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परिचय

डायबिटीज के सबसे आम रूप को टाइप 2 मधुमेह कहा जाता है। यह ऐसी आम समस्या है, जिसके कारण खून में शुगर का स्तर बहुत अधिक बढ़ जाता है। टाइप 2 मधुमेह आमतौर पर वृद्ध लोगों में ही होता है, लेकिन यह कम उम्र वाले लोगों और यहां तक कि कभी-कभी बच्चों में भी हो सकता है। टाइप 2 मधुमेह में होने वाले लक्षण खून में शुगर की मात्रा पर निर्भर करते हैं। इसके कारण अत्यधिक प्यास लगना, बार-बार पेशाब आना, सुस्ती, थकान, नींद आना, धुंधला दिखना, अधिक भूख लगना और तेजी से वजन कम होना, जैसे लक्षण पैदा हो सकते हैं। 

समस्या का परीक्षण करने के लिए डॉक्टर आपके स्वास्थ्य संबंधी पिछली जानकारी के बारे में पूछते हैं और आपके लक्षणों की जांच करते हैं। आपके खून में शुगर के स्तर का पता लगाने के लिए खून टेस्ट भी किया जा सकता है। 

टाइप 2 मधुमेह को ठीक करना संभव नहीं है, लेकिन कुछ प्रकार के इलाज की मदद से इसको नियंत्रित करके रखा जा सकता है। टाइप 2 मधुमेह को कंट्रोल में रखने से मरीज स्वस्थ व एक्टिव जीवन जी पाता है। ज्यादातर लोग स्वस्थ भोजन, एक्सरसाइज और समय-समय पर ब्लड शुगर की जांच करवा कर टाइप 2 मधुमेह को कंट्रोल में रखते हैं।

लेकिन कुछ लोगों को डायबिटीज कंट्रोल करने के लिए दवाएं भी लेनी पड़ती हैं। खून में शुगर का स्तर अधिक रहने के कारण समय के साथ-साथ गंभीर समस्याएं विकसित होने लग जाती हैं, जिनमें हृदय, किडनी, नसें, आंखें, मसूड़े और दांत आदि प्रभावित होने लग जाते हैं।

(और पढ़ें - डायबिटीज में परहेज)

  1. टाइप 2 मधुमेह क्या है - What is Type 2 diabetes in Hindi
  2. टाइप 2 मधुमेह के लक्षण - Type 2 diabetes Symptoms in Hindi
  3. टाइप 2 मधुमेह के कारण व जोखिम कारक - Type 2 diabetes Causes & Risk Factors in Hindi
  4. टाइप 2 मधुमेह के बचाव - Prevention of Type 2 diabetes in Hindi
  5. टाइप 2 मधुमेह का परीक्षण - Diagnosis Type 2 diabetes in Hindi
  6. टाइप 2 मधुमेह का इलाज - Treatment of Type 2 diabetes in Hindi
  7. टाइप 2 मधुमेह की जटिलताएं - Complication of Type 2 diabetes in Hindi

टाइप 2 मधुमेह क्या है?

यह एक दीर्घकालिक मेडिकल समस्या है, जिसमें खून में मौजूद शुगर या ग्लूकोज का स्तर बहुत अधिक बढ़ जाता है। टाइप 2 मधुमेह में आपके शरीर की कोशिकाएं, इन्सुलिन के प्रति इतने अच्छे से प्रतिक्रिया नहीं दे पाती जितने अच्छे से देनी चाहिए।

(और पढ़ें - शुगर में क्या खाना चाहिए)

 

टाइप 2 मधुमेह के लक्षण क्या हैं?

टाइप 2 डायबिटीज में कई लोगों को कोई लक्षण महसूस नहीं होता, जबकि कुछ संकेतों को बुढ़ापे के संकेत समझ कर नजर अंदाज कर दिया जाता है। इसलिए टाइप 2 मधुमेह का पता अक्सर किसी अन्य बीमारी की जांच करने के दौरान ही लगता है। टाइप 2 मधुमेह में लोगों को अक्सर निम्न प्रकार के लक्षण महसूस होते हैं:

डॉक्टर को कब दिखाएं?

