इंग्लैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ लेस्टर और ऑस्ट्रेलिया की यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ ऑस्ट्रेलिया के वैज्ञानिकों ने अपने एक नए अध्ययन में पाया है कि सही समय पर सोने का टाइप 2 डायबिटीज के मरीजों के बेहतर स्वास्थ्य और लाइफस्टाइल से संबंध है। अध्ययन की मानें तो जो लोग देर रात तक सोते हैं और देर से ही उठते हैं उनकी जीवनशैली ज्यादा गतिहीन हो जाती है। ऐसे लोगों की शारीरिक गतिविधियों का स्तर भी तुलनात्मक रूप से काफी कम होता है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, इस कारण इन लोगों के स्वास्थ्य के लिए खतरा ज्यादा बढ़ जाता है। डायबिटीज होने की सूरत में यह जोखिम और अधिक हो सकता है।

टाइप 2 डायबिटीज ऐसी मेडिकल कंडीशन है जो शरीर के वजन के ज्यादा बढ़ने और शारीरिक निष्क्रियता के कारण पैदा होती है। पूरी दुनिया में 46 करोड़ से ज्यादा लोग टाइप 2 डायबिटीज से ग्रस्त हैं। जानकारों के मुताबिक, अगले 20 सालों में यानी 2040 तक ऐसे मरीजों की संख्या 70 करोड़ तक होने का अंदेशा है। यह संभावना गलत नहीं लगती, क्योंकि दुनियाभर में एक अरब 90 करोड़ लोगों का वजन उनके शरीर के आकार से ज्यादा बताया जाता है। इनमें से 65 करोड़ लोग मोटापा झेल रहे हैं। पूरी दुनिया में टाइप 2 डायबिटीज के साथ यह बीमारी भी बड़ी संख्या में लोगों को अपनी चपेट में ले रही है। ऐसे में इन्हें अनदेखा करना दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा है।

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लेकिन ऐसे लोग, और हम भी, चाहें तो अपनी दिनचर्या में बदलाव कर और स्वयं को शारीरिक गतिविधियों में शामिल करके इन खतरों से बच सकते हैं। समय पर सोना और उठना भी इस दिनचर्या का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेस्टर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और उल्लिखित अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता डॉ. जोसफ हेनसन का कहना है कि लोगों की स्लीपिंग प्रेफ्रेंस यानी सोने से जुड़ी प्राथमिकता के बारे में जानकर उनकी फिजिकल एक्टिविटी में बदलाव लाया जा सकता है और ऐसा करके टाइप 2 डायबिटीज के मरीजों की स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं से भी बेहतर तरीके से निपटा जा सकता है।

डॉ. जोसफ हेनसन का कहना है, 'डायबिटीज से पीड़ित लोगों की मदद करने के लिए बड़े पैमाने पर काम करने की जरूरत है। देर से सोने और देर से उठने वाले लोगों के लिए यह और भी जरूरी है। हमारा अध्ययन कहता है कि जो लोग रात में उल्लू की तरह जागते हैं, वे अपने समकक्षों की अपेक्षा 56 प्रतिशत कम व्यायाम कर पाते हैं। डायबिटीज के मरीजों के लिए एक्सरसाइज एक बड़ी भूमिका निभाती है। यह उनके वजन को संतुलित और स्वस्थ बनाए रखने और ब्लड प्रेशर को मेनटेन करने में मददगार है। साथ ही, डायबिटीज से जुड़े अन्य स्वास्थ्य खतरों, जैसे हृदय रोग, को कम करने में भी एक्सरसाइज जरूरी है।'

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जिस अध्ययन के आधार पर डॉ. जोसफ ये दावे कर रहे हैं, उसके लिए उन्होंने और उनकी टीम ने टाइप 2 डायबिटीज के 635 मरीजों का निरीक्षण किया। बीएमजे ओपन डायबिटीज रिसर्च एंड केयर नामक मेडिकल पत्रिका में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, अध्ययन में शामिल प्रतिभागियों को सात दिन के लिए एक्सेलेरोमीटर पहनने को दिया गया ताकि उनकी अलग-अलग शारीरिक गतिविधियों की टाइमिंग और तीव्रता को रिकॉर्ड किया जा सके। इस डिवाइस की मदद से शोधकर्ताओं ने जाना कि सभी प्रतिभागियों में से 25 प्रतिशत मॉर्निग क्रोनोटाइप थे यानी वे सुबह जल्दी उठते थे और जल्दी ही सोते थे। इन लोगों के रात में सोने का औसत समय 10 बजकर 52 मिनट था। वहीं, 23 प्रतिशत प्रतिभागी मरीज ईवनिंग क्रोनोटाइप थे। यानी वे देर से सोते और उठते थे। इनके सोने का औसत समय रात साढ़े 12 बजे के आसपास का था। बाकी 52 प्रतिशत प्रतिभागी इन दोनों ही कैटेगरी में नहीं आते थे।

अध्ययन में शामिल साउथ ऑस्ट्रेलिया यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक डॉ. एलेक्स रोलैंड्स ने बताया कि इस स्टडी से टाइप 2 डायबिटीज के मरीजों के शारीरिक व्यवहार से जुड़ी अनोखी जानकारियां मिलती हैं। वे बताते हैं, 'अध्ययन से देर से सोने और शारीरिक गतिविधि के बीच संबंध स्पष्ट हुआ है। बिस्तर पर देरी से जाने का मतलब है आप शारीरिक रूप से कम सक्रिय हो सकते हैं। चूंकि सोने के पैटर्न में बदलाव किए जा सकते हैं, ऐसे में ये परिणाम आपको मौका देते हैं कि आप अपनी जीवनशैली को बदलें। ऐसा सोने के समय में परिवर्तन करके आसानी से किया जा सकता है। अगर किसी को डायबिटीज है तो उसके लिए यह जानकारी और भी महत्वपूर्ण है। इसके जरिये वे वापस अच्छी सेहत के रास्ते पर जा सकते हैं।'

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