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क्षय रोग (टीबी) को ठीक करने के लिए कम से कम छह महीने के उपचार की आवश्यकता होती है। अगर उपचार अधूरा रहा जाता है, तो रोगियों को ठीक करना मुश्किल हो जाता है और दवा प्रतिरोध विकसित हो सकता है। 

डॉट्स विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा अनुमोदित और स्वास्थ्य कर्मियों, समुदाय के स्वयंसेवकों या परिवार के सदस्यों द्वारा रोगियों को दवा समय पर लेने के लिए प्रोत्साहित करने और कोर्स पूरा हो इस बात के पालन में सुधार करने के लिए बनाई एक स्वास्थ्य रणनीति है।

यह बताना तो मुश्किल है कि कौन व्यक्ति समय पर पूरा कोर्स लेगा और कौन नहीं लेगा। सभी सामाजिक वर्गों, शैक्षिक पृष्ठभूमि, आयु, लिंग और जातियों के लोगों में दवाओं को सही तरीके से लेने में समस्याएं हो सकती हैं।

अध्ययनों से यह पता चलता है कि स्वयं ध्यान रख कर दवा लेने वाले लोगो में इलाज पूरा करने की दर 61% है और वहीं इसकी तुलना में डॉट्स के अंतर्गत इलाज करने वाले लोगो में कोर्स पूरा करने वालों की दर 86-90% है।

इस लेख में विस्तार से बताया गया है कि डॉट्स क्या है, डॉट्स उपचार कैसे होता है और डॉट्स उपचार केंद्र क्या होते हैं और इसके साथ यह भी बताया गया है कि डॉट्स इलाज के फायदे और साइड इफेक्ट क्या हो सकते हैं।

(और पढ़े - टीबी के घरेलू उपाय)

  1. डॉट्स क्या है - DOTS kya hai in hindi
  2. डॉट्स उपचार कैसे होता है - DOTS treatment procedure in hindi
  3. डॉट्स इलाज के फायदे - DOTS ke fayde in hindi
  4. डॉट्स इलाज के साइड इफेक्ट - DOTS ke side effect in hindi
  5. डॉट्स सेंटर - DOTS kendra in hindi

डॉट्स (DOTS), डॉट्स की फुल फॉर्म है डायरेक्टली ऑब्ज़र्व्ड थेरेपी शार्टटर्म कोर्सेज हिंदी में इसका अर्थ प्रत्यक्ष रूप से पर्यवेक्षित चिकित्सा के छोटे पाठ्यक्रम होता है।

टीबी के रोगी अपनी सारी दवा समय पर ले सकें यह सुनिश्चित करने की रणनीति को ही डॉट्स कहा जाता है। रोगी को स्वीकार्य और स्वास्थ्य सिस्टम द्वारा निर्धारित एक 'पर्यवेक्षक' रोगी को दवा की हर खुराक लेने के लिए प्रोत्साहित करता है और स्वास्थ्य सिस्टम द्वारा निगरानी के लिए इसका रिकॉर्ड रखता है।

डॉट्स वर्तमान में टीबी नियंत्रण के लिए डब्ल्यूएचओ द्वारा अनुशंसित रणनीति है। डॉट्स में 6 से 9 महीने के लिए चार दवाओं आईएनएच, आरआईएफ, पायराज़िनमाइड (पीजेडए) और एथमबुटोल (ईएमबी) को उपचार में शामिल किया जाता है। उपचार पूरा होने की अधिकतम संभावना के लिए इलाज के पूरे कोर्स में डॉट्स का उपयोग किया जाना चाहिए।

सभी मरीजों को डॉट्स के तहत अपनी दैनिक टीबी दवाएं डॉट्स एजेंट के सामने लेनी पड़ती है। डॉट्स एजेंट आमतौर पर रोगी के समुदाय से ही एक स्वयंसेवक होता है या यह परिवार का सदस्य हो सकता है। डॉट्स एजेंट रोगी को यह नहीं कहता कि कौन सी दवाएं ली जानी चाहिए, बल्कि वह रोगी के डॉक्टर द्वारा निर्धारित कोर्स को पूरा करने में मदद करता है।