यदि आपके परिवार में किसी को डायबिटीज है और आपको ऊपर बताए गए लक्षणों में से कोई भी महसूस हो रहा है, तो जल्द से जल्द डॉक्टर के पास जाना चाहिए। 

(और पढ़ें - त्वचा पर चकत्तों के घरेलू उपाय)

टाइप 2 मधुमेह क्यों होता है?

एक स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में अग्न्याशय इन्सुलिन बनाता है, जिसकी मदद से शरीर भोजन से प्राप्त हुऐ शुगर को जमा करता है और उसका इस्तेमाल करता है। अक्सर निम्नलिखित स्थितियों के कारण टाइप 2 मधुमेह होता है:

  • जब अग्न्याशय इन्सुलिन बनाना बंद कर देता है।
  • जब अग्न्याशय बहुत ही कम मात्रा में इन्सुलिन बनाता है और शरीर में इतना इन्सुलिन नहीं हो पाता जितना जरूरी होता है। ऐसी स्थिति में शुगर कोशिकाओं में जाने की बजाए खून में जमा होने लग जाता है। 
  • जब शरीर इन्सुलिन पर ठीक तरीके से प्रतिक्रिया ना दे, इस स्थिति को “इन्सुलिन प्रतिरोध” (Insulin resistance) कहा जाता है। 
  • जब ग्लूकोज कोशिकाओं में जाने की बजाए खून में जमा हो जाता है, तो इसके कारण शरीर के कई हिस्सों में क्षति होती है। कोशिकाओं को आवश्यकता के अनुसार इन्सुलिन ना मिलने पर वे ठीक से काम नहीं कर पाती।

(और पढ़ें - इंसुलिन कैसे बनता है)

टाइप 2 मधुमेह होने का खतरा कब बढ़ता है?

कुछ कारक हैं जो टाइप 2 मधुमेह होने के जोखिम को बढ़ा देते हैं, जैसे:

  • उम्र:
    जैसे-जैसे आपकी उम्र बढ़ती है टाइप 2 मधुमेह होने का खतरा उतना ही बढ़ता जाता है, इसका खतरा आमतौर पर 45 साल की उम्र के बाद ही बढ़ने लगता है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि इस उम्र के बाद लोग अक्सर एक्सरसाइज आदि कम कर देते हैं, जिससे मांसपेशियां कमजोर होने लग जाती हैं और वजन बढ़ने लग जाता है। लेकिन टाइप 2 मधुमेह कम उम्र वाले लोगों, किशोरों और यहां तक कि बच्चों में भी हो सकता है।
    (और पढ़ें - मांसपेशियों की कमजोरी का इलाज)
     
  • वजन:
    सामान्य से अधिक वजन बढ़ना टाइप 2 मधुमेह का सबसे मुख्य जोखिम कारक है। आपके ऊतक जितने फैटी (वसायुक्त) होते हैं, आपकी कोशिकाएं उतनी ही इन्सुलिन की प्रतिरोधी बन जाती हैं। हालांकि यह जरूरी नही है कि मोटापा होने पर ही टाइप 2 मधुमेह होता है।
    (और पढ़ें - मोटापा कम करने का तरीका)
     
  • पारिवारिक समस्या:
    यदि आपके मां-बाप या भाई-बहन में से किसी को टाइप 2 मधुमेह है, तो आपको भी यह रोग होने का खतरा बढ़ जाता है।
     
  • चर्बी पेट में जमा होना:
    यदि आपके शरीर की चर्बी कूल्हे या जांघों की बजाए पेट में अधिक जमा हो रही है, तो टाइप 2 मधुमेह होने का खतरा बढ़ जाता है।
    (और पढ़ें - पेट की चर्बी कम करने के योगासन)
     
  • शरीर में गतिशीलता ना होना:
    आप शारीरिक रूप से जितने कम एक्टिव होंगे टाइप 2 मधुमेह होने का खतरा उतना ही अधिक होगा। शारीरिक गतिविधि की मदद से शरीर ग्लूकोज का एनर्जी के रूप में उपयोग करता है, जिससे आपकी कोशिकाएं इन्सुलिन के प्रति संवेदनशील हो जाती हैं। शारीरिक गतिविधि करने से आपके शरीर का वजन भी सामान्य रहता है।
    (और पढ़ें - इन्सुलिन टेस्ट क्या है)
     
  • पोलिसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम:
    महिलाओं में पोलिसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम (पीसीओएस) टाइप 2 मधुमेह के जोखिम को बढ़ा देता है। 

(और पढ़ें - पीसीओएस के लक्षण)

टाइप 2 मधुमेह का बचाव कैसे करें?

