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हर व्यक्ति के शरीर में प्रतिरक्षा प्रणाली होती है, उसे रोग प्रतिरोधक क्षमता भी कहा जाता है। प्रतिरक्षा प्रणाली का मुख्य कार्य शरीर को विभिन्न प्रकार के संक्रमण व रोगों से बचाना होता है। यह शरीर में मौजूद कोशिकाओं की एक प्रक्रिया होती है, ये कोशिकाएं पूरे शरीर में फैली होती हैं। प्रतिरक्षा प्रणाली लगातार शरीर में किसी प्रकार के विषाक्त पदार्थ, बैक्टीरिया, वायरस या अन्य किसी बाहरी पदार्थ की खोज करती रहती है। रोग प्रतिरोधक क्षमता के बिना हमारे शरीर में विभिन्न प्रकार के हानिकारक विषाक्त पदार्थ या बैक्टीरिया प्रवेश कर सकते हैं।

हालांकि कुछ ऐसी स्थितियां भी होती हैं, जिनके कारण प्रतिरक्षा प्रणाली ठीक से काम नहीं कर पाती है। इस स्थिति को आमतौर पर स्व-प्रतिरक्षित रोग (ऑटोइम्यून डिजीज) कहा जाता है। यह एक गंभीर व हानिकारक स्थिति होती है और यहां तक कि कुछ मामलों में जीवन के लिए हानिकारक स्थिति भी बन सकती है।

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  1. स्वप्रतिरक्षित रोग क्या है - What is Autoimmune disease in Hindi
  2. स्वप्रतिरक्षित रोग के लक्षण - Autoimmune disease Symptoms in Hindi
  3. स्वप्रतिरक्षित रोग के कारण - Autoimmune disease Causes in Hindi
  4. स्वप्रतिरक्षित रोग से बचाव - Prevention of Autoimmune disease in Hindi
  5. स्वप्रतिरक्षित रोग का परीक्षण - Diagnosis of Autoimmune disease in Hindi
  6. स्वप्रतिरक्षित रोग का इलाज - Autoimmune disease Treatment in Hindi
  7. स्वप्रतिरक्षित रोग की जटिलताएं - Autoimmune disease Complications in Hindi
  8. पूर्व पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को हुई जो बीमारी, जानें उसके बारे में सबकुछ
  9. स्वप्रतिरक्षित रोग के डॉक्टर

स्वप्रतिरक्षित रोग क्या है - What is Autoimmune disease in Hindi

स्वप्रतिरक्षित रोग क्या है?

स्वप्रतिरक्षित रोग में हमारे शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली शरीर के किसी स्वस्थ हिस्से को हानिकारक विषाक्त या फिर कोई बाहरी पदार्थ समझ लेती है और परिणामस्वरूप उसे क्षति पहुंचाने लगती है। इस स्थिति में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली संक्रमण की बजाए शरीर के स्वस्थ ऊतकों को नष्ट करने के लिए एंटीबॉडीज बनाने लग जाती है।

जब प्रतिरक्षा प्रणाली को लगता है कि शरीर के किसी हिस्से में कोई विषाक्त पदार्थ या बैक्टीरिया है तो वह प्रतिक्रिया के रूप में ऑटोएंटीबॉडीज बनाने लगती है और उन्हें प्रभावित हिस्से में मौजूद कोशिकाओं या बैक्टीरिया आदि को नष्ट करने के लिए भेज देती है।

(और पढ़ें - एंटीबॉडी क्या है)

स्वप्रतिरक्षित रोग के लक्षण - Autoimmune disease Symptoms in Hindi

स्वप्रतिरक्षित रोग से क्या लक्षण होते हैं?

किसी व्यक्ति में ऑटोइम्यून रोग के शुरुआती चरणों में निम्न लक्षण देखे जा सकते हैं: 

ऑटोइम्यून डिजीज शरीर के कौन से हिस्से को किस रोग के रूप में प्रभावित कर रहा है, उसके अनुसार इस स्थिति के मुख्य लक्षण भी अलग-अलग हो सकते हैं। स्वप्रतिरक्षित रोग के विभिन्न प्रकारों के अनुसार उनके अलग-अलग लक्षण कुछ इस प्रकार हो सकते हैं:

  • टाइप 1 डायबिटीज:
    अग्न्याशय इंसुलिन नामक हार्मोन बनाता है, जो ब्लड शुगर के स्तर को नियमित रखने का काम करता है। टाइप 1 डायबिटीज में प्रतिरक्षा प्रणाली अग्न्याशय में मौजूद उन कोशिकाओं को क्षति पहुंचाने लगता है, जो इंसुलिन बनाती हैं।
     
