यूनाइटेड किंगडम (यूके) के वैज्ञानिकों ने आर्थराइटिस (गठिया रोग) से टाइप 2 डायबिटीज का खतरा बढ़ने का अंदेशा जताया है। यूके स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ मैनचेस्टर (यूओएम) के इन वैज्ञानिकों ने यह भी कहा है कि इस खोज से यह संकेत मिलता है कि शरीर के इन्फ्लेमेटरी रेस्पॉन्स में भी इन दोनों बीमारियों की भूमिका हो सकती है। यूओएम के शोधकर्ता जीशिंग तियान और एड्रियन हील्ड ने अपने अध्ययन के आधार पर यह जानकारी दी है।

दरअसल, टाइप 2 डायबिटीज की शुरुआत होने और इसके बढ़ने में इन्फ्लेमेशन एक प्रमुख फैक्टर के रूप में सामने आया है और आर्थराइटिस एक ऑटोइम्यून तथा इन्फ्लेमेटरी बीमारी है। इस आधार पर अध्ययनकर्ताओं ने कहा है कि गठिया रोग से जुड़ी सिस्टमैटिक इन्फ्लेमेशन भविष्य में डायबिटीज पैदा होने के खतरे को बढ़ाने का काम कर सकती है।

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इस अनुमान से पहले वैज्ञानिकों ने आर्थराइटिस के मरीजों में टाइप 2 डायबिटीज होने से जुड़े मामलों का अध्ययन किया। इसके लिए दस मार्च, 2020 तक के मेडिकल और साइंटिफिक डेटाबेस को खंगाला गया। अलग-अलग अध्ययनों से निकाले इन आंकड़ों में से गठिया तथा टाइप 2 डायबिटीज के मामले निकाले गए। इसके बाद आर्थराइटिस से टाइप 2 डायबिटीज होने के संबंधित खतरे का पता लगाने के लिए आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इस अध्ययन में 16 लाख से ज्यादा प्रतिभागियों से जुड़े डेटा की बारीकी से स्टडी की गई। वैज्ञानिकों के मुताबिक, जिन अन्य अध्ययनों की मदद से ये आंकड़े इकट्ठा किए गए, उनमें से अधिकतर जनसंख्या आधारित थे और एक अध्ययन अस्पताल में किया गया था।

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जांच-पड़ताल के बाद शोधकर्ताओं ने पाया है कि आम जनसंख्या की तुलना में आर्थराइटिस के मरीजों में टाइप 2 डायबिटीज का खतरा 23 प्रतिशत ज्यादा बढ़ जाता है। इस बारे में अध्ययन के लेखकों ने कहा है, 'ये परिणाम इस बात का समर्थन करते हैं कि डायबिटीज के रोगजनन में इन्फ्लेमेटरी कारकों की भी भूमिका होती है। लिहाजा हमारी राय है कि गठिया रोग से पीड़ित लोगों में डायबिटीज के खतरों को मद्देनजर रखते हुए उनकी जांच और उपचार प्रबंधन को और बेहतर तरीके से किया जाना चाहिए। इसमें उन दवाओं से काम लिया जा सकता है जो टाइप 2 डायबिटीज में इन्फ्लेमेटरी लक्षणों को रोकने का काम करते हैं। इसमें इन एजेंटों (दवाओं) की भूमिका अहम हो सकती है।'

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