नीचे दिए गए कुछ उपायों की मदद से टाइप 2 मधुमेह से बचाव किया जा सकता है:

  • मधुमेह के बारे में जानें:
    इसके कारणों, जोखिम कारकों के बारे में जानें और यह पता लगाएं कि यह कितना गंभीर है।
     
  • नियमित रूप से जांच करवाने के लिए डॉक्टर के पास जाते रहें:
    जैसे-जैसे आपकी उम्र बढ़ती जाती है, नियमित रूप से ब्लड शुगर, ब्लड प्रेशर और ब्लड कोलेस्ट्रॉल के स्तर की जांच करने की आदत डाल लेनी चाहिए।
    (और पढ़ें - कोलेस्ट्रॉल कम करने के उपाय)
     
  • मीठे पदार्थ ना पिएं:
    मीठे पेय पदार्थों को पीने की जगह पर सादा पानी पिएं
    (और पढ़ें - खाली पेट पानी पीने के फायदे)
     
  • अपने शरीर के वजन को सामान्य रखें:
    शरीर में सामान्य से ज्यादा चर्बी, खासकर यदि पेट में चर्बी है तो उससे इन्सुलिन हार्मोन के प्रति रेसिसटेंस (प्रतिरोधकता) अधिक बढ़ जाती है।
     
  • बाहर का खाना ना खाएं:
    फास्ट फूड, जंक फूड व बाहर पका हुआ खाना ना खाएं या कम से कम खाएं।
     
  • शराब ना पिएं:
    अत्यधिक शराब पीने से शरीर का वजन बढ़ने लगता है और इससे आपका ब्लड प्रेशर भी बढ़ सकता है।
    (और पढ़ें - 
  • नियमित रूप से एक्सरसाइज करें:
    टाइप 2 मधुमेह से बचाव करने के लिए नियमित रूप से व्यायाम करना बहुत जरूरी है। हफ्ते के ज्यादातर दिनों में थोड़ी बहुत एक्सरसाइज करें, ऐसा करने से खून में शुगर का स्तर कम होता है और इससे ब्लड प्रेशर व कोलेस्ट्रॉल के स्तर में भी सुधार होता है।
     
  • स्वस्थ आहार खाएं:
    अपने भोजन में फाइबर से भरपूर खाद्य पदार्थों को शामिल करें।
    (और पढ़ें - शराब छुड़ाने के उपाय)
     
  • गतिहीन जीवन से बचें:
    यदि आप टाइप 2 मधुमेह से बचना चाहते हैं, तो अपने शरीर को एक्टिव रखें और गतिहीन होने से बचें।
     
  • धूम्रपान ना करें:
    जो लोग धूम्रपान नहीं करते उनके मुकाबले धूम्रपान करने वाले लोगों में टाइप 2 मधुमेह होने का खतरा दोगुना होता है।
    (और पढ़ें - धूम्रपान छोड़ने के घरेलू उपाय)
     
  • ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करें:
    नियमित रूप से एक्सरसाइज करने, स्वस्थ आहार खाने और शरीर का सही वजन बनाए रखने से ज्यादातर लोगों का ब्लड प्रेशर सामान्य रहता है। कुछ मामलो में स्थिति को कंट्रोल में रखने के लिए डॉक्टर से दवा भी लेनी पड़ सकती है। 

(और पढ़ें - हाई बीपी का इलाज)

टाइप 2 मधुमेह का परीक्षण कैसे किया जाता है?