  • रूमेटाइड आर्थराइटिस:
    इस स्थिति में प्रतिरक्षा प्रणाली एंटीबॉडीज बनाने लगता है, जो शरीर के जोड़ों की कोशिकाओं से जाकर जुड़ जाते हैं। प्रतिरक्षा प्रणाली की कोशिकाएं उसके बाद जोड़ों को क्षति पहुंचाने लगती है, जिसके परिणामस्वरूप जोड़ों में दर्द, सूजन व लालिमा आदि लक्षण होने लगते हैं।
     
  • इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज (आईबीडी):
    प्रतिरक्षा प्रणाली आंतों की परत को क्षति पहुंचाती है, जिससे दस्त, गुदा से खून आना, अचानक से मल त्याग करने की इच्छा होना, शरीर का वजन कम होना, पेट दर्द और बुखार आदि लक्षण विकसित होने लगते हैं। अल्सरेटिव कोलाइटिस और क्रोन रोग, आईबीडी के दो मुख्य रूप हैं।
     
  • सिस्टेमिक लुपस एरीथेमाटोसस:
    इस स्थिति को लुपस भी कहा जाता है, इस रोग में प्रतिरक्षा प्रणाली एंटीबॉडीज बनाने लगता है। ये एंटीबॉडीज पूरे शरीर के ऊतकों से जुड़ जाते हैं। लुपस से प्रभावित शरीर के हिस्सों में मुख्य रूप से फेफड़े, रक्त कोशिकाएं, तंत्रिकाएं, गुर्दे और शरीर के जोड़ आदि शामिल हैं।
     
  • सीआईडीपी (Chronic inflammatory demyelinating polyneuropathy):
    इस रोग में प्रतिरक्षा प्रणाली तंत्रिकाओं को भी प्रभावित करती है और इसके लक्षण भी काफी समय तक रहते हैं। यदि इस स्थिति का उचित रूप से परीक्षण और इलाज न किया जाए तो इससे ग्रस्त लगभग 30 प्रतिशत मरीज पूरी तरह से गतिहीन हो जाते हैं, जिन्हें व्हीलचेयर का इस्तेमाल करना पड़ता है।
     
  • सोरायसिस:
    इस स्थिति में प्रतिरक्षा प्रणाली की अतिसक्रिय कोशिकाएं (ओवरएक्टिव सेल्स) जिन्हें टी सेल्स कहा जाता है, वे त्वचा में जमा हो जाती हैं। प्रतिरक्षा प्रणाली की गतिविधि त्वचा कोशिकाओं को तेजी से बनने के लिए उत्तेजित करने लग जाती है, जिसके परिणामस्वरूप त्वचा पर उभरे हुए पपड़ीदार चकत्ते बनने लगते हैं।
     
  • हाशिमोटो थायरोडिटिस:
    इस स्थिति में प्रतिरक्षा प्रणाली द्वारा बनाए गए एंटीबॉडी थायराइड ग्रंथि को क्षति पहुंचाने लगते हैं। इस स्थिति में थायराइड सामान्य से कम स्तर में बनने लग जाता है और धीरे-धीरे कुछ महीने से सालों के भीतर हाइपोथायरायडिज्म हो जाता है। इसके लक्षणों में थकान, कब्ज, वजन बढ़ना, तनाव, रूखी त्वचा और ठंड के प्रति संवेदनशीलता बढ़ना आदि लक्षण विकसित होने लगते हैं।
     
  • ग्रेव्स डिजीज:
    इस स्थिति में प्रतिरक्षा प्रणाली ऐसे एंटीबॉडीज बनाता है, जो थायराइड ग्रंथि को अधिक थायराइड हार्मोन बनाने के लिए उत्तेजित करते हैं और परिणामस्वरूप हाइपरथायराइडिज्म रोग विकसित हो जाता है। मरीज की आंखे असामान्य रूप से बाहर की तरफ उभरी हुई दिखाई देना, ग्रेव्स डिजीज का मुख्य लक्षण है। इसके शरीर का वजन घटना, परेशान रहना, चिड़चिड़ापन, हृदय की धड़कन तेज होना, कमजोरी महसूस होना और नाखून कमजोर हो जाना आदि भी शामिल हैं।
     
  • वाहिकाशोथ:
    इस रोग के दौरान प्रतिरक्षा प्रणाली रक्त वाहिकाओं को प्रभावित करके उन्हें क्षतिग्रस्त करने लगती है। वाहिकाशोथ से शरीर का कोई भी अंग क्षतिग्रस्त हो सकता है, इसलिए इसके लक्षण शरीर के प्रभावित हिस्से या अंग के अनुसार ही विकसित होते हैं।
     
