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टीबी यानी ट्यूबरकुलोसिस एक गंभीर बीमारी है और आमतौर पर इंसानों में पाई जाती है। एक अमेरिकी एजेंसी की ओर से जुटाए गए आंकड़ों के मुताबिक भारत में इसका प्रकोप सबसे अधिक है। साल 2016 में ही भारत में 20 लाख 79 हजार लोग टीबी से ग्रस्त पाए गए थे और इसमें से करीब साढ़े 4 लाख लोगों की मौत हो गई। यह बीमारी सिर्फ इंसान ही नहीं, बल्कि जानवरों को भी अपना शिकार बनाती है। जानवरों में होने वाली टीबी को बोवाइन टीबी कहते हैं। वैज्ञानिकों के कड़े परिश्रम के बाद जानवरों में भी इस बीमारी के इलाज को ढूंढ निकाला गया है। शोधकर्ताओं ने एक ऐसी वैक्सीन (बीसीजी) तैयार की है, जिसके जरिए पशुओं में बढ़ती इस बीमारी पर रोक लगाई जा सकती है।

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क्या कहती है रिसर्च?
जरनल साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित रिसर्च के मुताबिक अध्ययनकर्ताओं ने एक नोबेल वैक्सीन और स्किन टेस्ट विकसित किया है जो पशुओं में बोवाइन टीबी की रोकथाम करेगा।

रिपोर्ट के अनुसार अध्ययन से जुड़ी यूनिवर्सिटी ऑफ सरे की टीम ने यह वैक्सीन तैयार की है। यह वैक्सीन ट्युबरकुलिन स्किन टेस्ट (पीपीडी) के सिंथेटिक फॉर्म के साथ काम करती है और पूरे यूनाइटेड किंगडम (यूके) में जानवरों में होने वाले टीबी के टेस्ट के लिए इस्तेमाल होती है।

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क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
रिसर्च से जुड़े शोधकर्ता जॉनजो मैकफेडन का कहना है कि ये नई वैक्सीन टीबी से पशुओं की सुरक्षा करेगी, जो दुनियाभर में 50 मिलियन (5 करोड़) से अधिक मवेशियों को संक्रमित करती है और किसानों के लिए भी आर्थिक रूप से विनाशकारी साबित होती है।

क्या है बोवाइन टीबी?
बोवाइन टीबी एक संक्रामक बीमारी है, जो पशुओं के फेफड़ों को प्रभावित करती है। इस बीमारी से ग्रसित पशुओं को अन्य से अलग कर दिया जाता है और कई बार उन्हें मार दिया जाता है।

बोवाइन टीवी से बचाएगी नई वैक्सीन?
बेकील कैलमे गुएरिन (बीसीजी) वैक्सीन, जो वर्तमान में टीबी के खिलाफ इंसानों को सुरक्षा मुहैया कराती है वह मवेशियों में भी प्रभावी है। हालांकि, यह पीपीडी टेस्ट के साथ उपयोगी नहीं होती।

कैसे बनाई गई बीसीजी वैक्सीन?
अध्ययन के दौरान शोधकर्ताओं ने बीसीजी का एक विशेष प्रकार का वैक्सीन तैयार किया। इसमें से कुछ ऐसे प्रोटीन को हटा दिया गया, जो माइकोबैक्टीरिया बोविस नामक रोगजनक से भी संबंधित थे। इस तरह से खास तरह के प्रोटीन को हटाने से बीसीजी की कार्यक्षमता को नुकसान पहुंचाए बिना उसे बोविस टीबी के खिलाफ एक बड़े हथियार के रूप में तैयार किया गया।

  • सिंगल जीन्स से मुक्त बीसीजी स्ट्रेन्स को गाय में इंजेक्ट किया गया और उसके सर्वाइवल रेट की जांच की गई। इस तरह शोधकर्ताओं की टीम को उन जीन्स को पहचानने में मदद मिली, जिन्हें बीसीजी वैक्सीन की कार्यक्षमता से समझौता किए बिना हटाये जा सकता था।
  • इन डिस्पेंसेबल जीन एनकोडिंग इम्युनोजेनिक प्रोटीन्स को बीसीजी क्रोमोसोम से पूरी तरह से हटा दिया गया और इस तरह से स्ट्रेन मुक्त बीसीजी बनाने में मदद मिली।
  • इन हटाए गए इम्यूनोजेनिक प्रोटीन की मदद से एक पीपीडी जैसे नए सिंथेटिक स्किन टेस्ट का विकास किया गया। जिन जानवरों में टीबी है उनमें यह पॉजिटिव दिखेगा, जबकि पीपीडी के उलट स्ट्रेन रहित बीसीजी से वैक्सीनेटेड जानवरों में यह नेगेटिव रहेगा। यानि उनमें टीबी के लक्षण नहीं रहेंगे।

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नई वैक्सीन से होगा पशुओं का इलाज
शोधकर्ताओं ने इस रिसर्च के बाद वैक्सीन के सकारात्मक प्रभाव की जांच करने के लिए ग्युआना पिग्स (सुअरों) में इसका परीक्षण किया। जांच में पाया गया कि टीबी से ग्रसित जिन सुअरों को स्ट्रेन रहित बीसीजी से वैक्सीनेट किया गया था उनमें सिंथेटिक स्किन टेस्ट में टीबी के लक्षण नहीं पाए गए। जिन सुअरों को वैक्सीनेट नहीं किया गया था उनमें टीबी के लक्षण दिखे।

पीपीडी के विपरीत, नया स्किन टेस्ट उन जानवरों में भी काम करता है, जिन्हें टीबी से बीसीजी माइनस वैक्सीनेशन के जरिए बचाव उपलब्ध कराया गया है।

संभावित रूप से अब नया बीसीजी वैक्सीन किसानों और पशु चिकित्सकों की समस्या को हल कर पशुओं को टीबी जैसी गंभीर बीमारी से बचाएगा। साथ ही एक डायग्नोस्टिक टेस्ट के रूप में भी काम करेगा, जो टीबी की जांच करेगा।

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