परीक्षण के दौरान डॉक्टर आपसे लक्षणों और वे कितने समय से महसूस हो रहे हैं, आदि के बारे में पूछेगें। इस दौरान डॉक्टर मरीज के स्वास्थ्य संबंधी पिछली जानकारी भी पूछ सकते हैं। यदि आपके परिवार में किसी को भी डायबिटीज है, तो परीक्षण के दौरान डॉक्टर को इस बारे में बताना चाहिए।

डॉक्टर खून टेस्ट की मदद से भी टाइप 2 मधुमेह का पता लगा सकते हैं। यदि आपके खून में ब्लड शुगर का स्तर अधिक बढ़ गया है, तो खून टेस्ट की मदद से इसका पता लगाया जा सकता है।

(और पढ़ें - लैब टेस्ट क्या है)

परीक्षण के दौरान डॉक्टर निम्न प्रकार के ब्लड टेस्ट कर सकते हैं:

  • ए1सी (GlycatedHemoglobin) टेस्ट:
    इस टेस्ट की मदद से यह पता लग जाता है कि पिछले तीन महीनों से मरीज के शुगर का स्तर औसतन कितना रहा है। इस टेस्ट को कई नामों से जाना जाता है जैसे हीमोग्लोबिन ए1सी, एचबीए1सी, ग्लाइकेटेडहेमोग्लोबिन और ग्लाइकोसाइलेटेड हीमोग्लोबिन टेस्ट आदि। यह टेस्ट करवाने से पहले आप सामान्य रूप से कुछ भी खा सकते हैं। जब टाइप 2 मधुमेह का पता लगाने के लिए ए1सी टेस्ट करने की बात आती है, तो डॉक्टर उम्र का हिसाब लगाते हैं या फिर यह पता लगाते हैं कि कहीं आपको एनीमिया या खून संबंधी कोई अन्य समस्या तो नहीं है।

    जिन लोगो को एनीमिया होता है, ए1सी टेस्ट का रिजल्ट उनमें सटीक नहीं आता। यदि दो बार ए1सी टेस्ट करने के बाद दोनों बार के रिजल्ट में ए1सी का स्तर 6.5 प्रतिशत से ऊपर आता है, तो इसका मतलब है कि आपको डायबिटीज है। यदि रिजल्ट 5.7 से 6.4 के बीच आता है, तो यह “प्रीडायबिटीज” का संकेत देता है जिसका मतलब है कि आपको डायबिटीज होने का खतरा बहुत अधिक है। 5.7 से नीचे का स्तर सामान्य होता है।
    (और पढ़ें -एचएसजी टेस्ट क्या है)
     
  • रेंडम ब्लड शुगर टेस्ट:
    इस टेस्ट में सामान्य रूप से किसी भी समय शरीर से खून का सेंपल ले लिया जाता है। ब्लड शुगर के स्तर को मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर (mg/dL) के रूप में मापा जाता है। यह परवाह ना करते हुऐ कि आपने क्या खाया है और कब खाया है यदि आपके ब्लड शुगर टेस्ट का रिजल्ट 200 मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर या उससे ऊपर आ रहा है तो इसका मतलब आपको डायबिटीज है। खासकर यदि आपको डायबिटीज जैसे लक्षण भी महसूस हो रहे हैं, उदाहरण के लिए बार-बार पेशाब आना और अत्यधिक प्यास लगना।
    (और पढ़ें - ब्लड ग्लूकोज टेस्ट क्या है)
     
  • फास्टिंग ब्लड शुगर टेस्ट:
    यह टेस्ट करने के लिए मरीज के पूरी रात खाली पेट रहने के बाद सुबह-सुबह खून का सेंपल लिया जाता है। इसमें यदि टेस्ट के रिजल्ट में शुगर का स्तर 100 मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर आ रहा है, तो इसे सामान्य स्थिति कहा जाता है। यदि शुगर का स्तर 100 से 125 मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर आ रहा है, तो इसका मतलब आपको प्रीडायबिटीज है। यदि दो बार टेस्ट करने के बाद दोनों बार शुगर का स्तर 126 मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर या उस से ऊपर आ रहा है, तो इसका मतलब है आपको टाइप 2 मधुमेह हो गया है।
    (और पढ़ें - किडनी फंक्शन टेस्ट)
     
