फॉक्स फोर्डाइस रोग - Fox Fordyce Disease in Hindi

Dr. Ayush PandeyMBBS,PG Diploma

December 23, 2020

April 13, 2021

फॉक्स फोर्डाइस रोग
फॉक्स फोर्डाइस रोग

फॉक्स फोर्डाइस​ रोग क्या है?
फॉक्स फोर्डाइस रोग एक दुर्लभ स्किन डिसऑर्डर है जो खासकर महिलाओं में देखने को मिलता है। इस स्थिति में पीड़ित को तेज खुजली का अनुभव होता है विशेषकर अंडरआर्म्स के क्षेत्र में, जघन या जननांग के हिस्से में (प्यूबिक एरिया में) और निपल्स के आसपास। दरअसल इस समस्या के दौरान एक असामान्य प्रक्रिया के चलते एपोक्राइन पसीने की ग्रंथियां प्रभावित होती हैं जिसके कारण इन्फ्लेमेशन यानी आंतरिक सूजन और जलन महसूस होती है, ग्रंथियों का आकार बढ़ जाता है और तेज खुजली होने लगती है। प्रभावित जगह के आसपास की त्वचा गहरे रंग की (डार्क) और शुष्क (ड्राई) हो जाती है। साथ ही कई, छोटे-छोटे और उभरे हुए दाने या गांठ विकसित हो सकते हैं। इसके अलावा प्रभावित जगह पर मौजूद हेयर फॉलिकल्स को भी नुकसान होता है जिसके परिणामस्वरूप बाल झड़ने लगते हैं।

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फॉक्स फोर्डाइस रोग के लक्षण - Fox Fordyce Disease Symptoms in Hindi

फॉक्स फोर्डाइस बीमारी के लक्षण आमतौर पर गर्मी, नमी और घर्षण जैसी परिस्थितियों के दौरान अचानक से दिखाई दे सकते हैं। इस समस्या के चलते, एपोक्राइन ग्रंथियों के आसपास स्किन पर बड़ी संख्या में, छोटे-छोटे और उभरे हुए गांठ या सूजन बन जाती है जो कि इस बीमारी के संकेत हो सकते हैं। ये गांठ या दाने आमतौर पर स्किन के रंग के होते हैं, लेकिन पीले या लाल रंग के भी हो सकते हैं जो कि उभरे हुए और चिकने होते हैं। प्रभावित जगह पर आमतौर पर ये दाने बेहद छोटे-छोटे होते हैं और ये अधिकांश बगल यानी आर्मपिट में देखने को मिलते हैं। यही वजह है कि दाने की जगह पर अक्सर खुजली का अनुभव होता है और उन जगहों पर पसीना भी नहीं आता (एन्हिड्रोसिस)। खुजली की समस्या हल्की-फुल्की भी हो सकती है या फिर इतनी गंभीर भी कि व्यक्ति की नींद खराब हो जाए।

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फॉक्स-फोर्डाइस रोग का कारण? - Fox Fordyce Disease Causes in Hindi

फॉक्स फोर्डाइस बीमारी का स्पष्ट कारण अब तक पता नहीं चल पाया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस बीमारी के विकास में एपोक्राइन ग्रंथि वाहिकाओं (नली) में होने वाली रुकावट एक बड़ी वजह हो सकती है लेकिन अध्ययनों में अब तक इस अनुमान की पुष्टि नहीं हो पायी है। शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया कि जहां वाहिकाएं, हेयर फॉलिकल्स के करीब होती हैं वहां अवरुद्ध वाहिकाएं फट जाती हैं जिसकी वजह से इन्फ्लेमेशन की समस्या आती है। वहीं, हेयर फॉलिकल्स के आसपास होने वाली जलन या खुजली के पीछे विशेष रूप से ल्यूकोसाइट्स (श्वेत रक्त कोशिकाएं) की अहम भूमिका होती है जो कि निष्कासित अवशेष या मलबे को निकालती हैं।

