इलाज के बाद जब आपको अस्पताल से डिस्चार्ज किया जाता है, तो ऐसे में आपको लंबा चौड़ा बिल थमा दिया जाता है। अस्पताल के इस बिल में वे सेवाएं शामिल हैं, जो इलाज के दौरान मरीज को दी जाती हैं। इसमें कमरे का किराया भी शामिल है, जो अच्छा खासा जेब को प्रभावित करता है। मान लीजिए किसी व्यक्ति ने हेल्थ इन्शुरन्स लिया है, तो बीमाकर्ता द्वारा अस्पताल के बिल का निपटान किया जाएगा। ऐसे में क्लेम में कमरे के किराए को कैसे कैल्कुलेट किया जाएगा, यह समझना थोड़ा मुश्किलभरा हो सकता है। इसलिए नीचे लेख में इस बात पर जोर ​दिया गया है रूम रेंट कैपिंग और नो रूम रेंट कैपिंग क्या है।

  1. हेल्थ इन्शुरन्स में रूम रेंट कैपिंग क्या है? - What is Room Rent Capping in health insurance in Hindi
  2. हेल्थ इन्शुरन्स में नो रूम रेंट कैपिंग क्या है? - What is No Room Rent Capping in health insurance in Hindi
  3. हेल्थ इन्शुरन्स में कैपिंग की जरूरत क्यों है? - Why is Capping needed in health insurance in Hindi
  4. हेल्थ इन्शुरन्स में रूम रेंट क्यों करता है प्रभावित - Why does Room Rent affect in health insurance in Hindi

रूम रेंट कैपिंग का मतलब अस्पताल में भर्ती होने के दौरान, बीमा कंपनी की ओर से कमरे के किराए का कुछ प्रतिशत अदा करना है। यदि किसी बीमित व्यक्ति को अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत है, तो उसे तमाम मेडिकल बिल्स के साथ-साथ कमरे का किराया भी देना होता है, जिससे हॉस्पिटल का बिल बहुत बढ़ जाता है। रूम रेंट कैपिंग एक टर्म है, जिसमें बीमा कंपनी एक निश्चित सीमा तक कमरे के किराए का भुगतान कर सकती हैं।

मान लीजिए किसी व्यक्ति ने 3 लाख का हेल्थ इन्शुरन्स लिया है और पॉलिसी बॉन्ड के तहत रूम रेंट पर सम-इन्श्योर्ड का 1 प्रतिशत तक कवर किया जाएगा, तो इस लिहाज से बीमा कंपनी 3000 रुपये प्रति दिन तक किराए के रूम को कवर करेगी। हालांकि, कुछ बीमा कंपनी सम-इन्श्योर्ड का 1 से ज्यादा प्रतिशत भी कवर कर सकती हैं। बता दें, MyUpchar बीमा प्लस में भी सम-इन्श्योर्ड का 1 प्रतिशत कवर किया जाता है।

आईसीयू में भर्ती होने पर क्या होगा?

आईसीयू में भर्ती होने के मामले में बीमा कंपनी दोगुना कवर दे सकती है। यानी आम कमरों में जहां सम-इन्श्योर्ड का 1 प्रतिशत तक कवर किया जा रहा था, वहीं आईसीयू रूम में एक की जगह दो प्रतिशत या इससे ज्यादा भी कवर किया जा सकता है।

यदि कमरे का किराया पॉलिसी बॉन्ड में मौजूद निश्चित सीमा से बाहर है तो ऐसे में क्या होगा? इस स्थिति में बीमित व्यक्ति को अतिरिक्त शुल्क अपनी जेब से भरना होगा, इसलिए रूम रेंट कैंपिंग के तहत कितना कवर किया जाएगा, यह हेल्थ इन्शुरन्स लेते समय स्पष्ट कर लेना चाहिए।

(और पढ़ें - कैशलेस हेल्थ इन्शुरन्स क्या है)

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हेल्थ इन्शुरन्स में नो रूम रेंट कैपिंग क्या है?