  • ओरल ग्लूकोज टोलेरेंस टेस्ट:
    इस टेस्ट के लिए मरीज को रातभर खाली पेट रहना पड़ता है और फिर सुबह फास्टिंग ब्लड शुगर टेस्ट करवाना पड़ता है। उसके बाद डॉक्टर मरीज को कोई मीठा पेय पदार्थ पिलाते हैं और उसके बाद हर दो घंटे में शुगर के स्तर की जांच की जाती है। 

यदि ब्लड शुगर का स्तर 140 मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर से कम है तो उसको सामान्य माना माना जाता है। 140 से 199 मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर के स्तर को प्रीडायबिटीज और 200 मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर या उससे ज्यादा स्तर बढ़ने पर टाइप 2 मधुमेह मान लिया जाता है। 

(और पढ़ें - बिलीरुबिन टेस्ट क्या है)

टाइप 2 मधुमेह का इलाज कैसे किया जाता है?

जीवनशैली में कुछ बदलाव करना और स्वस्थ आदतें अपनाना ही टाइप 2 मधुमेह को नियंत्रित रखने का सबसे पहला उपाय है, जिनमें निम्नलिखित तरीके शामिल है:

  • स्वस्थ भोजन खाएं जो आपके खून में शुगर के स्तर को और आपके शरीर के वजन को सामान्य बना कर रखें।
  • नियमित रूप से एक्सरसाइज करें, इससे शरीर में इन्सुलिन अधिक प्रभावी ठंग से काम करने लग जाता है और ब्लड प्रेशर को भी कम रखता है जिससे हृदय रोग का खतरा कम हो जाता है।
  • नियमित रूप से ब्लड शुगर की जांच करवाते रहने से यह पता लग जाता है, कि जो इलाज आपका चल रहा है वह टाइप 2 मधुमेह को नियंत्रित रखने में मदद कर रहा है या नहीं या फिर आपको इलाज में कुछ बदलाव करने की आवश्यकता है।

(और पढ़ें - डायबिटीज में परहेज)

हालांकि कभी-कभी स्वस्थ आहार खाना और नियमित रूप से एक्सरसाइज करना ब्लड शुगर को कम करने के लिए काफी नहीं होते हैं। टाइप 2 मधुमेह लगातार बढ़ने वाला रोग होता है। इसलिए आपको ब्लड शुगर को कंट्रोल रखने के लिए दवाओं की आवश्यकता पड़ सकती है। 

टाइप 2 मधुमेह के लिए ज्यादातर प्रकार की दवाएं खाने वाली टेबलेट या सिरप के रूप में ही मिलती हैं। हालांकि कुछ प्रकार की दवाएं इंजेक्शन के रूप में भी आती हैं।

(और पढ़ें - शुगर का आयुर्वेदिक इलाज)

टाइप 2 मधुमेह के लिए निम्नलिखित दवाएं उपयोग की जाती हैं:

  • मेटाफोर्मिन:
    ये दवाएं ब्लड शुगर के स्तर को कम कर देती हैं और इन दवाओं की मदद से शरीर इन्सुलिन पर भी अच्छे से प्रतिक्रिया देने लग जाता है।
     
  • अल्फा-ग्लूकोसाइड इनहिबिटर:
    ये दवाएं आपको शरीर में स्टार्च फूड को तोड़ने में मदद करती हैं, जैसे अकार्बोस और मिग्लीटोल आदि।
    (और पढ़ें - एचबीए1सी टेस्ट क्या है)
     
  • सल्फोनीलूरियस:
    यह शरीर में अधिक इन्सुलिन बनाने में मदद करती है।
     
  • मेग्लिटिनाइडस या ग्लिनाइडस:
    ये कम समय के लिए, तेजी से काम करने वाली दवाएं हैं, जो अधिक इन्सुलिन बनाने के लिए अग्न्याशय को उत्तेजित कर देती हैं। इनमें नेटग्लिनाइड और रेपाग्लिनाइड आदि शामिल हैं।
    (और पढ़ें - गर्भावस्था में शुगर का इलाज)
     
  • थायजोलिडिडायोन्स:
    ये दवाएं आपको इन्सुलिन के प्रति अधिक संवेदनशील बना देती हैं।
     
