जैसा कि आप पहले से ही जानते होंगे कि डायबिटीज (मधुमेह) एक क्रॉनिक यानी लंबे समय तक जारी रहने वाली बीमारी है। डायबिटीज 2 तरह का होता है और इसके होने के दो मुख्य कारण भी हैं। पहला- जब शरीर पर्याप्त मात्रा में इंसुलिन का उत्पादन नहीं करता है तो इसे टाइप 1 डायबिटीज के रूप में जाना जाता है। वहीं, जब शरीर प्रभावी रूप से इंसुलिन का उपयोग नहीं कर पाता है तो इसे टाइप 2 डायबिटीज के रूप में जाना जाता है। ये दोनों ही स्थितियां हाइपरग्लाइसिमिया या खून में ग्लूकोज की सघनता में वृद्धि का कारण बनती हैं।

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डायबिटीज की रोकथाम और उपचार क्यों जरूरी है?
साल 2003 में डायबिटीज केयर पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, शहरी भारत में टाइप 2 डायबिटीज विशेष रूप से एक महामारी की स्थिति में पहुंच रहा है और इसकी सबसे बड़ी वजह है बीमारी के लिए जिम्मेदार सबसे बड़े जोखिम कारकों में से एक मोटापे का बढ़ना। इस अध्ययन में बताया गया है कि भारत के संपूर्ण शहरी क्षेत्रों में युवा और किशोरों में मोटापे की समस्या बढ़ी है, जो भारतीयों में बहुत कम उम्र में डायबिटीज की शुरुआत का कारण बन रहा है। यह खासकर चिंता का विषय क्योंकि क्योंकि डायबिटीज में वृद्धि के कारण अन्य सभी रोगों की आशंका भी बढ़ जाती है जो डायबिटीज से जुड़े हुए हैं जैसे- हृदय रोग, नसों का क्षतिग्रस्त होना, किडनी फेल होना, आंखों को नुकसान, त्वचा रोग और यहां तक ​​कि अल्जाइमर रोग भी।

यूरोपियन एसोसिएशन फॉर द स्टडी ऑफ डायबिटीज (ईएएसडी) की वार्षिक बैठक में पेश की गई नई स्टडी के अनुसार, मधुमेह का प्रभाव और भी अधिक दूरगामी हो सकता हैं। कार्डियोवास्कुलर एंडोक्रिनोलॉजी एंड मेटाबॉलिज्म नाम की पत्रिका में जल्द ही प्रकाशित होने वाली यह मॉडलिंग स्टडी बताती है कि टाइप 1 डायबिटीज वाले व्यक्ति की जीवन प्रत्याशा यानी लाइफ एक्सपेक्टेंसी 8 साल कम होती है और टाइप 2 डायबिटीज वाले व्यक्ति बिना डायबिटीज वाले व्यक्ति की तुलना में औसतन 2 साल कम जीवित रहते हैं।

ब्रिटेन स्थित इस अध्ययन से यह भी पता चलता है कि शुगर के पुरुष मरीजों की तुलना में, महिलाओं की औसत आयु ज्यादा कम है, फिर चाहे मरीज टाइप 1 डायबिटीज से पीड़ित हो या फिर टाइप 2 डायबिटीज से। वैसे तो जनसंख्या और महामारी विज्ञान के अध्ययनों को भारत सहित कई और देशों में आयोजित करने की आवश्यकता है, यह पता लगाने के लिए कि क्या औसत खोए हुए जीवन वर्ष समान रहते हैं या नहीं लेकिन यह तथ्य कि मधुमेह से जीवन की गुणवत्ता खराब हो जाती है और जीवन प्रत्याशा कम होती है, इसमें कोई शक नहीं है।