  • मायस्थीनिया ग्रेविस:
    इस स्थिति में तंत्रिकाओं से जुड़े एंटीबॉडीज संबंधित मांसपेशियों को पूरी तरह से उत्तेजित नहीं होने देते। कोई गतिविधि करने पर कमजोरी के लक्षण बदतर हो जाना मायस्थीनिया ग्रेविस का एक मुख्य लक्षण होता है।
     
  • गिल्लन-बर्रे सिंड्रोम (जीबीएस):
    इस स्थिति में प्रतिरक्षा प्रणाली टांग और कुछ मामलों में बांह व शरीर के ऊपरी हिस्से की मांसपेशियों को नियंत्रित करने वाली तंत्रिकाओं को क्षतिग्रस्त करने लगती है। इस स्थिति के परिणामस्वरूप कमजोरी आने लगती है और कभी-कभी स्थिति गंभीर भी हो जाती है।
     
  • मल्टीपल स्क्लेरोसिस:
    इस स्थिति में प्रतिरक्षा प्रणाली तंत्रिका कोशिकाओं को क्षतिग्रस्त करने लग जाती है, जिसके कारण दर्द, अंधापन, कमजोरी, शरीर का संतुलन बिगड़ना और मांसपेशियों में ऐंठन जैसे लक्षण विकसित होने लगते हैं।

डॉक्टर को कब दिखाना चाहिए?

यदि आपको ऊपर बताए गए सभी लक्षणों में से कोई भी महसूस हो रहा है, तो आपको एक बार डॉक्टर से जांच करवा लेनी चाहिए। डॉक्टर पहले आपकी स्थिति की जांच करेंगे और फिर उसके अनुसार आपको आगे स्पेश्लिस्ट डॉक्टर के पास भेज देंगे।

रूमेटोलॉजिस्ट डॉक्टर जोड़ों संबंधी स्थितियों का इलाज करते हैं, जैसे रूमेटाइड अर्थराइटिस व साथ ही साथ अन्य स्वप्रतिरक्षित रोगों का इलाज भी करते हैं जैसे एसएलई और स्जोग्रेन सिंड्रोम

गेस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉक्टर विशेष रूप से जठरांत्र पथ से जुड़ी बीमारियों का इलाज करते हैं जैसे सीलिएक रोग और क्रोन रोग

एंडोक्राइनोलॉजिस्ट मुख्य रूप से ग्रंथियों से संबंधित रोगों का इलाज करते हैं जैसे ग्रेव्स रोग, हाशिमोटो थायरोडिटिस और एडिसन रोग

डर्मेटोलॉजिस्ट मुख्य रूप से त्वचा संबंधी रोगों का इलाज करते हैं, जैसे सोरायसिस आदि।

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स्वप्रतिरक्षित रोग के कारण - Autoimmune disease Causes in Hindi

स्वप्रतिरक्षित रोग क्यों होता है?

ऑटोइम्यून डिजीज किस कारण से विकसित होता है, अभी तक इस बारे में पूरी जानकारी नहीं मिल पाई है। हालांकि ऐसा भी माना गया है कि कुछ लोगों में अन्य के मुकाबले स्वप्रतिरक्षित रोग होने के जोखिम अधिक होते हैं। 2014 में किए गए एक अध्ययन में पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में ऑटोइम्यून डिजीज के अधिक मामले देखे गए, पुरुषों में इसके मामले 2.7 प्रतिशत जबकि महिलाओं में इसके मामले 6.4 प्रतिशत पाए गए। यह रोग अक्सर महिलाओं में 15 से 44 (गर्भाधारण की उम्र) साल की उम्र में देखा जाता है।

इसके अलावा विभिन्न समूहों के अनुसार भी कुछ प्रकार के स्वप्रतिरक्षित रोग अधिक विकसित होते हैं उदाहरण के लिए अफ्रीकी-अमेरिकी समूह से संबंध रखने वाले लोगों में लुपस होने का खतरा अधिक देखा गया है। स्वप्रतिरक्षित रोगों के कुछ प्रकार जैसे मल्टीपल स्क्लेरोसिस व लुपस आदि पीढ़ी दर पीढ़ी भी चलते रहते हैं। ऐसा जरूरी नहीं है कि परिवार के हर सदस्य को यह रोग हो जाए, लेकिन उनको स्वप्रतिरक्षित रोग होने की संभावना बढ़ जाती है। स्वप्रतिरक्षित रोगों के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं, इसलिए खोजकर्ता यह भी अनुमान लगा रहे हैं कि बढ़ते संक्रमण और केमिकल के संपर्क भी कहीं ना कहीं स्वप्रतिरक्षित रोगों के कारण से जुड़े हो सकते हैं।