  • डिपेप्टीडाइल पेप्टिडेस-4 इनहिबिटर:
    ये दवाएं खून में शुगर के स्तर को कम करने के लिए इस्तेमाल की जाती हैं, ये दवाएं अधिक शक्तिशाली नहीं होती हैं, जैसे एलोग्लिप्टिन आदि।
    (और पढ़ें - डायबिटिक फुट अल्सर का इलाज)
     
  • ग्लूकागोन-लाइक पेप्टाइड-1 रिसेप्टर एगोनिस्ट:
    ये दवाएं पाचन शक्ति को कम कर देती हैं और ब्लड शुगर के स्तर में सुधार कर देती है। जैसे - एल्बिग्लूटाइड और डुलेग्लूटाइड।
     
  • सोडियम-ग्लूकोज कोंट्रास्पोर्टर-2 इनहिबिटर:
    इन दवाओं की मदद से किडनी को खून में शुगर फिर से अवशोषित करने से रोका जाता है और शुगर को पेशाब के माध्यम से शरीर के बाहर निकाल दिया जाता है। 

हालांकि ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने के लिए अंत में इन्सुलिन लेना शुरू करना ही पड़ता है। ऐसा तब होता है, जब आपका शरीर खुद से पर्याप्त मात्रा में इन्सुलिन बनाना बंद कर देता है, इसलिए इन्सुलिन की कमी की पूर्ति करने के लिए कुछ दवाएं लेते रहना पड़ता है।

(औक पढ़ें - हृदय रोग से बचने के उपाय)

टाइप 2 मधुमेह से क्या जटिलताएं होती हैं?

ज्यादातर लोगों में टाइप 2 मधुमेह को नियंत्रित करके रखा जा सकता है। टाइप 2 मधुमेह से शरीर के सभी अंग प्रभावित हो जाते हैं, जिससे निम्नलिखित गंभीर समस्याएं विकसित हो सकती हैं:

  • त्वचा संबंधी स्थितियां:
    टाइप 2 मधुमेह से आपको त्वचा संबंधी समस्याएं होने का खतरा बहुत अधिक बढ़ जाता है, जिनमें बैक्टीरियल इन्फेक्शन और फंगल इन्फेक्शन आदि शामिल हैं।
    (और पढ़ें - बैक्टीरिया क्या है)
     
  • सुनने संबंधी समस्याएं:
    टाइप 2 मधुमेह होने पर सुनने संबंधी समस्याएं होना भी आम होता है।
     
  • कार्डियोवास्कुलर रोग:
    इनमें हाई ब्लड प्रेशर, धमनियां सिकुड़ना, एनजाइना, हार्ट अटैक और स्ट्रोक आदि जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
    (और पढ़ें - हाई ब्लड प्रेशर में क्या खाएं)
     
  • किडनी संबंधी समस्याएं:
    इसमें मुख्य रूप से किडनी क्षतिग्रस्त होना और किडनी खराब होना जैसी समस्याएं होती हैं।
     
  • आंखों संबंधी समस्याएं:
    इसमें मोतियाबिंद, काला मोतियाबिंद, कम दिखना और यहां तक कि अंधापन भी हो सकता है।
    (और पढ़ें - मोतियाबिंद के घरेलू उपाय)
     
  • नसें क्षतिग्रस्त होना (न्यूरोपैथी):
    इस में हाथ व पैर सुन्न होने लग जाते हैं और सनसनी कम हो जाती है और साथ ही साथ पाचन संबंधी समस्याएं भी होने लग जाती हैं, जैसे उल्टी, दस्तकब्ज आदि।
     
  • पैर क्षतिग्रस्त होना:
    पैरों की नसें क्षतिग्रस्त होने या पैरों तक पर्याप्त खून ना जा पाने के कारण पैर संबंधी कई प्रकार की जटिलताएं होने का खतरा बढ़ जाता है। यदि त्वचा पर किसी प्रकार के कट या घाव आदि को बिना इलाज किए छोड़ दिया जाए, तो इससे गंभीर इन्फेक्शन हो सकता है, जिसको ठीक होने में काफी समय लग जाता है। कुछ गंभीर मामलों में डॉक्टरों को पैर का पंजा, पूरा पैर और यहां तक की टांग भी कटवानी पड़ सकती  है।

(और पढ़ें - कब्ज दूर करने के घरेलू उपाय)

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