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शोधकर्ताओं ने ट्रॉमेटिक ब्रेन इंजरी को डिटेक्ट करने के लिए नई डिवाइस तैयार की है। इसकी मदद से वे हेड इंजरी होने पर मस्तिष्क द्वारा तुरंत रिलीज किए जाने वाले केमिकल बायोमार्कर्स को पहचानने में कामयाब रहे हैं। इससे वे ये बताने में सफल रहे कि (सिर में लगी चोट के चलते) ब्रेन इंजरी होने पर मरीजों को कब तुरंत मेडिकल अटेंशन की जरूरत होती है। इससे यह जरूरी उपचार समय रहते दिया जा सकता है और मरीजों को गैर-जरूरी टेस्टों से भी नहीं गुजरना पड़ेगा।

इस तकनीक को इंग्लैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ बर्मिंघम के एक वैज्ञानिक समूह एडवांस नैनोमैटीरियल्स, स्ट्रक्चर्स एंड एप्लिकेशंस (एएनएसएसए) के शोधकर्ताओं ने तैयार किया है। इस मेथड के तहत स्पेक्ट्रोस्कोपिक तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है, जिसे सरफेस इनहांस्ड रमन स्कैटरिंग कहते हैं। इसमें लाइट बीम को केमिकल बायोमार्कर पर छोड़ा जाता है। यह बायोमार्कर पिन चुभा कर लिए गए ब्लड सैंपल से लिया जाता है। फिर इसमें एक विशेष ऑप्टोफ्लूडिक चिप को डाला जाता है। इस चिप के जरिये एक हाईली स्पेशिलाइज्ड सरफेस पर ब्लड प्लाज्मा और फ्लो को अलग किया जाता है। बीम लाइड के कारण बायोमार्कर में वाइब्रेशन या रोटेशन देखने को मिलती है। इसी मूवमेंट की मदद से मिलने वाले संकेत के जरिये वैज्ञानिकों ने मस्तिष्क में लगी चोट की सटीक जानकारी हासिल की है।

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हालांकि, इंजरी की सही जानकारी जानने के लिए टेस्ट का अत्यधिक सेंसिटिव, रैपिड और स्पेसेफिक होना जरूरी है। यहां एएनएमएसए ग्रुप की बायोमेडिकल इंजीनियरिंग ने अपनी भूमिका निभाई है। उसने पॉलीमर और सोने की पतली परत की मदद से सस्ती लागत वाले प्लेटफॉर्म को विकसित किया। फिर उसे एक मजबूत इलेक्ट्रिक फील्ड में फिट किया गया। यहां से प्लेटफॉर्म की परत को एक विशेष पैटर्न में रीडिस्ट्रीब्यूट और बीम लाइट की सीध में लाने के लिए ऑप्टिमाइज किया जाता है। इस पूरी तकनीक और प्रक्रिया पर अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता डॉक्टर पोला गोल्डबर्ग ऑपनहेमर कहते हैं, 'यह तुलनात्मक रूप से ज्यादा सरल और तेज तकनीक है। इसकी लागत कम है, लेकिन ट्रॉमेटिक ब्रेन इंजरी का पता लगाने की इसकी क्षमता सटीक है, जोकि अब तक संभव नहीं था।'   

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