वैज्ञानिकों का यह भी अंदेशा है कि हार्मोन या जेनेटिक्स जैसे अतिरिक्त फैक्टर भी फॉक्स फोर्डाइस बीमारी के विकास में अहम भूमिका निभा सकते हैं। हालांकि, फॉक्स फोर्डाइस रोग क्यों होता है, इसके कारण को लेकर वैज्ञानिकों ने जो रिसर्च की है उसके निष्कर्षों से कोई निश्चित जवाब नहीं मिला है। यही वजह है कि इस बीमारी के सटीक कारण का पता लगाने के लिए अभी और अधिक शोध की आवश्यकता है।

क्या बच्चों और पुरुषों को भी होती है ये बीमारी? Fox Fordyce Disease affect children and men in Hindi

'नैशनल ऑर्गेनाइजेशन फॉर रेयर डिजीज' की एक रिपोर्ट के मुताबिक फॉक्स फोर्डाइस बीमारी खासकर 13 से 35 साल की आयु की महिलाओं को होती है। हालांकि, कुछ दुर्लभ मामलों में यह पुरुषों और बच्चों को भी प्रभावित कर सकती है और उन महिलाओं को भी जो मेनोपॉज को पार कर चुकी होती हैं। इस तरह महिलाओं और पुरुषों में इस बीमारी का अनुपात 9:1 का होता है यानी 10 में से 9 महिलाएं इस बीमारी से पीड़ित हो सकती हैं जबकि बाकी संख्या पुरुषों या बच्चों की हो सकती है।

फॉक्स-फोर्डाइस रोग का निदान - Diagnosis of Fox Fordyce Disease in Hindi

फॉक्स-फोर्डाइस रोग का निदान विशेष रूप से बीमारी के लक्षणों के आधार पर किया जाता है (यानी एपोक्राइन ग्रंथि क्षेत्र में दाने या फुंसी का उभरना)। इस दौरान रोगी की बीमारी का पूरा इतिहास जानने के साथ ही क्लिनिकल ​​मूल्यांकन भी किया जाता है। इसके अलावा माइक्रोस्कोपिक मूल्यांकन (बायोप्सी) के जरिए प्रभावित ऊतक की जांच से भी बीमारी का निदान किया जा सकता है। बायोप्सी से रोग का सही निदान करने के लिए एक अनुभवी डर्मेटोपैथोलॉजिस्ट की जरूरत होती है।

फॉक्स-फोर्डाइस बीमारी का इलाज - Fox Fordyce Disease Treatment in Hindi

फॉक्स फोर्डाइस बीमारी का इलाज, उन खास लक्षणों के आधार पर किया जाता है जो कि हर एक रोगी में साफतौर पर दिखाई देते हैं। लिहाजा इस दौरान डर्मेटोलॉजिस्ट (त्वचा विशेषज्ञ) के साथ कंसल्टेशन का सुझाव दिया जाता है। वहीं, कुछ खास प्रकार की थेरेपी का उपयोग भी किया जाता है जिसमें एस्ट्रोजन हार्मोन, ओरल रेटिनॉयड्स, स्टेरॉयड क्रीम और टॉपिकल एंटीबायोटिक जैसी चिकित्सा पद्धतियां शामिल हैं। हालांकि कोई एक ऐसी थेरेपी नहीं है जो सभी रोगियों में समान रूप से असरदार साबित हो पाए। 

एस्ट्रोजन-आधारित ओरल गर्भनिरोधक दवाएं आमतौर पर फॉक्स-फोर्डाइस बीमारी से पीड़ित महिलाओं के इलाज में सबसे प्रभावी रही हैं। कम प्रभावी थेरेपी के तौर पर ओरल रेटिनॉयड्स (जैसे कि ट्रेटिनॉइन), कोर्टिकोस्टेरॉयड क्रीम और टॉपिकल एंटीबायोटिक्स (जैसे क्लिंडामाइसिन) को शामिल किया गया है, जो कि कई मामलों में लाभदायक है और कुछ मामलों में प्रभावी नहीं है। इनमें से कुछ थेरेपी के उपयोग से जलन हो सकती हैं, जिस वजह से इन्हें लंबे समय तक इस्तेमाल करने की क्षमता सीमित हो जाती है।

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