बच्चों और किशोरों सहित टीबी रोग वाले सभी रोगियों के लिए डॉट्स का उपयोग किया जाना चाहिए। भारत में टीबी हो जाने पर प्रत्येक रोगी को अब भोजन के लिए एक महीने 500 रुपये की सरकारी सहायता दी जाती है। ऐसा इसलिए किया गया है क्योंकि भारत में टीबी होने का एक कारण पोषण का निम्न स्तर भी है।

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लोगों को उनके इलाज को पूरा करने में मदद के लिए, डॉट्स यानी डायरेक्टली ऑब्ज़र्व्ड थेरेपी शार्ट कोर्सेज नामक एक कार्यक्रम की सिफारिश की जाती है। इसमें, एक स्वास्थ्य देखभाल कर्मचारी आपकी दवा का प्रबंधन करता है ताकि आपको इसे स्वयं ही याद रखना न पड़े।

डॉट्स में निम्नलिखित बातें शामिल होती हैं -

  • डॉक्टर द्वारा निर्धारित दवा रोगी को देना।
  • दवा से किसी प्रकार के साइड इफेक्ट के लिए जाँच करना।
  • रोगी को दवा लेने के लिए प्रोत्साहित करना और अगर भूल जाता है तो याद दिलाना।
  • डॉक्टर या इलाज केंद्र पर रोगी के आने-जाने के दस्तावेज तैयार करना।
  • रोगी के सवाल का जवाब देना।

आमतौर पर भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग के द्वारा निर्धारित टीबी केंद्र डॉट्स के तहत मरीज की देखरेख के लिए कोई नर्स या कार्यकर्ता प्रदान करते है।

टीबी उपचार शुरू होते ही डॉट्स शुरू की जानी चाहिए। रोगी को डॉट्स प्रदान करने से पहले दवाओं को स्वयं लेने या छूट गयी खुराक लेने की कोशिश करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

यदि रोगी डॉट्स को एक जबरदस्ती वाले उपाय के रूप में देखता है, तो सफलतापूर्वक चिकित्सा को पूरा करने की संभावना बहुत कम हो जाती है। इसलिए डॉट्स निर्धारित करने वाले डॉक्टर द्वारा रोगी को समझाकर डॉट्स के लिए समर्थन दिखाना चाहिए कि यह व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है और बहुत प्रभावी होता है। डॉट्स एजेंट को भी इसी संदेश को रोगी तक पहुंचाना चाहिए।

रोगी पर केंद्रित केस प्रबंधन दृष्टिकोण के साथ अगर डॉट्स का उपयोग किया जाए तो यह सबसे अच्छा काम करता है।

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डॉट्स थेरेपी का उपयोग करने से बीमारी से ठीक होने वाले लोगों के प्रतिशत में वृद्धि होती है। उदाहरण के लिए, विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, बांग्लादेश, नेपाल और चीन जैसे देशों में 80 प्रतिशत से अधिक लोग डॉट्स के कारण अपना कोर्स पूरा कर लेते हैं।

डॉट्स थेरेपी का एक अन्य लाभ यह है कि टीबी नियंत्रित होने के कारण थेरेपी से गुजरने वाले मरीज़ द्वारा अन्य लोगों को संक्रमित करने का जोखिम कम हो गया है। इसलिए यह थेरेपी सामान्य जनसंख्या को संक्रमण से बचाती है और संचरण दर को कम कर देती है।