रूम रेंट कैपिंग के अलावा आपने नो रूम कैपिंग टर्म सुना होगा, चलिए समझते हैं - सीधे शब्दों में कहा जाए तो नो रूम कैपिंग में कमरे के किराए को लेकर कोई सीमा नहीं होती है। यह अप-टू-सम इन्श्योर्ड (up to sum insured) होता है, जिसका मतलब है कि यदि अस्पताल में कमरे का किराया सम-इन्श्योर्ड राशि के बराबर या इससे कम है, तो बीमा कंपनी इस राशि को कवर करेगी।

कुल मिलाकर आप यह कह सकते हैं कि रूम चाहे 2000 का हो या 20000 रुपये प्रतिदिन वाला, आप किराए की चिंता किए बिना इच्छानुसार कमरा सेलेक्ट कर सकते हैं, बशर्ते वह सम-इन्श्योर्ड राशि के अंदर हो।

रूम रेंट कैपिंग का एक अन्य तरीका भी है, जिसमें बीमा कंपनी आपको स्पष्ट कर देगी कि वह एक निश्चित कमरे का किराया ही कवर करेगी। यह तो आप जानते हैं कि अस्पताल में कमरे कई तरह के होते हैं, जैसे पर्सनल वार्ड जिसमें केवल एक व्यक्ति रुकता है, सेमी शेयरिंग वार्ड जिसमें 2 मरीज के रुकने की व्यवस्था होती है और शेयरिंग वार्ड जिसमें 4 से 6 मरीजों को भर्ती किया जा सकता है। अब मान लीजिए आपकी हेल्थ इन्शुरन्स पॉलिसी में सेमी शेयरिंग वार्ड कवर किया जाता है, तो ऐसे में आप उसके किराए की चिंता किए बगैर सेमी शेयरिंग रूम में भर्ती हो सकते हैं। यहां ध्यान रखने योग्य बात यह भी है कि अगर किसी अन्य अस्पताल में निजी कमरा या प्राइवेट वार्ड का किराया किसी अन्य अस्पताल के सेमी-शेयरिंग से कम होगा तब भी बीमा कंपनी आपको प्राइवेट वार्ड के किराए का भुगतान नहीं करेगी।

(और पढ़ें - सबसे अच्छा हेल्थ इन्शुरन्स कौन सा है)

आमतौर पर, कुछ सामान्य तैयारियों व जरूरी टेस्ट करने के लिए अक्सर सर्जरी से एक दिन पहले भर्ती होने की आवश्यकता होती है, ताकि डॉक्टर जरूरी टेस्ट कर सकें और स्वास्थ्य की जांच कर यह पता लगा सकें कि मरीज उस सर्जरी के लिए तैयार है या नहीं। कुछ ऐसी भी सर्जरी या ऑपरेशन होते हैं, जिसके कई दिन बाद तक मरीज को अस्पताल में रुकने की जरूरत होती है, इस दौरान मरीज को मॉनिटर किया जाता है। इसके बाद जब डिस्चार्ज का समय आता है तो कमरे में रहने के साथ-साथ संबंधित मेडिकल बिल आपके हाथों में थमा दिया जाता है।

यदि हेल्थ इन्शुरन्स में रूम रेंट पर कैपिंग लगाई गई है तो बीमा कंपनी कमरे के किराए को एक निश्चित सीमा तक कवर करेगी, इसके विपरीत यदि हेल्थ इन्शुरन्स रूम रेंट पर कोई कैपिंग नहीं है, तो कमरे की किराए के बारे में आपको सोचने की जरूरत नहीं है। क्योंकि बीमा कंपनी नियम व शर्तों के तहत पूरा किराया चुका सकती है। यानी दोनों ही स्थितियों में पैसों से जुड़ी आपकी परेशानी कम होगी और आप इन्हीं पैसों को दूसरी जरूरी चीजों में लगा सकेंगे। इसीलिए हेल्थ इन्शुरन्स लेने वाले उम्मीदवार को यह सुझाव दिया जाता है कि वह पालिसी का चुनाव करने से पहले कैपिंग जैसे नियमों को अच्छे से समझ लें।

(और पढ़ें - हेल्थ इन्शुरन्स और लाइफ इन्शुरन्स में अंतर)

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भारत में अस्पताल में भर्ती होने के लिए अक्सर कई प्रकार के कमरे उपलब्ध मिल जाते हैं। इनमें ऊपर बताए गए कमरों/वार्ड के आलावा जनरल वार्ड, सेमी प्राइवेट (एसी/नॉन एसी), प्राइवेट (एसी/नॉन एसी), डीलक्स, सुपर डीलक्स शामिल हैं। यही नहीं इन कमरों में फ्रिज, एसी, टीवी, सोफा, गीजर इत्यादि फैसिलिटी होती हैं। इन कमरों के चार्जेस में भी अंतर है, जैसा पैसा वैसी सुविधा वाला रूम लिया जा सकता है। यही कारण है कि सुविधाओं के चक्कर में बिल बढ़ता जाता है और डिस्चार्ज के समय एक मोटा बिल देखने को मिलता है, जिसे यदि जेब से भरना पड़े तो यह आपके बजट को बिगाड़ सकता है।

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