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इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने देश के स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में सुधार लाने के लिए आईएएस, आईपीएस और आईएफएस की तर्ज पर आईएमएस यानी इंडियन मेडिकल सर्विस की शुरुआत करने की मांग की है। देश में डॉक्टरों के इस सबसे बड़े संगठन ने एक बयान जारी कर कहा है कि देश के स्वास्थ्य प्रशासन में बड़े बदलावों की काफी जरूरत महसूस की जा रही है, जिन्हें (स्वास्थ्य क्षेत्र से आने वाले) प्रशासकों के नए कैडर की मदद से लागू किया जा सकता है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, आईएमए के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. राजन शर्मा ने कहा है कि आईएमएस के तहत चुने गए मेडिकल अधिकारी स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़ी कई अहम जिम्मेदारियां संभालेंगे। इनमें प्रशासनिक विभागों और बीमारियों की रोकथाम व नियंत्रण के लिए चलाए गए कार्यक्रमों से जुड़े पदों के अलावा केंद्र सरकार व राज्य सरकारों के स्वास्थ्य मंत्रालयों तथा विभागों में तमाम पदों का कार्यभार शामिल होगा।

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आईएमएस अध्यक्ष ने कहा कि आईएमएस एग्जाम के लिए न्यूनतम योग्यता एमबीबीएस होनी चाहिए। कोविड-19 संकट के बीच आईएमए की भूमिका को जोड़ते हुए डॉ. राजन शर्मा ने कहा, 'आईएमए पूरे उत्साह के साथ काम कर रहा है। लेकिन हम सरकार से आग्रह करते हैं कि वह कुछ बड़े प्रावधान करने की ओर ध्यान दे... कोविड-19 संकट के बाद नॉन-कोविड हेल्थ केयर के लिए भी तुरंत एक नई स्वास्थ्य नीति बनाने की जरूरत है।' आईएमए के बयान में यह भी कहा गया है कि अगर देश का सरकारी ढांचा और रणनीतियां बेहतर होतीं तो इस महामारी से और अच्छे तरीके से निपटा जा सकता था।

इस बाबत आईएमए के महासचिव डॉ. आरवी अशोकन ने कहा, 'सरकार को देश की जीडीपी का पांच प्रतिशत हिस्सा स्वास्थ्यगत ढांचे पर लगाने की अत्यंत आवश्यकता है। आईएमए यह मांग भी करता है कि देश के लोगों के स्वास्थ्य के लिए 'एक राष्ट्र और एक समुच्चय दिशा-निर्देश' का नियम बनाया जाए।' गौरतलब है कि कोविड-19 संकट के दौरान आईएमए केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के साथ मिलकर कई तरह के काम कर रहा है। इनमें स्वास्थ्यकर्मियों के लिए बीमा की उपलब्धता, डॉक्टरों के खिलाफ होने वाली हिंसा के विरुद्ध अध्यादेश, टेस्टिंग पॉलिसी में बदलाव, काम के दौरान पीपीई सुनिश्चित करना जैसे काम शामिल हैं।

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आरडीए ने भी की थी मांग
कोविड-19 महामारी ने देश के स्वास्थ्यगत ढांचे को लेकर डॉक्टरों और उनके संगठनों में चिंता पैदा की है। यही कारण है कि हाल के दिनों में उन्होंने भारतीय प्रशासन सेवा की तर्ज भारतीय आयुर्विज्ञान सेवा यानी आईएमएस की मांग तेज की है। आईएमए से पहले देश के सबसे बड़े अस्पताल अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) की रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन (आरडीए) भी इंडियन मेडिकल सर्विस की स्थापना की मांग कर चुकी है। बीते चिकित्सक दिवस से ठीक एक दिन पहले की गई इस मांग को आरडीए ने मौजूदा समय की बड़ी जरूरत बताया था। आरडीए के मुताबिक, चिकित्सा सेवाओं और सुविधाओं से जुड़े अहम फैसले और उन्हें पूरा करने के बीच कई तरह के गैप हैं, जिन्हें भरने के लिए आईएमएस एक पुल का काम कर सकता है।

दरअसल, कोविड-19 के बढ़ते मामलों और स्वास्थ्यगत ढांचे के अपर्याप्त विकेंद्रीकरण का हवाला देते हुए एम्स आरडीए ने कहा था कि कोरोना वायरस से निपटने के लिए सरकार और ब्यूरोक्रेसी के स्तर पर तमाम संभव प्रयास किए जाने के बाद भी कुछ कमियां अभी भी बाकी हैं। इस बाबत एक बयान जारी करते हुए आरडीए का कहना था, 'मौजूदा महामारी के दौरान संयुक्त रूप से हेल्थकेयर योजना और उसकी डिलिवरी की जरूरत महसूस की गई है। एक विश्वसनीय मेडिकल बैकग्राउंड वाले प्रशासकों की टीम तकनीकी मुद्दों पर ज्यादा बेहतर तरीके से ध्यान दे पाएगी।'

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बयान में आगे लिखा था, 'देशभर के डॉक्टर काफी समय से इंडियन मेडिकल सर्विस को बड़ी जरूरत बताते रहे हैं। यह (चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े) फैसलों और उनकी आपूर्ति के गैप को भर सकती है। साथ ही इससे उन डॉक्टरों की मांगों को भी पूरा करने में मदद मिलेगी जो नागरिकों की चिकित्सा सेवा करते हुए अक्सर बहुत मुश्किल परिस्थितियों का सामना करते हैं।' एम्स आरडीए ने यह भी कहा था कि वह इस 'नेक काम' के लिए देश की तमाम रेजिडेंट और प्रोफेशनल डॉक्टर्स एसोसिएशन्स से संपर्क करेगी और उनका समर्थन मांगेगी। अब इस सिलसिले में आईएमए भी खुलकर सामने आ गया है।

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