वैज्ञानिकों का मानना है कि आजकल के आहार भी स्वप्रतिरक्षित रोग विकसित होने का खतरा बढ़ा देते हैं। अधिक फैट या शुगर वाले आहार या फिर बाहर तैयार हुऐ भोजन खाना सूजन व लालिमा जैसी स्थितियों को बढ़ा देते हैं, जो कुछ मामलों में स्वप्रतिक्षित रोग विकसित कर सकती है। हालांकि अभी तक किसी शोध में इसकी पुष्टि नहीं हो पाई है।

2015 में की गई स्टडी में “हाइजीन हाइपोथेसिस” नामक एक थ्योरी पर ध्यान दिया गया। एंटीसेप्टिक और टीकाकरण की मदद से आजकल के बच्चे पहले के मुकाबले काफी कम रोगाणुओं के संपर्क में आते हैं। हानिकारक रोगाणुओं के संपर्क में न आने के कारण प्रतिरक्षा प्रणाली को उनकी पहचान नहीं हो पाती और स्वस्थ कोशिकाओं को क्षति पहुंचाने का खतरा बढ़ जाता है।

स्वप्रतिरक्षित रोग से बचाव - Prevention of Autoimmune disease in Hindi

स्वप्रतिरक्षित रोग की रोकथाम कैसे की जाती है?

अभी तक ऑटोइम्यून डिजीज की रोकथाम का कोई तरीका नहीं मिल पाया है। हालांकि इससे होने वाले रोगों के लक्षणों को नियंत्रण में रखना संभव है।

स्वप्रतिरक्षित रोग का परीक्षण - Diagnosis of Autoimmune disease in Hindi

स्वप्रतिरक्षित रोग का परीक्षण कैसे किया जाता है?

किसी एक टेस्ट की मदद से सभी प्रकार के ऑटोइम्यून डिजीज का परीक्षण नहीं किया जा सकता। स्वप्रतिरक्षित रोगों का ठीक से परीक्षण करने के लिए डॉक्टर कई टेस्ट करते हैं और आपका शारीरिक परीक्षण करते हैं।

परीक्षण के दौरान डॉक्टर सबसे पहले शारीरिक परीक्षण शुरु करते हैं और उसके बाद आपके लक्षणों के अनुसार उचित टेस्ट निर्धारित किया जाता है। ऑटोइम्यून डिजीज का परीक्षण करने के लिए आमतौर पर निम्न टेस्ट किए जाते हैं:

स्वप्रतिरक्षित रोग का इलाज - Autoimmune disease Treatment in Hindi

स्वप्रतिरक्षित रोग का इलाज कैसे किया जाता है?

स्वप्रतिरक्षित रोगों के लिए इलाज विकल्प तो मौजूद हैं, लेकिन इस रोग को शरीर से पूरी तरह से खत्म नहीं किया जा सकता है। इलाज के द्वारा असाधारण तरीके से काम कर रही प्रतिरक्षा प्रणाली को रोका जा सकता है, जिससे सूजन, जलन, लालिमा, दर्द और अन्य स्थितियां कम होने लगती हैं। ऑटोइम्यून डिजीज के इलाज में आमतौर पर निम्न को शामिल किया जाता है:

  • नॉन स्टेरॉयडल एंटी इंफ्लेमेटरी दवाएं (NSAIDs), जैसे इबुप्रोफेन और नेपरोक्सेन आदि।
  • प्रतिरक्षा प्रणाली को दबाने वाली दवाएं (Immunosuppressive Medication), जो स्वप्रतिरक्षित रोग में होने वाली असामान्य प्रतिक्रियाओं को कम करने में मदद करती है।

इलाज का मुख्य लक्ष्य स्वप्रतिरक्षित रोग से होने वाले लक्षणों को कम करना होता है, इसलिए इलाज को रोग के प्रकार के अनुसार शुरु किया जाता है।

स्वप्रतिरक्षित रोग की जटिलताएं - Autoimmune disease Complications in Hindi

स्वप्रतिरक्षित रोग से क्या जटिलताएं हो सकती हैं?

स्वप्रतिरक्षित रोग से होने वाली जटिलताएं मुख्य रूप से उसके प्रकार पर निर्भर करती है। ज्यादातर प्रकार के स्वप्रतिरक्षित रोग दीर्घकालिक होते हैं, लेकिन उनमें से अधिकतर को इलाज की मदद से नियंत्रित किया जा सकता है।

प्रतिरक्षा प्रणाली को दबाने वाली दवाओं के भी कुछ गंभीर साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं, जैसे संक्रमण का जोखिम अत्यधिक बढ़ जाना।

Dr. Nikhil Pise

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Dr. Jasmine Kaur Chadha

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Dr. Yash Shah

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