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डॉट्स प्रणाली  खासकर उन देशों में अधिक प्रभावी हो सकती है, जो बीमारी के अत्यधिक बोझ से पीड़ित हैं। डॉट्स थेरेपी बीमारी के प्रसार को कम करके लंबी अवधि में देश को लाभ पहुंचा सकती है, जिससे उस देश की स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं पर लागत का बोझ कम होता है और अधिक नागरिकों को आर्थिक रूप से उत्पादक होने में मदद मिलती है।

जिन लोगों को डॉट्स के तहत दवा दी जाती है, उससे वास्तव में उन्हें प्रेरित रहने में मदद मिलती है। डॉट्स यह भी सुनिश्चित करता है कि आपका टीबी पूरी तरह से ठीक हो गया है। यह बहुत सफल प्रणाली है और दुनिया भर में 180 से अधिक देशों में इसका उपयोग किया जाता है। यह सैकड़ों हजारों लोगों की जान बचा रही है।

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किसी भी दवा से, दुष्प्रभाव होने की संभावना हमेशा रहती है। अधिकांश प्रभाव चिंता का कारण नहीं होते हैं और जल्दी ही उनका असर चला जाता है।

आपके इलाज शुरू करने से पहले आपकी टीबी नर्स या डॉक्टर आपको संभावित साइड इफेक्ट्स की जानकारी देते हैं। इनमें चक्कर आना या उल्टी जैसा महसूस होना, त्वचा पर चकत्ते हो जाना, फ्लू जैसे लक्षण इत्यादि प्रभाव शामिल हो सकते हैं।

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बहुत कम मामलों में लोगों को पीलिया का भी अनुभव हो सकता है, जिसमे त्वचा या आंखों में पीलापन आ जाता है। यदि ऐसा होता है, तो अपनी दवा लेना बंद करें और अपने डॉक्टर को तुरंत बताएं।

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टीबी दवा शुरू करने वाले लगभग 30 से 40 प्रतिशत रोगियों को गंभीर दुष्प्रभावों का अनुभव होता है। इसके कारण कई रोगी डॉट्स के तहत अपने उपचार को बीच में छोड़ देते हैं।

डॉट्स कार्यक्रम के तहत, रोगी को एक समय में छह से सात गोलियाँ लेनी पड़ती है। कार्यक्रम चलाने वाले स्वास्थ्य कर्मचारी अक्सर दुष्प्रभावों के मुद्दे की उपेक्षा करते हैं। आदर्श रूप से, दुष्प्रभाव वाले किसी भी रोगी के बारे में तुरंत डॉक्टर को सूचित किया जाना चाहिए।

वैश्विक स्तर पर, भारत में क्षय रोग (टीबी) का बोझ सबसे अधिक होने का अनुमान लगाया जाता है। 2010 में, 8.8 मिलियन टीबी मामलों की अनुमानित वैश्विक वार्षिक घटनाओं में से, भारत में लगभग 2.2 मिलियन मामले दर्ज किए गए हैं, जिनमें से 0.9 मिलियन संक्रामक मामले थे यानी ऐसे मामलें जो इस रोग के किसी अन्य व्यक्ति से संक्रमण के कारण हुए हैं।

टीबी नियंत्रण की सफलता टीबी मामलों के शुरुआती स्तर पर ही पता लगाने और उचित उपचार पर निर्भर करती है और यह टीबी को रोकने के लिए वैश्विक योजना का आधार है।

भारत सरकार के संशोधित राष्ट्रीय क्षय रोग नियंत्रण कार्यक्रम (आरएनटीसीपी) के तहत 13,000 स्पुटम स्मीयर माइक्रोस्कोपी केंद्रों (टीबी का पता लगाने के लिए उपयोग की जाने वाली तकनीक से युक्त केंद्र) के नेटवर्क के माध्यम से विकेंद्रीकृत तरीके से जाँच ​​और उपचार सेवाओं तक पहुंच प्रदान करने के लिए प्रावधान किए गए हैं और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के अंतर्गत 6,50,000 डॉट्स केंद्र की स्थापना का भी प्रावधान किया गया है।