टाइप 2 डायबिटीज की रोकथाम के लिए क्या गर्म पानी से नहाना चाहिए?
ईएएसडी की वर्चुअल वार्षिक बैठक में पेश किए गए एक अन्य शोध से पता चलता है कि नियमित रूप से गर्म पानी से नहाने से ग्लाइकेटेड हीमोग्लोबिन (एचबीए1सी) के स्तर में सुधार हो सकता है जिससे टाइप-2 डायबिटीज के प्रमुख जोखिम कारक में कमी हो सकती है। दरअसल ग्लाइकेटेड हीमोग्लोबिन ब्लड शुगर को कंट्रोल करने का एक पैमाना है जो खून में मौजूद अणुओं को संदर्भित करता है जिससे ग्लूकोज या चीनी चिपक गई हो। ग्लाइकेटेड हीमोग्लोबिन का उच्च स्तर, खून में हाई ब्लड शुगर का संकेत देता है, जो कि टाइप 2 डायबिटीज के लिए एक प्रमुख जोखिम कारक है।

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कई अध्ययनों से सुझाव मिला है कि अलग-अलग प्रकार की हीट थेरेपी, जैसे हॉट बाथ (गर्म पानी से स्नान) और सॉना बाथ (स्नान के रूप में भाप लेना) शरीर में वसा के स्तर को कम करता है और साथ ही ग्लाइकेटेड हीमोग्लोबिन के स्तर में सुधार करने में भी मदद कर सकता है। हालांकि, पिछले अध्ययनों में यह बताने के लिए सटीक आंकड़ों का अभाव था कि टाइप 2 मधुमेह के रोगियों के लिए गर्म पानी से नहाना विश्वसनीय चिकित्सा के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है या नहीं। लेकिन इस अध्ययन में शोधकर्ताओं को इससे जुड़े प्रमाण मिले हैं। इस स्टडी के लिए शोधकर्ताओं ने साल 2018 और 2019 के बीच जापान के कोह्नोडाई अस्पताल में भर्ती टाइप 2 डायबिटीज के 1,297 मरीजों की नहाने की आदतों की जांच की। अध्ययनकर्ताओं ने इस दौरान मरीज कितनी बार नहाते हैं और उनके मेटाबॉलिटिक पैरामीटर के बीच क्या संबंध है इसका अध्ययन किया।

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हफ्ते में चार बार से अधिक गर्म पानी से नहाना सही- रिसर्च
यहां यह बताना जरूरी है कि पारंपरिक और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गर्म पानी से नहाना जापानियों की जीवनशैली का अहम हिस्सा रहा है और जापान की अधिकांश आबादी इसका पालन करती है। इसलिए इस तरह की आबादी में गर्म पानी के नहाने से होने वाले लाभ को मापना आसान था। आयु, लिंग, बीएमआई और इंसुलिन के उपयोग के लिए समायोजन के बाद, अध्ययन में पाया गया कि 16 मिनट की औसत अवधि के लिए सप्ताह में 4.2 (चार बार से ज्यादा) बार गर्म पानी से नहाने से वजन, बॉडी मास इंडेक्स, कमर की परिधि और डायस्टोलिक रक्तचाप में कमी आती है और ग्लाइकेटेड हीमोग्लोबिन के स्तर में भी सुधार होता है।

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इस तरह अध्ययन में पता चला कि एक आदत के रूप में गर्म पानी से नहाना ग्लाइकेटेड हीमोग्लोबिन के घटते स्तर से जुड़ा था। इसके अलावा गर्म पानी से नहाना, ब्लड प्रेशर कंट्रोल और बढ़ते वजन में कमी से भी जुड़ा हुआ है। लिहाजा शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला कि रोजाना अगर गर्म पानी से नहाने के जरिए शरीर को हीट एक्सपोजर मिले तो टाइप 2 मधुमेह के रोगियों की स्थिति में सुधार हो सकता है। साथ ही इससे जुड़े जोखिम कारकों को भी कम किया जा सकता है। हालांकि यहां सवाल यह उठता है कि क्या भारत में डायबिटीज के रोगियों या जिन्हें शुगर का जोखिम है, उन्हें गर्म पानी से नहाने का सुझाव दिया जा सकता है? विशेष रूप से उपमहाद्वीप में उच्च तापमान को देखते हुए, यह देखा जाना अभी बाकी है।


टाइप 2 मधुमेह को रोकने का डॉक्टर द्वारा सुझाया पैकेज


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