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कोविड-19 संकट के दौरान मरीजों का इलाज करने में जुटे डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों को बार-बार आम लोगों के गुस्से का शिकार होने पड़ा है। उत्तर प्रदेश समेत देश के कई इलाकों से स्वास्थ्यकर्मियों के खिलाफ हिंसा की खबरें आई हैं। ऐसे में इन घटनाओं को रोकने के लिए केंद्र सरकार एक अध्यादेश लेकर आई है। महामारी अधिनियम, 1897 में संशोधन के लिए लाए गए इस अध्यादेश में स्वास्थ्यकर्मियों पर हमले के दोषियों के लिए छह महीने से सात साल तक की सजा का प्रावधान किया गया है।

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मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, इस अध्यादेश को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि सरकार इस संकट की लड़ाई में सबसे आगे खड़े स्वास्थ्यकर्मियों और डॉक्टरों पर हमला करने वाले लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करेगी। उन्होंने बताया कि स्वास्थ्यकर्मियों के खिलाफ अपराध को अध्यादेश के जरिये गैर-जमानती कृत्य करार दिया गया है। उन्होंने यह जानकारी भी दी कि अब ऐसे मामलों का निपटारा निश्चित समयावधि में कर दिया जाएगा। इस बारे में जानकारी देते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा, 'अब ऐसे अपराधों का संज्ञान लिया जाएगा और उनमें (आरोपित को) बेल नहीं मिलेगी। 30 दिनों के अंदर जांच पूरी कर ली जाएगी। आरोपित को तीन महीने से पांच साल तक की सजा सुनाई जा सकती है और 50,000 रुपये से लेकर दो लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।' वहीं, ज्यादा गंभीर मामलों में दोषी को छह महीने से लेकर सात साल तक की जेल हो सकती है।

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प्रकाश जावड़ेकर ने यह भी बताया कि हिंसा में स्वास्थ्यकर्मियों के वाहनों या क्लिनिकों को पहुंचाए गए नुकसान के बदले आरोपितों से क्षतिग्रस्त प्रॉपर्टी के बाजार मूल्य का दोगुना मुआवजा वसूला जाएगा। उन्होंने कहा, 'जो स्वास्थ्यकर्मी इस महामारी से देश को बचाने की कोशिश कर रहे हैं, दुर्भाग्य से उन्हें हमलों का सामना करना पड़ रहा है। उनके खिलाफ किसी तरह की हिंसा या उत्पीड़न को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इसलिए अध्यादेश लाया गया है, जिसे राष्ट्रपति से मंजूरी मिलने के बाद लागू कर दिया जाएगा।'

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