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घर से बाहर हर प्रकार की जमीन, खासतौर पर पथरीली और ऊबड़-खाबड़ सतह पर चलने के लिए जूते जरूरी हैं। सेहत बनाए रखने और फिट रहने में भी जूतों की भूमिका अहम है, क्योंकि इन्हीं की मदद से आप सख्त सतह पर काफी देर कर दौड़ते या वॉक करते रह सकते हैं। लेकिन अगर कोई कहे कि पैरों की सुरक्षा के लिए बनाए गए ये फुटवियर प्रॉडक्ट न सिर्फ उन्हें कमजोर कर सकते हैं, बल्कि उनसे जुड़ी कुछ आम और पीड़ादायक समस्याएं भी दे सकते हैं तो हैरानी होना लाजमी है। दरअसल, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में हुए एक अध्ययन के मुताबिक, जूतों की आगे की तरफ की हल्की घुमावदार शेप यानी पंजा इन समस्याओं की वजह बन सकता है। जूते के आगे के इस हिस्से को 'टो स्प्रिंग' कहते हैं। अध्ययन की मानें तो जूते, विशेष कर व्यायाम में पहने जाने वाले स्नीकर्स इन्हें पहनने वालों को ये समस्याएं ज्यादा दे सकते हैं।

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के 'क्रांतिकारी' बायोलॉजिस्ट कहे जाने वाले वैज्ञानिक डैनियल ई लेबरमैन और उनके दो सहयोगी शोधकर्ताओं ने टो स्प्रिंग और चलने (वॉकिंग) से जुड़े बायोमकैनिक्स पर उनके प्रभावों का अध्ययन किया है। इस प्रयास में इन वैज्ञानिकों ने पाया है कि जूते के टो स्प्रिंग का ज्यादा मुड़ा होने का मतलब है उसे पहनने वाले के पांव को कम ताकत मिलना, जिससे संबंधित फूट एरिया की कार्यक्षमता पर प्रभाव पड़ता है। अध्ययन से जुड़े वैज्ञानिकों की मानें तो इससे चलना तो आसान हो जाता है, लेकिन इस सुविधान के चिंताजनक परिणाम भी हो सकते हैं। उनका कहना है कि इस संभावित कमजोरी से प्लांटर फासिसाइटिस जैसी मेडिकल समस्याएं होने की संभावना बढ़ जाती है, जिनका इलाज मेडिकल साइंस में काफी मुश्किल माना जाता है।

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टो स्प्रिंग से जुड़े इस खतरे को समझने के लिए शोधकर्ताओ ने 19 से 33 वर्ष के 13 प्रतिभागियों को अध्ययन में शामिल किया। इन लोगों का औसत वजन 74 किलो था और लंबाई 182 सेंटीमीटर या पांच फीट नौ इंच थी। इन 13 प्रतिभागियों में से नौ पुरुष थे और चार महिलाएं। अध्ययन की शुरुआत के समय सभी का स्वास्थ्य सामान्य था। कोई भी प्रतिभागी किसी भी प्रकार की इन्जरी से पीड़ित नहीं था। अध्ययनकर्ताओं ने पहले उन्हें बिना जूते के यानी नंगे पांव ही ट्रेडमिल पर चलने को कहा। फिर पारंपरिक रूप से बने सैंडल्स के चार जोड़े पहन कर चलने को कहा गया। इन सैंडल्स के टो स्प्रिंग अलग-अलग एंगल पर बने थे। अध्ययन के मुताबिक, हरेक जोड़े में टो स्प्रिंग को 10 डिग्री, 20 डिग्री, 30 डिग्री और 40 डिग्री पर बनाया गया था। यहां जूते का इस्तेमाल इसलिए नहीं किया गया, क्योंकि वैज्ञानिकों का मानना था कि सैंडल्स की बनावट तुलनात्मक रूप से ज्यादा आसान होती है और वे उनकी मदद से प्रतिभागियों के पैरों पर विस्तृत मार्कर सेटिंग कर सकते हैं।

बहरहाल, जांच-पड़ताल के दौरान वैज्ञानिकों ने पाया कि अलग-अलग एंगल के टो स्प्रिंग से सैंडल (या जूते के) के आगे के भाग के कड़ेपन पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा था। उन्हें यह भी पता चला कि टो स्प्रिंग जितने ज्यादा एंगल पर बना होगा, उससे पांव के मेटाटार्सोफेलेंजियल जॉइंट्स पर उतना कम जोर पड़ता है। इससे वॉक करने वाले को आगे बढ़ने में कम दिक्कत होती है और वह ज्यादा आरामदेह महसूस करता है। इस तरह यह साफ हुआ कि टो स्प्रिंग से वॉकिंग से जुड़े बायोमकैनिक्स पर प्रभाव पड़ता है, जिससे चलना, जॉगिंग करना या दौड़ना ज्यादा सहज हो जाता है। लेकिन अध्ययनकर्ताओं को यह संकेत भी मिला कि इस सहजता की कीमत चुकानी पड़ सकती है।

परिणामों के आधार पर शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाते हुए कहा है कि चूंकि टो स्प्रिंग की बदौलत पांव को चलने में कम जोर लगाना पड़ता है, लिहाजा लंबे समय तक टो स्प्रिंग वाले जूते पहनने से पैरों से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं, जिनमें प्लांटर फासिसाइटिस भी शामिल है। हालांकि यह जानकारी केवल अनुमानित है। लेकिन शोधकर्ताओं ने जोर देकर कहा है कि टो स्प्रिंग वाले जूते पहनने से पैरों के संचालन पर तो प्रभाव पड़ता ही है। ऐसे में केवल इसी तरह के जूते पहनने के बजाय लोगों को अलग-अलग प्रकार के फुटवियर्स का इस्तेमाल करना चाहिए। वे दौड़ने के लिए बेयरफुट शूज का इस्तेमाल करें ताकि कम जोर लगने के चलते पांव को होने वाले नुकसान को कम से कम किया जा सके।

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