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अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनुशंसित डॉट्स रणनीति के आधार पर आरएनटीसीपी, टीबी के प्रसार को नियंत्रित करने और मृत्यु दर पर कटौती के लिए 1997 में लॉन्च किया गया था।

2006 तक डॉट्स कार्यक्रम पूरे भारत में 600 जिलों तक पहुंच गया था। लेकिन कुछ समस्याएं थीं। रोगियों की जाँच करने और दवाओं को निर्धारित करने में देरी रोग संचरण के चक्र को जारी रख रही थी। यह सुनिश्चित करने में भी कठिनाई थी कि रोगियों ने अपने कोर्स को पूरा किया या नहीं।

2007 में दवा प्रतिरोधी टीबी के प्रबंधन के लिए डॉट्स-प्लस लॉन्च किया गया था। 2012 तक डॉट्स-प्लस सेवा (जिसे अब "ड्रग रेसिस्टेंट टीबी के प्रोग्रामेटिक प्रबंधन" के रूप में जाना जाता है) पूरे देश में विस्तारित किया गया था और 2013 तक यह सेवा सभी जिलों में उपलब्ध हो गयी थी। इस समय डॉट्स-प्लस सेवाओं को विकेंद्रीकृत करने का फैसला करने के बारे में सोचने का निर्णय लिया गया। इन सेवाओं को मुख्य आरएनटीसीपी सेवाओं में स्थानीय स्तर पर पूरी तरह से एकीकृत किया जाना था।

2014 में भारत ने बहु-दवा प्रतिरोधी टीबी की जाँच ​​और उपचार सेवाओं की सुविधा पूरे देश में उपलब्ध करवाने में सफलता प्राप्त कर ली। भारत में टीबी केयर के लिए मानक भी विकसित किए गए और 2014 में प्रकाशित किये गए थे। इसमें निर्धारित किया गया कि टीबी उपचार और देखभाल पूरे भारत में प्रदान करने के लिए क्या किया जाना चाहिए और जिसमें निजी क्षेत्र की क्या भूमिका होनी चाहिए और सार्वजनिक क्षेत्र की क्या भूमिका होनी चाहिए।

नेशनल स्ट्रेटेजिक प्लान (एनएसपी) 2017-2025, भारत सरकार द्वारा बनाई गयी एक योजना है जो भारत में टीबी को खत्म करने के लिए सरकार के रोड मैप को निर्धारित करती है। एनएसपी 2017 - 2025 उन गतिविधियों और बदलावों का वर्णन करती है जो भारत सरकार के अनुसार टीबी की घटनाओं के प्रसार और मृत्यु दर में कमी ला सकते हैं।

वर्तमान में सरकारी केंद्रों में टीबी दवाएं मुफ्त में मिलती हैं। एनएसपी की योजना है कि बाद में टीबी दवाएं निजी मेडिकल से भी मुफ्त में उपलब्ध होंगी। वर्तमान में यह माना जाता है कि सभी टीबी रोगियों में से केवल आधे ही मुफ्त दवाओं का उपयोग करते हैं।

ऐसा माना जाता है कि निजी अस्पतालों में उपलब्ध टीबी दवाएं समाज के उस वर्ग के बीच हीन सोच को दूर करने में मदद करेंगी जो दवा लेने के लिए सरकार द्वारा चलाये जा रहे सेंटर से संपर्क करने में संकोच करते हैं।

दिसंबर 2015 में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने एक टोल फ्री नंबर (1800-11-6666) लॉन्च किया है जहां लोग टीबी के लिए परामर्श और उपचार सहायता प्राप्त कर सकते हैं।

नोट - ये लेख केवल जानकारी के लिए है। myUpchar किसी भी सूरत में किसी भी तरह की चिकित्सा की सलाह नहीं दे रहा है। आपके लिए कौन सी चिकित्सा सही है, इसके बारे में अपने डॉक्टर से बात करके ही निर्णय लें।

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