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